शनिवार, 5 जून 2010

दुधवा में आए विदेशी शोधार्थी बनाएगें प्रोजेक्ट


-देवेन्द्र प्रकाश मिश्र 
अवेक इंटरनेशनल संस्थान द्वारा रूस के टूर लीडर मिस्टर पासा के नेतृत्व में पांच देशों के विद्यार्थी दुधवा टाइगर रिजर्व के भ्रमण पर है। २ जून २००१० को इनका आगमन खीरी के इस सुरम्य वन में हुआ और ये टीम ५ जून २०१० तक यहाँ के वन्य जीवों व जंगलों का अध्ययन करेंगी, इस प्रतिनिधि मंडल ने जंगल भ्रमण के दौरान थारू गांवों में हो रहे प्रकृति के सरंक्षण व संवर्धन के लिए विश्व प्रकृति निधि द्वारा किए जा रहे प्रयासो को देखा, भगवन्त नगर में  विश्व प्रकृति निधि द्वारा बायो गैस, सूर्य उर्जा, और वर्मी कम्पोस्ट खाद बनाने की ट्रेनिंग जैसे कार्यक्रमों का संचालन किया जा रहा है, कई पर्यावरण गोष्ठी आदि के आयोजनों से थारू जनजाति और जंगलों के मध्य समन्वय स्थापित करने के प्रयासों का भी इन विदेशी छात्रों ने ब्योरा लिया।
यह टीम पासा के निर्देशन व हरदोई जिले की संस्था सार्वजनिक शिक्षोन्नयन एंव संस्थान के सहयोग से इन इलाकों में प्रकृति, शिक्षा, व अन्य सामाजिक मसलों का अध्ययन कर रही है,

संयुक्त राष्ट्र संघ के मिलेनियम डेवेलपमेन्ट गोल प्रोजेक्ट 2015 के तत्वाधान में पूरी दुनिया से 320  प्रतिनिधियों द्वारा दुनियाभर से पर्यावरण, शिक्षा, हेल्थ, एड्स, गर्भवती महिलाओं व बच्चों की दशा पर विस्तृत रिपोर्ट पेश की जायेगी, ताकि भविष्य में इन गंभीर मुद्दों पर उचित प्रयास किए जा सके। ये विदेशी छात्र भी इसी प्रोग्राम का हिस्सा है, जो विभिन्न भूभागों से उपरोक्त विषयों पर आंकड़े जुटायेंगे। दुधवा टाइगर रिजर्व के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश व भारत के अन्य भूभागों में ये टीम तकरीबन डेढ़ महीने तक भ्रमण करने के बाद वापस लौटेगी।

टीम मेंबर्स में मलेशिया से कार्की, एनी, फ़िलीपीन्स से रोआना, नीदरलैंड से दान, मैक्सिको सिटी व रूस के प्रतिनिधि हैं।

मंगलवार, 4 मई 2010

दावानल से गड़बड़ाया दुधवा का पारिस्थितिकीय तंत्र


ग्रीष्मकाल शुरू होते ही गावों और प्रदेश के जंगलों में भी आग लगने का दौर शुरू हो जाता है। जंगलों में आग से होने वाली तबाही एवं बर्बादी से जहां वन्य प्राणियों का जीवन संकटमय हो जाता है। जंगलों में आग अकूत वन संपदा को तो स्वाहा कर देती ही है, इस दावानल से वन्य जीवन भी दहल उठता है-नष्ट हो जाता है। हजारों लोग बेघर होकर खुले आसमान के नीचे जीवन गुजारने को विवश हो जाते हैं। हर साल अग्निपीड़ितों को मुआवज़े के नाम पर करोड़ों रूपए तो दिए जाते हैं परंतु भविष्य में आग रोकने या उसके त्वरित नियंत्रण की व्यवस्था करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई देती है। प्रतिवर्ष आग अपना इतिहास दोहराकर नुकसान के आंकड़ों को बढ़ा देती है। राज्य सरकार जंगलों को आग से बचाने के लिए कोई सार्थक कदम नहीं उठा रही है। यूपी के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क के जंगलों में बार-बार लगने वाली आग को रोकने के लिए आधुनिक साधनों और संसाधनों की समुचित भारी कमी है। लगातार आग से दुधवा के जंगल का न सिर्फ पारिस्थितिक तंत्र गड़बड़ा रहा है, बल्कि जैव-विविधता के अस्तित्व पर भी भारी संकट खड़ा हो गया है। दुधवा नेशनल पार्क में दावानल के नियंत्रण की तमाम व्यवस्थाएं फायर सीजन से पूर्व की जाती हैं। अगर आग रोकने का प्रबंध योजनाबद्ध और ईमानदारी से कराया जाए तो आग को विकराल होने से पहले ही उस पर नियंत्रण हो सकता है। निजी स्वार्थों में कराए गए दावानल नियंत्रण के प्रबंध हमेशा फेल होते देंखे गए हैं। दुधवा पार्क प्रशासन ये तैयारियां फरवरी से 15 जून के मध्य में करता है मगर जंगल में लगने वाली आग का रूप जब भी विकराल होता है तब उसके सारे प्रबंध धरे रह जाते हैं। 'उसके बाद शुरू होता है नुकसान की भरपाई और मुवावजे का काला खेल।'


जंगल में कई कारणों से आग लगती है या फिर लगाई जाती है। इसमें समयबद्ध एवं नियंत्रित आग विकास है किंतु अनियंत्रित आग विनाशकारी होती है। दुधवा के जंगल में ग्रासलैंड मैनेजमेंट एवं वन प्रवंधन के लिए नियंत्रित आग लगाई जाती है। इसके अतिरिक्त शरारती तत्वों या ग्रामीणजनों का सुलगती बीड़ी जंगल में छोड़ देना आग का कारण बन जाता है। जबकि वन्य जीवों के शिकारी भी पत्तों से होने वाली आवाज दबाने के लिए जंगल में आग लगा देते हैं। दुधवा नेशनल पार्क के वनक्षेत्र की सीमाएं नेपाल से सटी हैं और इसके चारों तरफ मानव बस्तियां आबाद हैं। इसके चलते जंगल में अनियंत्रित आग लगने की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है।

इसका भी प्रमुख कारण है कि नई घास उगाने के लिए मवेशी पालक ग्रामीण जंगल में आग लगा देते हैं जो अपूर्ण व्यवस्थाओं के कारण अकसर विकाराल रूप धारण करके जंगल की बहुमूल्य वन संपदा को भारी नुकसान पहुंचाती है और वनस्पितियों एवं जमीन पर रेंगने वाले जीव-जंतुओं को जलाकर भस्म कर देती है। विगत के दो वर्षों में कम वर्षा होने के बाद भी बाढ़ की विभीषिका के कहर का असर वनक्षेत्र पर व्यापक रूप से पड़ा है। बाढ़ के पानी के साथ आई मिट्टी-बालू इत्यादि की सिलटिंग से जंगल के अन्दर तालाबों, झीलों, भगहरों की गहराई कम हो गई है। स्थिति यह है कि जिनमें पूरे साल भरा रहने वाला पानी वन्य जीवों-जंतुओ को जीवन प्रदान करता था वह प्राकृतिक जल स्रोत अभी से ही सूखने लगे हैं। जंगल में नमी की मात्रा कम होने से कार्बनिक पदार्थ और अधिक ज्वलनशील हो गए हैं, जिसमें आग की एक चिंगारी सैकड़ों एकड़ वनक्षेत्र का जलाकर राख कर देती है।

सन् 2001 से 2007 तक दुधवा के जंगलों में आग लगने के कारणों का अध्ययन एवं विश्लेषण दुधवा पार्क के एक उपप्रभागीय वनाधिकारी ने किया था। जिसके अनुसार सन् 2001-02 में औसत वर्षा होने के कारण जंगल में आग लगने की घटनाएं अधिक रहीं किंतु नुकसान कम हुआ। सन् 2003-04 में अधिक वर्षा होने के कारण आग से जलने के लिए आवश्यक कार्बनिक पदार्थों में नमी की अधिकता रही जिससे आग लगने की 36 घटनाओं में 16.76 हेक्टेयर वनक्षेत्र प्रभावित हुआ जबकि सन् 2005 से 2007 के मध्य कम वर्षा के कारण कार्बनिक पदार्थों की नमी कम रही और आग लगने की 36 घटनाओं में दावानल का क्षेत्रफल एक हेक्टेयर अधिक रहा था। बल्कि सन् 2008-09 में कम वर्षा के कारण दावानल की घटनाओं में प्रभावित क्षेत्रफल बढ़ने से जंगल को भारी क्षति पहुंची। इस साल भी जंगल में आग लगने का सिलसिला जारी है। इससे हरे-भरे जंगल की जमीन पर दूर तक राख ही राख दिखाई देती है। लगातार आग लगने से जंगल में कई प्रजातियों के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लग गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अनियंत्रित आग बड़ी मात्रा में कार्बन डाईआक्साइड और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करके ग्लोबल वार्मिंग बढ़ा रही है और इससे जंगल की जैव-विविधता के अस्तित्व पर भी खतरा खड़ा हो जाता है।

आठ सौ छियासी वर्ग किलोमीटर में फैले दुधवा के जंगल में आग नियंत्रण के लिए फायर लाईन बनाई जाती है और आग लगने का तुरंत पता लग जाए इसके लिए तमाम संवेदनशील स्थानों पर वाच टावर स्थापित किए गए हैं। किंतु आग लगने पर उसके नियंत्रण के लिए तुरंत मौके पर पहुंचने के लिए रेंज कार्यालय या फारेस्ट चौकी पर वाहन नहीं है ऐसी स्थिति में कर्मचारी जब तक साइकिलों से या दौड़कर वहां पहुंचते हैं तब तक आग जंगल को राख में बदल चुकी होती है। जंगल के समीपवर्ती ग्रामीण भी अब आग को बुझाने में वन कर्मचारियों को इसलिए सहयोग नहीं देते हैं क्योंकि 1977 में क्षेत्र के जंगल को दुधवा नेशनल पार्क बना दिया गया। इसके बाद पार्क कानूनों के अंतर्गत आसपास के सैकड़ों गावों को पूर्व में वन उपज आदि की सभी सुविधाओं पर प्रतिवंध लगा दिया गया है। जबकि इससे पहले आग लगते ही गांवों के सभी लोग एकजुट होकर उसे बुझाने के लिए दौड़ पड़ते थे।

इस बेगार के बदले में उनको जंगल से घर बनाने के लिए खागर, घास-फूस, नरकुल, रंगोई, बांस, बल्ली आदि के साथ खाना पकाने के लिए गिरी पड़ी अनुपयोगी सूखी जलौनी लकड़ी एवं अन्य कई प्रकार की वन उपज का लाभ मिल जाया करता था। लेकिन बदलते समय के साथ अधिकारियों का अपने अधीनस्थों के प्रति व्यवहार में बदलाव आया तो कर्मचारियो में भी परिवर्तन दिखाई देता है। स्थिति यह हो गई है कि कर्मचारी वन उपज की सुविधा देने के नाम पर ग्रामीणों का आर्थिक शोषण करने के साथ ही उनका उत्पीड़न करने से भी परहेज नहीं करते हैं। अब ग्रामीणों का जंगल के प्रति पूर्व में रहने वाला भावात्मक लगाव खत्म हो गया है। उधर आग लगने की सूचना पर पार्क अधिकारियों का मौके पर न पहुंचना और अधीनस्थों को निर्देश देकर कर्तव्य से इतिश्री कर लेना यह उनकी कार्यप्रणाली बन गई है। इससे हतोत्साहित कर्मचारियों में खासा असंतोष है और वे भी अब आग को बुझाने में कोई खास रूचि नहीं लेते हैं। जिससे जंगल को आग से बचाने का कार्य और भी दुष्कर होता जा रहा है। परिणाम दुधवा के जंगलों में लग रही अनियंत्रित आग वन्य जीवों और वन संपदा को भारी क्षति पहुंचा रही है। पार्क के उच्च अधिकारी यह स्वीकार करते हैं कि आग लगने की बढ़ रही घटनाओं का एक प्रमुख कारण है कि स्थानीय लोगों के बीच संवाद का न होना है। वह यह भी मानते हैं कि वित्तीय संकट, कर्मचारियों की कमी, निगरानी तंत्र में आधुनिक तकनीकियों का अभाव, अग्नि नियंत्रण की पुरानी पद्धति आदि ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से जंगल की आग को रोकने की दिशा में प्रभावशाली कदम नहीं उठाए जा पा रहे हैं।

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

Rajyapal Sri B.L.JOSHE Dudhwa aaye



यू. पी.के  राज्यपाल 
श्री बी. एल. जोशी 
सपरिवार 
दुधवा नेशनल पार्क 
में आये. 






























दुधवा में अब गैंडों और मानव के बीच संघर्ष शुरू


एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडे को 25 साल पहले इस तराई क्षेत्र की उनकी जन्मभूमि पर बसाया गया था। किसी वन्यजीव को पुनर्वासित करने का यह गौरवशाली इतिहास विश्व में केवल दुधवा नेशनल पार्क ने बनाया है। भारत सरकार ने पहले आसाम के पावितारा वन्यजीव विहार से दो नर और तीन मादा गैंडे लाकर दुधवा में गैंडा पुनर्वास परियोजना शुरू कराई थी। इसमें से दो मादा गैडों की मौत 'शिफ्टिंग स्टेस' के कारण हो गई थी तब परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए सन् 1985 में नेपाल के चितवन नेशनल पार्क से सोलह हाथियों के बदले चार मादा गैंडों को लाया गया। विश्व की यह एकमात्र ऐसी परियोजना है जिसमें 106 साल बाद गैडों को उनके पूर्वजों की धरती पर पुनर्वासित कराया गया है। गंगा के तराई क्षेत्र में सन् 1900 में गैंडे का आखिरी शिकार इतिहास में दर्ज है, इसके बाद गंगा के मैदानों से एक सींग वाला भारतीय गैंडा विलुप्त हो गया था। 
दुधवा नेशनल पार्क में चल रही विश्व की अद्वितीय गैंडा पुनर्वास परियोजना संबंधित अफसरों की लापरवाही कुप्रबंधन एवं उपेक्षा का शिकार हो गयी है। उर्जाबाड़ से संरक्षित वनक्षेत्र में रहने वाले तीस सदस्यीय गैंडा परिवार के पांच सदस्य करंटयुक्त फैंसिंग तोड़कर बाहर घूम रहे हैं। पार्क प्रशासन के अफसर गैंडों की सुरक्षा की कोई पुख्ता दीर्घकालिक व्यवस्था नहीं कर रहे हैं। इससे मानव के आक्रोश से उनका जीवन भी संकट में है। इसके अतिरिक्त एक ही नर गैंडा की संतानों का परिवार होने से उनके ऊपर अनुवांशिक प्रदूषण यानी अन्तःप्रजनन के खतरे की तलवार भी लटक रही है। दुधवा नेशनल पार्क की दक्षिण सोनारीपुर रेंज के 27 वर्ग किलोमीटर के जंगल को उर्जाबाड़ से घेरकर अप्रैल 1984 में गैंडा पुनर्वास परियोजना शुरू की गई थी। तमाम उतार-चढ़ाव एवं साधनों और संसाधनों की कमी के बाद भी यह परियोजना काफी हद तक सफल रही है। स्वच्छंद विचरण करने वाले तीस सदस्यीय गैंडा परिवार का जीवन अब हमेशा खतरों से घिरा रहता है, क्योंकि इनकी रखवाली और सुरक्षा में तैनात पार्क कर्मियों को निगरानी करना तो सिखाया जाता है किंतु बाहर भागे गैंडा को पकड़कर वापस लाने का तरीका ये नहीं जानते हैं।
इन अव्यवस्थाओं के कारण इस एक दशक से तीन नर एवं दो मादा गैंडा उर्जाबाड़ के बाहर दुधवा नेशनल पार्क क्षेत्र की गेरुई नदी के किनारे और गुलरा क्षेत्र के खुले जंगल समेत निकटस्थ खेतों में विचरण करके किसानों की फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं। दुधवा रेंज कार्यालय से करीब चार किलोमीटर दूर चौखंभा वनक्षेत्र में गौरीफंटा रोड पर पहली बार एक गैंडा विचरण करते देखा गया। अब यह गैंडा सोठियाना रेंज के जंगल में असुरक्षित घूम रहा है। यह वनक्षेत्र दक्षिण सोनारीपुर के उर्जाबाड़ वाले इलाके से 15-20 किमी दूर है। गैंडा वहां तक कैसे पहुंचा? यह बात अपने आप में वन विभाग की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह है। इस गैंडा की घर वापसी के कोई प्रयास पार्क प्रशासन ने नहीं किए हैं। 
दुधवा के जंगल के चारों तरफ किनारे पर तमाम गांव आबाद हैं और वन क्षेत्र से सटे खेतों में फैंस तोड़कर बाहर विचरण करने वाले गैंडे लगातार फसलों को भारी क्षति पहुंचा रहे हैं। बीते दशक में मलिनियां गांव के पास गैंडा एक किसान को मार चुका है और अलग-अलग गैंडों के हमलों में पौन दर्जन लोग घायल हो चुके हैं। वन पशुओं से की जाने वाली फसल क्षति और जनहानि की मुआवजा सूची में यूपी सरकार ने 25 साल व्यतीत हो जाने के बाद भी गैंडा को शामिल नहीं किया है। इससे वन विभाग किसान को गैंडे से फसल क्षति का मुआवजा नहीं देता है। फसलों का नुकसान और जनहानि होने के बाद भी उसकी भरपाई ना मिलने से आक्रोशित ग्रामीण खुले जंगल और खेतों के आसपास घूमने वाले गैंडों को कभी भी जानी नुकसान पहुंचा सकते हैं। दुधवा पार्क प्रशासन ने गैडों की मानीटरिंग और उनकी सुरक्षा के लिए अलग से चार हाथी और कर्मचारियों का भारी अमला लगाया गया है लेकिन रेंज और वन चौकियों पर मूलभूत सुविधाएं उपलव्ध न होने से कर्मचारी अपनी इस तैनाती को कालापानी की सजा मानते हैं। विषम परिस्थितियों में वे ड्यूटी को पूरी क्षमता के बजाय बेगार के रूप में करते हैं जिससे गैंडों के जीवन पर भारतीय ही नहीं वरन नेपाली शिकारियों की भी कुदृष्टि का हर वक्त खतरा मंडराता रहा है।
दुधवा में अपने पूर्वजों की धरती पर पुनर्वासित बांके नाम के पितामह गैंडा से हुई वंश वृद्धि से यहां तीस सदस्यीय गैंडा परिवार स्वच्छंद विचरण कर रहा है। एक ही पिता से हुई संतानें चार पीढ़ी तक पहुंच गई हैं। जिनके ऊपर विशेषज्ञों के अनुसार अनुवांशिक प्रदूषण यानी अन्तःप्रजनन-इनब्रीडिंग- का खतरा मंडरा रहा है। उनका मानना है कि अन्तःप्रजनन की विकट समस्या से निपटने के लिए यहां बाहर से गैंडे का लाया जाना जरूरी है। गौरतलब है कि दुधवा प्रोजेक्ट टाइगर में शामिल किशनपुर वनपशु बिहार और नार्थ-खीरी वन प्रभाग की संपूर्णानगर वनरेंज के जंगल और उससे सटे खेतों में पिछले करीब एक साल से मादा गैंडा अपने एक बच्चे के साथ घूम रही है। वन विभाग एवं पार्क प्रशासन इसकी सुरक्षा एवं निगरानी करने के बजाय यह कहकर अपना पल्लू झाड़ रहा है कि यह गैंडा मादा नेपाल की शुक्लाफांटा सेंक्चुरी की है, जो पीलीभीत के लग्गा-भग्गा जंगल से होकर आई है और घूम-फिर कर वापस चली जाएगी। 
पूर्व में जब यह परियोजना शुरू की गई थी तब सोलह हाथियों के बदले चार मादा गैंडे नेपाल से लाई गई थी, अब एक नेपाली मादा गैंडा अपने बच्चे के साथ घूम रही है तो फ्री में मिल रही इस मादा गैंडा को यहां के गैंडा परिवार में क्यों नहीं शामिल कराया जा रहा है? वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि प्रयास करके पार्क प्रशासन अगर इस मादा गैंडा को दुधवा के गैंडा परिवार में शामिल कर ले तो यहां के गैंडों के ऊपर मंडरा रहा इनब्रीडिंग यानी अंतःप्रजनन का खतरा आंशिक रूप से काफी हद तक टल सकता है। लेकिन पार्क के अफसर इस दिशा में कोई भी प्रयास करते नहीं दिख रहे हैं। इससे लगता है कि पार्क प्रशासन गैंडा पुनर्वास परियोजना के प्रति कतई गंभीर नहीं है। 
गैंडा पुनर्वास परियोजना के योजनाकारों ने तय किया था कि यहां की समष्टि में तीस गैंडा को लाकर बसाया जाएगा। उसके बाद फैंस हटाकर उनको खुले जंगल में छोड़ दिया जाएगा। उनका यह सपना तो पूरा नहीं हुआ। गैंडों की बढ़ती संख्या को देखकर समष्टि के वृहद फैलाव, आवागमन की सुविधा, अंतःप्रजनन रोकने एवं संक्रामक संहारक तत्वों के विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के उद्देश्य से दक्षिण सोनारीपुर में इस समष्टि के निकट नई फैंस बनाने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया था। वहां से स्वीकृति मिलने के बाद पांच साल पहले शुरू किया गया कार्य आज भी अधूरा पड़ा है और बजट आने का इंतजार कर रहा है। 
जर्जर हो चुकी 25 साल पुरानी उर्जाबाड अनुपयोगी हो गई है, लकड़ीचोर और शिकारी फैंस के तारों को काट देते हैं इससे भी गैंडो को बाहर निकलने में आसानी रहती है। वैसे भी गैंडों की बढ़ रही संख्या के अनुपात में अब उनके रहने वाले जंगल का भी क्षेत्रफल कम हो गया है। इसका क्षेत्रफल समय रहते बढ़ाया जाना आवश्यक हो गया है साथ ही गैंडों की मानीटरिंग के लिए अत्याधुनिक साधन और सुरक्षा के लिए संसाधन उपलब्ध कराने की बात भी पार्क अधिकारी कहते हैं। यहां की समस्याओं का समाधान करने में न केंद्र सरकार गंभीर दिखाई देती है और न ही प्रदेश की सरकार कोई दिलचस्पी ले रही है। इससे व्याप्त तमाम अव्यवस्थाओं के कारण क्षेत्र में गैंडा और मानव के मध्य एक नया संघर्ष जरूर शुरू हो गया है। इसके बाद भी दुधवा पार्क प्रशासन के संरक्षित क्षेत्र के बाहर घूम रहे गैंडों की सुरक्षा एवं उनको फैंस के भीतर लाने के कतई कोई प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। इनके साथ कभी भी कोई अनहोनी हो सकती है, इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है।
 

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

प्रकृति की पीड़ा कौन सुनेगा

             जल, जंगल और जमीन, इन तीन तत्वों के बिना प्रकृति अधूरी है। विश्व में सबसे समृद्ध देश वही हुए हैं, जहाँ यह तीनों तत्व प्रचुर मात्रा में हों। हमारा देश जंगल, वन्य जीवों के लिए प्रसिद्ध है। सम्पूर्ण विश्व में बड़े ही विचित्र तथा आकर्षक वन्य जीव पाए जाते हैं। हमारे देश में भी वन्य जीवों की विभिन्न और विचित्र प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इन सभी वन्य जीवों के विषय में ज्ञान प्राप्त करना केवल कौतूहल की दृष्टि से ही आवश्यक नहीं है, वरन यह काफी मनोरंजक भी है। भूमंडल पर सृष्टि की रचना कैसे हुई, सृष्टि का विकास कैसे हुआ और उस रचना में मनुष्य का क्या स्थान है? प्राचीन युग के अनेक भीमकाय जीवों का लोप क्यों हो गया और उस दृष्टि से क्या अनेक वर्तमान वन्य जीवों के लोप होने की कोई आशंका है?मानव समाज और वन्य जीवों का पारस्परिक संबंध क्या है? यदि वन्य जीव भूमंडल पर न रहें, तो पर्यावरण पर तथा मनुष्य के आर्थिक विकास पर क्या प्रभाव पड़ेगा? तेजी से बढ़ती हुई आबादी की प्रतिक्रिया वन्य जीवों पर क्या हो सकती है आदि प्रश्न गहन चिंतन और अध्ययन के हैं।इसलिए भारत के वन व वन्य जीवों के बारे में थोड़ी जानकारी आवश्यक है, ताकि लोग भलीभाँति समझ सकें कि वन्य जीवों का महत्व क्या है और वे पर्यावरण चक्र में किस प्रकार मनुष्य का साथ देते हैं। साथ ही यह जानना भी आवश्यक है कि सृष्टि-रचना चक्र में पर्यावरण का क्या महत्व है। पहले पेड़ हुए या गतिशील प्राणी? फिर सृष्टि-रचना की क्रिया में हर प्राणी, वनस्पति का एक निर्धारित स्थान रहा है। इस सृष्टि-रचना में मनुष्य का आविर्भाव कब हुआ? प्रकृति के इस चक्र में विभिन्न जीव-जंतुओं में क्या कोई समानता है? वैज्ञानिक दृष्टि से उसको कैसे समझा जाए, जिससे हमें पता चले क‍ि आखिर किसी प्रजाति के लुप्त हो जाने से मानव समाज और पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि आखिर हम भी एक प्रजाति ही हैं। आज हमें सबसे ज्यादा जरूरत है पर्यावरण संकट के मुद्दे पर आम जनता को जागरूक करने की। पर्यावरण, वन्य जीव-जंतुओं और मानव समाज का सीधा रिश्ता आम आदमी की समझ के मुताबिक समझने के लिए इसे वैज्ञानिक दृष्टि से देखना भी आवश्यक है। जीव-जंतुओं व जंगल का विषय है तो बड़ा 'क्लिष्ट', पर है उतना ही रोचक। इसे समझने के लिए सबसे पहले खुद पर पड़ रहे पर्यावरण के प्रभाव को जानना महत्वपूर्ण है।दिनोदिन गम्भीर रूप लेती इस समस्या से निपटने के लिए आज आवश्यकता है एक ऐसे अभियान की, जिसमें हम सब स्वप्रेरणा से सक्रिय भागीदारी निभाएँ। इसमें हर कोई नेतृत्व करेगा, क्योंकि जिस पर्यावरण के लिए यह अभियान है उस पर सबका समान अधिकार है।तो आइए हम सब मिलकर इस अभियान में अपने आप को जोड़ें। इसके लिए आपको कहीं जाने या किसी रैली में भाग लेने की जरूरत नहीं, केवल अपने आस-पड़ोस के पर्यावरण का अपने घर जैसा ख्याल रखें जैसे कि - * घर के आसपास पौधारोपण करें। इससे आप गरमी, भूक्षरण, धूल इत्याद‍ि से बचाव तो कर ही सकते हैं, पक्षियों को बसेरा भी दे सकते हैं, फूल वाले पौधों से आप अनेक कीट-पतंगों को आश्रय व भोजन दे सकते हैं।
            शहरी पर्यावरण में रहने वाले पशु-पक्षियों जैसे गोरैया, कबूतर, कौवे, मोर, बंदर, गाय, कुत्ते आदि के प्रति सहानुभूति रखें व आवश्यकता पड़ने पर दाना-पानी या चारा उपलब्ध कराएँ। मगर यह ध्यान रहे क‍ि ऐसा उनसे सम्पर्क में आए बिना करना अच्छा रहेगा, क्योंकि अगर उन्हें मनुष्य की संगत की आदत पड गई तो आगे चलकर उनके लिए घातक हो सकती है।पर्यावरण पर बड़ी-बड़ी बातें करने से पहले हमें कुछ आदतें अपनाना होंगी व उनका पालन करना होगा, क्योंकि स्थितियाँ बदलने की सबसे अच्छी शुरुआत स्वयं से होती है।   

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

DM visits Dudhwa village to inquire into FRA claims

 Surma village situated in Dudhwa National Park in Lakhimpur Kheri district. Home to Tharu tribe for centuries, the village was visited by senior officials of the district administration led by district magistrate Sameer Verma, who reviewed the preparations of distribution of land titles to the villagers under the Forest Rights Act (FRA) 2006. The Surma is the only
tribal village situated in a forest reserve area which is all set to get the status of a revenue village.
    Interestingly, according to tribals and their representatives, it was for the first time after independence that a district magistrate visited their village. The district administration moved into action following strict directions from the chief secretary A K Gupta on effective implementation of the FRA 2006. The FRA is a special law which provides right to tribals and forest dwellers on forest land on
which they are dependent since ages. The chief secretary had also ordered review of over 51,000 claims filed by forest dwellers but rejected by officials.
    Total 70,000 claims have been filed and around 9,000 land titles have been distributed.
    The DM spoke to the villagers individually and asked them about their claims. Villagers informed the DM that their claims are ready but have not been verified as yet as the forest department has not provided them relevant documents.

    The DM was upset to know that revenue and forest officials were not working effectively as directed by the chief secretary.
    He warned of strict action against officials found lax in their duties. He said that villagers should file their claims by April 15.
    He also directed forest officials to provide all relevant documents for verification of claims as early as possible.
    Rama Chandra Rana, a resident of Surma and also member of the state FRA monitoring committee, said that the attitude of the district administration was positive. Rajnish, a volunteer of national forum of forest people and forest workers, said that such initiatives by district head would help in expediting the implementation of FRA in the state.

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

लुप्तप्रय तेंदुआ की खाल एंव हड्डिया बरामद


खीरी  ka सम्पूर्णानगर थाना पुलिस ने गुलदार की एक खाल बरामद करके चार अभियुक्तियों को गिरफतार किया है। इस तेंदुआ का शिकार साउथ-खीरी वन प्रभाग के भीरा परिक्षेत्र के जंगल में किए जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। जानकारी के अनुसार सम्पूर्णानगर थाना पुलिस ने भारत-नेपाल सीमावर्ती ग्राम मिर्चिया के आगे नेपाल जाते समय चार अभियुक्तों को गिरफतार किया है। इनके पास से लुप्तप्रय वंयजीवों की सूची में प्रथम पायदान पर चिन्हित गुलदार यानी तेंदुआ की एक खाल एवं उसकी हड्डिया बरामद की हैं। गिरफतार अभियुक्तों के नाम अल्लूराम पुत्र रंगीलाल, मूलचंद्र पुत्र हेमराज, पप्पू पासी पुत्र बदलू दाताराम पुत्र बालकराम ग्राम महेशापुर थाना भीरा का निवासी होना बताया गया है।
जानकार सूत्रो ने बातया कि पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर उपरोक्त अभियुक्तों को मय तेंदुआ खाल सहित पलियाकलां पर स्टेशन स्थानीय पुलिस के सहयोग से पकड़ा था । यह अभियुक्त भीरा से ट्रेन द्वारा आए थे। अनुमान लगाया जा रहा है कि इस तेंदुआ का शिकार किशनपुर वन- पशु विहार से सटे साउथ-खीरी वन प्रभाग की भीरा रेंज के जंगल क्षेत्र से किया गया होगा । इस बात को इससे भी बल मिल रहा है कि विगत दिनों भीरा रेंज क्षेत्र जंगल व ग्रामीण क्षेत्र में तेंदुआ घूमने का ढिंढोंरा वन विभाग के आलाअफसरों ने अखबारों में बयानबाजी करके कई बार पीटा था। इससे शिकारियों को तेंदुआ की लोकेशन आसानी से मिल गई और उसे मौत के घाट उतार दिया।
गौरतलब है कि वन विभाग के आलाअफसर हो या फिर दुधवा नेशनल पार्क के उच्चधिकारी हों, यह स्वयं की पीठ थपथपाने के लिए बाघ, तेंदुआ, बाघिन या शावकों के घूमने की लोकेशन अखबारों में बयानबाजी करके उजागर कर देते हैं। जिसका फायदा शिकारी या वंयजीवों की खालों एवं उनके अंगो का अवैध कारोबार करने वाले तस्कर यंू उठाते है क्योंकि लोकेशन का पता लगाने में उन्हे मशक्कत करनी होती है वह उन्हे आसानी से मिल जाती है । हाल ही में अखबारों में अधिकारियों के छपे बयानों को देखा जाए तो लगभग चार दर्जन शावकों के ऊपर खतरे की तलवार लटकी हुई है।

शनिवार, 27 मार्च 2010

बाघ बचाने का षण्यंत्र

नामचीन बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा इन दिनों भारत में 'सेव टाइगर्स्’ अभियान तमाम तरह के प्रचार माध्यमों का इस्तेमाल करके बड़े पैमाने पर चलाया जा रहा है। क्या इससे बाघों की लगातार घटती संख्या में कोई कमी आ पायेगी? शायद नहीं, क्योंकि बाघों को बचाने के लिए ज़मीनी स्तर पर वन क्षेत्रों में इनके नाम पर हो-हल्ला मचाने वालों के द्वारा कोई भी प्रयास नहीं किए जा रहें हैं। कम्पनी हो या फिर तथाकथित वाइल्ड लाइफर, सब केवल बाघ बचाने के नाम पर नाम, पैशा और शोहरत कमाने का धंधा कर रहे हैं.

प्रचार माध्यमों पर ऐसी कई कम्पनियां करोड़ों रुपया पानी की तरह क्यों बहा रही हैं और इस बात का प्रचार शहरी क्षेत्रों में करके किस लक्ष्य को हासिल करना चाहते हैं? इन सवालों के पीछे छुपे तथ्यों को जानना बहुत ज़रूरी है। हालांकि ऊपरी तौर पर लगता यही है कि भारत ही नहीं वरन् दुनियाभर के लोग जागरुक होकर बाघों के प्रति संवेदनशीलता के साथ इनके संरक्षण में जुट जाऐं। जबकि वनक्षेत्रों में रहने वाला आदिवासी वनाश्रित समाज और आम नागरिक समाज जो जंगल और जमीन से सीधे तौर पर जुड़ा है वह पहले से और आज भी बाघों से लगाव रखता है। अग्रेजों, जमीदारों, राजा-महराजाओं, नवाबों और अभिजात वर्ग के शिकारियों ने तो सिर्फ बाघ को मारा है. अपनी शानोशौकत प्रदर्शित करने के लिए ये लोग बाघ की हत्या कर उसके शव पर पैर रखकर फोटो खिंचवाना तथा बाघछाला को अपने सिंहासन पर बिछाना अपनी शान समझते थे।

अंग्रेजी हुकूमत के देश में नहीं रहने पर आजाद भारत में भी सन् 1972 से पहले तक बाघों का शिकार होता रहा और वन विभाग द्वारा इनका शिकार करने के लाईसेंस भी दिये जाते रहे हैं। परिणामतः देश में बाघों की दुनिया सिमटने पर नींद से जागी केन्द्र सरकार ने बाघ, तेंदुआ आदि विलुप्तप्राय होने वाले वन-पशुओं के शिकार पर प्रतिबंध लगाने वाला वन्यजीव-जंतु संरक्षण अधिनियम-1972 बना दिया। जबकि कड़वी सच्चाई ये है कि इस कानून के पास किये जाने के ठीक एक दिन पूर्व ही बाकायदा अधिसूचना जारी करके बाघ, तेंदुआ सहित कई प्रजातियों के वन्यजीवों को जंगल का दुश्मन करार देते हुये बड़ी संख्या में मार दिया गया था। हालांकि इसके बाद भी बाघों का अवैध शिकार जारी रहा, अब अगर परोसे जा रहे आंकड़े पर विश्वास करें तो देश में मात्र 1411 बाघ बचे हैं, जिन्हें बचाने के लिए इन तथाकथित सुधिजनों द्वारा ढिंढोरा पीटा जा रहा है।
ऐसा नहीं है कि बाघ केवल अवैध शिकार की भेंट चढ़े हों, अन्य तमाम तरह के कारण भी इसके पीछे मौजूद रहे हैं। इनमें वनों का अवैध कटान, आबादी का विस्तार, अवैध खनन, शहरीकरण, प्राकृतिक एवं दैवीय आपदा आदि मुख्य कारण हैं। इसका पूरा-पूरा लाभ पूंजीपतियों ने ही उठाया जबकि घाटा वनवासियों एवं जंगल के निकटस्थ बस्तियों में रहने वाले गरीब तबकों के खाते में आया और आज भी उन्हीं को दोषी करार देकर उनको जंगल से बाहर खदेड़ने या वन के भीतर न घुस पायें इसका षडयंत्र रचा जा रहा है।
इस पूरे षडयंत्र के पीछे इन कम्पनियों के निहित स्वार्थ को न सिर्फ मीडिया तंत्र पूरी तरह से नज़रअन्दाज़ किये हुये है, बल्कि सरकारें भी आंख मूंद कर ये तमाशा चुपचाप देख रही हैं। दरअसल इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को अपने उद्योग कारखाने लगाने के लिये ज़मीनों की बड़ी मात्रा में ज़रूरत होती है और इन कारखानों के लिये कच्चे माल की आसानी से उपलब्धता अधिकांशतः जंगल क्षेत्रों से ही होती है। यही कारण है कि कारखानों के लिये वनभूमि इनके लिये सबसे मुफीद जगह होती है जिसे समुदायों की मौजूदगी में वनविभाग व सरकारों को सस्ते दामों में पटा कर हासिल करना इनके लिये खासा मुश्किल काम हो जाता है। समुदायों को जंगल क्षेत्रों से हटाने के लिये अख्तियार किये गये तमाम तरह के रास्तों में एक रास्ता यह भी अपनाया जा रहा है कि उन्हें शिकारी और तस्कर साबित करते हुये जंगल क्षेत्रों से हटाने के लिये एक ऐसी मुहिम छेड़ दी जाये जिससे आम नागरिक समाज में भी वन समुदायों के खिलाफ एक भ्रम फैल जाये और जंगल क्षेत्रों में इनके समर्थन में वनविभाग व सरकारों द्वारा अंजाम दी जा रही दमन की कार्यवाहियों पर ‘अवर सेव टाईगर्स‘ के नाम पर न्याय की मुहर लग सके।

आज जबकि वनाधिकार कानून-2006 लागू किया जा चुका है जिसमें स्वीकार किया गया है कि वनों के संरक्षण में ऐतिहासिक तौर पर वनसमुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनके अधिकारों को अभिलिखित न करके उनके साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है। लेकिन वनविभाग इन बड़ी कम्पनियों की मदद से इस कानून के क्रियान्वन की पूरी प्रक्रिया को ही ध्वस्त करके इन जनविरोधी कृत्यों को अंजाम देने में मशगूल है। अपने आपको जंगलों का रखवाला बताने वाला वन विभाग आज भी देश के सबसे बड़े जमींदार की भूमिका निभा रहा है। इसके द्वारा अंजाम दिये जा रहे अत्याचार, शोषण, उत्पीड़न और अवैध वसूली की त्रासदी से परेशान वनवासी एवं गरीब वन सुरक्षा एवं वन्यजीवों के संरक्षण से धीरे-धीरे किनारा करते गए और वन विभाग भी वन सुरक्षा एवं वन्यजीव संरक्षण व प्रोजेक्ट टाईगर के कार्यों में पूरी तरह से असफल ही रहा है। कागजों में करोड़ो पेड़ लगवाने के बावज़ूद वन विभाग हरे-भरे जंगल का क्षेत्रफल आज तक नहीं बढ़ा पाया। वह भी तब जबकि आजादी के बाद से लेकर अब तक सरकारों ने बेशुमार अधिसूचनायें जारी करके लोगों की खेती व काश्त की यहां तक कि निवास की भी लाखों हेक्टेयर ज़मीनों को जंगल में समाहित करके वनभूमि में इज़ाफा करने का काम किया है। वन विभाग वन्यजीव प्रबंधन में भी बुरी तरह से असफल ही रहा है। परिणामतः वन्यजीवों की संख्या घटती ही जा रही है और प्रोजेक्ट टाईगर की असफलता भी जगजाहिर हो चुकी है। ऐसी विषम परिस्थितियों में नीति निर्धारकों द्वारा इसका समय रहते मूल्याकंन कराया जाना जरूरी है।

‘सेव अवर टाईगर्स’ अभियान में लगी इन कंपनियों के मंतव्य को देखा जाए तो वह केवल बाघ के नाम पर मात्र अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये ही प्रचार-प्रसार कर रही है। इनका बाघों के संरक्षण से कोई लेना-देना नहीं है। अगर वास्तव में बाघों को बचाने में इनकी कोई रुचि होती तो प्रचार पर करोड़ों रुपए खर्च करने के बजाय वे वन एवं वन्यजीव संरक्षण जिसमें बाघ भी शामिल है उसके लिए फील्ड यानी वनक्षेत्रों में सार्थक प्रयास करतीं। जितना रुपया टीवी, अखबार विज्ञापन और खिलाड़ियों व माडलों पर व्यय किया जा रहा है। उतना रुपया अगर वन्यजीव सम्बंधी जिन कार्य योजनाओं के क्रियान्वयन में वन विभाग नाकाम रहा है ऐसे क्षेत्रों को चिन्हित करके वन प्रबंधन के कार्य करा दिए जाते या वनाधिकार कानून को सफल रूप से क्रियान्वित कराने के काम पर खर्च किया जाता तो वनसमुदायों तथा जंगलों के साथ-साथ बाघों का भी भला हो सकता था।

शनिवार, 13 मार्च 2010

विलुप्त होने की कगार पर हैं दुधवा के तेदुआं

विलुप्त होने की कगार पर हैं दुधवा के तेदुआं

बाघों को बचाने के लिये हो-हल्ला मचाने वाले लोगों ने बाघ के सखा तेदुआ को भुला दिया है। इससे बाघों की सिमटती दुनिया के साथ ही तेदुंआ भी अत्याधिक दयनीय स्थिति में पहंुच गया है। इसे भी बचाने के लिये समय रहते सार्थक एवं दूरगामी परिणाम वाले प्रयास नहीं किए गए तो वह दिन भी ज्यादा दूर नहीं होगा जब तेदुंआ भी ‘चीता’ की तरह भारत से विलुप्त हो जाएगा।
बिल्ली की 36 प्रजातियों में वनराज बाघ का सखा तेदुंआ चैथी पायदान का रहस्यमयी शर्मिला एकांतप्रिय प्राणी है। बिल्ली प्रजाति के इस प्राणी की तीन प्रजातियां भारतीय जंगलों में पाई जाती है। भारत के जंगलों से इसकी चैथी प्रजाति ‘चीता’ विलुप्त हो चुकी है। भारत-नेपाल सीमावर्ती लखीमपुर-खीरी के तराई वनक्षेत्र में कभी बहुतायत में पाए जाने वाले तेदुंआ आतंक के पर्याय माने जाते थे। धीरे-धीरे बदलते समय और परिवेश के बीच वंयजीव संरक्षण के लिये दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना 1977 में की गई। यहां के बाघों के संरक्षण व सुरक्षा के लिये 1988 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया गया। 1986 में दुधवा नेशनल पार्क की गणना सूची में 08 तेदुंआ थे। दस साल में इनकी संख्या बढ़ी तो नहीं वरन् 1997 में घटकर मात्र तीन तेदुंआ रह गए और सन् 2001 की गणना में केवल 02 तेदुंआ दुधवा में बचे थे। वर्तमान में इनकी संख्या आधा दर्जन के आस-पास बताई जा रही है। पिछले लगभग डेढ़ दशक के भीतर खीरी जिला क्षेत्र में तीन दर्जन से ऊपर तेदुंआ की खालें बरामद की जा चुकी है, जिन्हे वन विभाग तथा पार्क के अफसरान नेपाल के तेदुंआ की खालें बताकर कर्तव्य से इतिश्री करके अपनी नाकामी पर पर्दा डालते रहे हंै। इसके अतिरिक्त पिछले कुछेक सालों में आधा दर्जन से ऊपर तेदुंआ अस्वाभाविक मौत का शिकार बन चुके हंै। इसमें पिछले माह दुधवा प्रोजेक्ट टाइगर के तहत कतर्नियाघाट वंयजीव प्रभाग क्षेत्र में दो तेदुंओं को ग्रामीणों ने पीटकर मार डाला जबकि दो साल पहले नार्थ-खीरी फारेस्ट डिवीजन की धौरहरा रेंज में ग्रामीणों ने गन्ना खेत में घेरकर एक तेदुंआ को आग से जला कर मौत के घाट उतार दिया था। 27 फरवरी 2010 को कतर्नियाघाट की ही मुर्तिहा रेंज के जंगल में एक चार वर्षीय मादा तेदुंआ का क्षत-विक्षत शव मिला है। इन सबके बीच खास बात यह भी रही कि किशनपुर वंयजीव प्रभाग की मैलानी रेंज में मिले तेदुंआ के दो लावारिस बच्चों को तत्कालीन दुधवा के डीडी पी0पी0 सिंह लखनऊ प्राणी उद्यान छोड़ आए थे, वहां पर पल-बढ़ कर यह दोनों सुहेली और शारदा के नाम से पहचाने जाते हैं।
दुधवा टाइगर प्रोजेक्ट की असफलता सर्वविदित हो चुकी है। बाघों को संरक्षण देने में किए जा रहे अति उत्साही प्रयासों के दौरान वन विभाग के जिम्मेदार आलाअफसरों ने दुधवा नेशनल पार्क के अंय वंयजीवों-जंतुओं का संरक्षण और जंगल की सुरक्षा को नजरंदाज कर दिया है। परिणाम स्वरूप बिल्ली प्रजाति का ही बाघ का छोटा भाई तेदुंआ यहां अपने अस्तित्व को बचाए रखने हेतु दयनीय स्थिति में संघर्ष कर रहा है, और इस प्रजाति का सबसे बलशाली विडालवंशी लायन यानी शेर गुजरात के गिरि नेशनल पार्क तक ही सीमित रह गए हैं । लुप्तप्राय दुर्लभ प्रजाति के वंयजीवों की सूची में प्रथम स्थान पर मौजूद तेदुंआ के संरक्षण एवं सर्वद्धन के लिये अलग से परियोजना चलाए जाने की जरूरत है। समय रहते अगर कारगर व सार्थक प्रयास नहीं किए गए तो तराई क्षेत्र से ही नहीं वरन् भारत से तेदुंआ विलुप्त होकर किताबों के पन्नों पर सिमट जाएगें। (लेखक-वाइल्ड लाइफर व पत्रकार है)

मंगलवार, 9 मार्च 2010

नारी तेरी यही कहानी आखों में नीर..........

नारी तेरी यही कहानी आखों में नीर..........

इक्कीसवीं सदी की कल्पना वाले भारत में महिला उत्थान के लिये चल रही तमाम
योजनाओं के बावजूद उत्तर प्रदेश मूल की ब्रजवासी जाति की महिलायें समाज
में उपेक्षित है ही साथ में औरतों व लड़कियों की खरीद-फरोख्त की परम्परा
भी इस जाति में बदस्तूर जारी है। इस कारण नाच-गाकर लोगो के मनोंरंजन का
साधन बनी ब्रजवासी महिलायें अशिक्षा व रूढ़वादिता की अंधेरी सुरंग
मेंजागरूकता के अभाव के कारण घुट-घुट कर जिन्दा रहने को विवश हैं। आजाद
भारत
में इस जाति की वेवश महिलाओं की दयनीय स्थिति महिला उत्थान के दावों की
पोल खोल रही है।
उल्लेखनीय है कि हिन्दुस्तान के पुरूष प्रधान समाज में महिलाओं को
पुरूषों के समान बराबर का दर्जा दिलाने के लिये सरकारी तौर पर तमाम
कार्यक्रम चलाये जा रहें हैं साथ ही साथ अनेक सामाजिक संगठन व महिला
संगठन प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं को अधिकार और सम्मान दिलाने के
लिये संघर्षरत हैं। किन्तु इनके क्रियाकलापों को अगर यर्थाथ के आइने में
देखा जाये तो इनके द्वारा किये जा रहे तमाम प्रयास ब्रजवासी जाति की
महिलाओं के लिये बेमानी और खोखले होकर रह गये हंै। परिवार को आजीविका
चलने में अहम व महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद भी इस जाति की महिलाओं
को ‘दोयम दर्जा’ मिला ही है साथ में पति की प्रताड़ना तथा सभ्य समाज की
गालियां सुनना इनके किस्मत की नियति बन गई है।
ब्रजवासी जाति से सम्बन्धित की गई खोजबीन केेेेेेेेेेेेेेेेेेे बाद जो
कहानी उभरकर सामने आई है उसमें महिलाओं की दशा काफी दयनीय, निरीह एवं
अबला नारी वाली नजर आती है। मजे की बात तो यह है कि इनकी स्थिति में
परिवर्तन की किरण भरी दूर-दूर तक दिखायी नहीं देती है। प्राचीन परम्परा
को अपने भाग्य से जोडकर जीवन यापन करने वाली इस जाति की महिलायें
‘कठपुतली’ बनी पुरूषों की अंगुलियों के इशारे पर नाचने को विवश है।
स्पष्ट हुई कहानी के अनुसार मूलरूप से उत्तर प्रदेश के गोकुल (ब्रज)
क्षेत्र के निवासी होने के कारण कालान्तर में ‘ग्वाल’ जाति परिवर्ततन के
कई दौरों से गुजरने के बाद यह ग्वालजाति पूर्वजों की मातृभूमि के नाम पर
‘ब्रजवासी- जाति में तब्दील हो गई। ये ‘ब्रजवासी ग्वाल- प्राचीनकाल से ही
नाच-गाने के शौकीन रहे लेकिन उस समय परिवार में होने वाले उत्सवो में
महिलायें व पुरूष नाच-गा कर अपना मनोरंजन किया करते थे। बदलते परिवेश के
साथ ही गरीब होने के कारण ब्रजवासियों ने नाच-गाना को आजीविका से जोड़कर
वर्षो पूर्व समाज में अन्य लोगो का मनोरंजन करना शुरू कर दिया था। बताया
गया कि ब्रिटिश शासन काल में इनका विखराव शुरू हुआ तो यह लोग गोकुल से
अपना-अपना परिवार लेकर अलग-अलग स्थानों पर ‘ब्रजवासी जाति’ के नाम पर
आबाद होते चले गये। चूकिं जीविका का कोई अन्य साधन नहीं था इसलिये इनकी
महिलाओं ने नाच-गाने को पेशा बनाकर कर लोगो का मनोरंजन करने लगी। इस तरह
होने वाली आमदनी से परिवार को जीवन-पोषण का जरिया बन गया। वर्तमान में यह
स्थिति हो गई हे कि प्रदेश का शायद ही कोई ऐसा जिला होगा जहां इस जाति के
परिवार न रहते हों और इस जाति की महिलायें आज भी नाच-गाकर परिवार का
भरण-पोषण कर रही हैं। निर्धनता और अभावों की जिन्दगी गुजारने के बाद भी
ब्रजवासी समाज ‘अनैतिकता’ के दलदल में धंसने से बचा हुआ है।
हिन्दू धर्म के सभी देवी देवताओं की पूजा-अर्जना करना तथा हिन्दुओं के
रीति-रिवाज व त्योहारों को मानने वाले ब्रजवासी समाज में लड़कों की
अपेक्षा लड़की के जन्म पर आज भी ज्यादा खुशी मनाई जाती है। किन्तु लड़के
को खानदान में बाप का नाम आगे बढ़ाने वाले ‘घर के चिराग- के रूप में
मान्यता मिली हुई है। इन ब्रजवासियों को अपनी बोलचाल की एक अलग भाषा
‘ग्वाली’ (फारसी) है जिसको केवल इसी जाति के लोग बोल और समझ सकते हैं
इसका इन्हें मुसीबत के समय काफी फायदा भी मिलता है। परम्परा में बाल
विवाह के बजाय इस जाति के लोग अमूमन पन्द्रह वर्ष की आयु पूर्ण करने से
पहले ही लड़के-लड़की का विवाह रस्मोरिवाज से कर देते हैं। बताया गया कि
इस जाति में दो प्रकार के धर्म विवाह एवं संविदा (कान्ट्रेक्ट) विवाह
प्रचलित है। धर्म विवाह में दहेज देने की प्रथा है और इस रीति से हुई
शादी के बाद लड़की नाच-गाने का पेशा अपनाने के बजाय घर-गृहस्थी का कार्य
करती है। अलबत्ता इनसे होने वाली औलादों को भविष्य में पेशा अपनाने की
पूरी आजादी रहती है। इस रीति के विपरीत संविदा विवाह में वर पक्ष के लोग
प्रथा के अनुसार तयसुदा धन लड़की के परिजनों को देकर विवाह की रस्म पूरी
की जाती है। गौरतलब है कि धर्म विवाह में जहां छुटौती (तलाक) की गुजांईश
काफी कम होती है वही संविदा रीति से किये गये विवाह में विवाद होने की
स्थिति में छुटौती (तलाक) करने पर पति द्वारा शादी से पूर्व पत्नी के
परिजनों को दी गई रकम व लिया गया दहेज पत्नी को वापस करना पड़ता है।
किन्तु इस मध्य हुये बच्चे पिता के संरक्षण में दे दिये जाते हंै। यह
कार्य बिन किसी लिखा-पढ़ी के पंचायत द्वारा किया जाता है। तलाकसुदा औरत
से पुर्नविवाह करने वाला व्यक्ति उस औरत की तय की गई ‘रकम’ उसके
परिवारजनों को अदा करके खानापूर्ति के तौर पर साधारण समारोह करके ब्याह
लाता है। इस तरह खरीद कर लायी गई औरत को ताजिन्दगी नाच-गाने का पेशा करना
पड़ता है और इसके द्वारा कमाई गई रकम से वह व्यक्ति उसके परिजनों को दी
गई रकम की भरपाई करने के साथ ही परिवार का खर्चा भी चलाता है। इस जाति की
सबसे खास बात यह है कि कुंवारी लड़कियों से नाच-गाने का पेशा नही कराया
जाता है और न ही इसकी उनको तालीम दिलायी जाती है। केवल संविदा रीति से
ब्याही गई औरतें ससुराल में तालीम (नाच-गाना सीखना) हासिल कर इस पेशे को
अपनाती है।
आजाद भारत में ब्रजवासी समाज के भीतर औरतों की खरीद-फरोख्त की प्राचीन
कुरीति को अगर नजरन्दांज कर दिया जाये तो भी इस समाज में तमाम कुरितियां
मौजूद हैं जिसके कारण महिलाओं की स्थिति काफी दयनीय व भयावह बनी हुई है।
परम्पराओं और रूढ़ियों के बीच पली बढ़ी इस समाज की अधिकांश लड़कियां व
महिलायें अशिक्षित ‘अगूठाछाप’ हैं। इस कारण वे न जागरूक हैं और न ही अपने
अधिकारों से परिचित हैं और न ही वे महिला संरक्षण के कानूनों को जानती है
परिणामरूवरूप वे आज भी उपेक्षित और शोषित की जा रही हैं। जबकि अशिक्षा के
चलते पुरूष शराब आदि मादक पदार्थो के चुंगल में फंसे हुये हैं। इस कारण
पति-पत्नी में मारपीट, पारिवारिक कलह एवं अन्य लड़ाई-झगड़े करना इन
ब्रजवासियों में रोजमर्रा की जिन्दगी में शामिल हो गया है।
गौरतलब है कि पेट की आग शान्त करने के लिये दूसरों का मनोरंजन कर पैसे
कमाने की होड़ में शामिल ब्रजवासी परिवार के लोग बच्चों की परवरिश वाजिब
ढ़ग से नही कर पाते हैं । इनके बच्चे बाल उम्र में पढ़ने-लिखने के बजाय
बचपन से ही कुसंगतिमें फंसकर अपना भविष्य अंधकारमय बना लेते हैं। बचपन से
ही पान, बीड़ी, सिगरेट, शराब पीने की आदत पड़ जाने से तरह-तरह की
बीमारियां इन्हें पूरी जिन्दगी परेशान करती रहती हैं। कमोवेश यही स्थिति
लड़कियों की भी रहती है। शासन, प्रशासन व समाज से उपेक्षा पाने के कारण
सरकार द्वारा बाल विकास व उत्थान के लिये चलाये जा रहे तमाम योजनाओं एवं
कार्यक्रमों का लाभ ब्रजवासियों के बच्चों को नही मिल पाता है। जिससे ये
बच्चे नाच-गाने के उसी माहौल में बचपन से रम जाते हैं और बढ़ती उम्र के
साथ पुस्तैनी धन्धा अपनाकर आजीविका चलाने लगते है।
उल्लेखनीय है कि नाच-गाने का पुस्तैनी धंधा अपनाये ब्रजवासी औरतों के
लिये इसे उनके भाग्य की विडम्बना ही कही जायेगी कि मांगलिक अवसर हो या
फिर नाटक-नौटंकी अथवा डांस पार्टियां या अन्य कोई सुखद अवसर सभी में इन
औरतों द्वारा दुःखों को बनावटी मुस्कान के पीछे छिपाकर कार्यक्रम पेश
किये जाते हंै। नाच-गानों के कार्यक्रमों में समाज के ‘कुलीन व्यक्ति’
इनसे बिजली की चकाचांैध रोशनी में भरपूर मनोरंजन करते हैं। मजे की बात तो
यह है कि समाज के इन्ही ‘कुलीन व्यक्तियों’ ने ही ब्रजवासी महिलाओं को
‘तवायफ’ और ‘रण्डी’ जैसे अपमानजनक नाम दिये हैं। जिसके कारण ये महिलायें
आज भी ‘सभ्य समाज’ में हिकारत की दृष्टि से देखी जाती हंै। इसके विपरीत
इसी समाज को यथार्थ के आइने में देखा जाये तो उच्च जातियों की लड़कियां
एवं औरतें स्टेजशो अथवा आर्केस्ट्रा ग्रुपों के माध्यम से जो डांस व
गानों के कार्यक्रम पेश करती हैं उनमें ये लड़कियां इन ब्रजवासी औरतों की
अपेक्षाकृत ज्यादा ही खुला प्रर्दशन कर वाहवाही लूटती है इनको ‘कलाकार’
जैसे शब्द से नवाजा गया है।
बातचीत में समाज द्वारा स्थापित किये गये उपरोक्ब्त दोहरे मापदण्ड पर
आक्रोश जाहिर करते श्रीमती श्रृद्धादेवी कहती हैं कि हम ब्रजवासिनी एक
सीमति दायरे में रहकर अपनी कला का प्रदर्शन करके लोगो का दूर से नाच-गाकर
मनोरंजन करते हैं। किन्तु कुलीन कलाकारों ने तो सभी सीमायें तोड़ दी हंै
और फिल्मी कलाकारों की दुनिया तो हम लोगों के समाज से ज्यादा काली है।
फिर यह सम्य कहा जाने वाला समाज हम लोगो के साथ ऐसा दोहरा बर्ताव क्यों
कर रहा है? श्रीमती श्रृद्धा देवी के इस कटाक्षपूर्ण अनुत्तरित प्रश्न पर
सामाजिक संस्थाओं एवं महिला संगठनों को एक बार फिर गहराई से मन्न और
विचार करके सार्थक प्रयास भी करने होगें तभी ब्रजवासी जाति की दवी-कुचली
महिलाओं को उनका हक न्याय व समाज में इज्जत और सम्मान के साथ जीने का
मौका मिल पायेगा।
बहरहाल दीनदुनिया की तरक्की से बेखबर और समाज से उपेक्षित रहते हुये भी
भाग्य की नियति मानकर नाच-गाने का पेशा अपनाकर जीवन यापन करने वाली
ब्रजवासी महिलायें समाज की गालियां, पति की प्रताड़नाऐं खुशी-खुशी सहन
करती ही हंै और अपने गमों को भुलाकर कठपुतली की भांति पुरूषों की
अगुलियों के इशारे पर नाच-गाकर लोगों का मनोंरंजन करने में मगशूल रहती
हैं ।

गुरुवार, 4 मार्च 2010

दुधवा के बाघों पर खतरा मंडराया

                 दुधवा के बाघों पर खतरा मंडराया
             दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर एवं डिप्टी डायरेक्टर ने विगत दिनों अखबारों में यह बयानबाजी करके कि दुधवा और कतर्नियाघाट में बाघों का कुनुबा बढ़ा है, अपनी पीठ स्वयं थपथपाई है। उन्होंने तो यहां तक दावा कर दिया है कि दुधवा और कतर्नियाघाट के जंगल में 38 बाघ शावक देखे गये हैं। वैसे अगर देखा जाए तो यह अच्छी और उत्साहजनक खबर है। परंतु इसके दूसरे पहलू में उनकी इस बयानबाजी से बाघों के जीवन पर खतरे की तलवार भी लटक गई है।
              भारत में बाघों की दुनिया सिमट कर 1411 पर टिक गई है। इसका प्रमुख कारण रहा विश्व बाजार में बाघ के अंगों की बढ़ती मांग। इसको पूरा करने के लिये सक्रिय हुये तस्करों ने बाघ के अवैध शिकार को बढ़ावा दिया। जिससे राजस्थान का सारिस्का नेशनल पार्क बाघ विहीन हो गया तथा देश के अंय राष्ट्रीय उद्यानों के बाघों पर तस्करों एवं शिकारियों की गिद्ध दृष्टि जमी हुई है। जिससे बाघों का जीवन सकंट में है। ऐसे में दुधवा टाइगर रिजर्व के जिम्मेदार दोनों अधिकारियों का उक्त बयान शिकारियों के लिये बरदान बन कर यहां के बाघ शावकों का जीवन संकट में यूं डाल सकता है क्योंकि अब जो लोग यह बात नहीं जानते थे वह भी इस बात को जान गए हैं । इससे यहां के बाघों के जीवन पर खतरे की तलवार भी लटक गई है। इस स्थिति में साधन एवं संसाधनों की किल्लत से जूझ रहा लखीमपुर-खीरी का वन विभाग क्या शिकारियों के सुनियोजित नेटवर्क का सामना कर पाएगा? यह स्वयं में विचरणीय प्रश्न है। कतर्नियाघाट वंयजीव प्रभाग क्षेत्र में अभी पिछलें माह ही लगभग आधा दर्जन गुलदारों (तेदुआं) की अस्वाभाविक मौतें हो चुकी हंै। यह घटनाएं स्वयं में दर्शाती है कि कतर्नियाघाट क्षेत्र में गुलदारों की संख्या अधिक है। इस परिपेक्ष्य में वंयजीव विशेषज्ञों का मानना है कि गुलदारों की बढ़ोत्तरी दर्शाती है कि बाघों की संख्या कम हुई है। उनका कहना है कि एक ही प्रजाति का होने के बाद भी बाघ और गुलदार के बीच जानी दुश्मनी होती है, जिस इलाकें में बाघ होगा उसमें गुलदार नहीं रह सकता है। यही कारण है कि बाघ घने जंगल में रहता है और गुलदार जंगल के किनारे और वस्तियों के आसपास रहना पंसद करता है।
            दुधवा प्रोजेक्ट टाइगर का इतिहास देखा जाए तो उसकी असफलता इस बात से ही जगजाहिर हो जाती है कि पिछले एक दशक में यहां बाघों की संख्या 100-106 और 110 के आसपास ही घूम रही है। दुधवा में बाघों की मानिटरिेंग की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है फिर बाघ शावकों की सही गिनती कहां से आ गयी? वैसे भी यहां बाघों की संख्या पर भी प्रश्नचिन्हृ लगते रहे हैं। ऐसी दशा में उपरोक्त अधिकारियों की बयानजाबी पर संदेह होना लाजमी है। (लेखक वाइल्डलाइफर/पत्रकार है ं)

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

भारत की वननीति में बदलाव आवश्यक

भारत की वननीति में बदलाव आवश्यक

आजादी के बाद बनी भारतीय वननीति की समीक्षा वर्ष 1988 में की गई थी। लेकिन परिस्थितियों के अनुसार उसमें हेर-फेर किए बिना यथावत् लागू कर दिया गया, जबकि वर्ष 1975 में नेपाल राष्ट्र द्वारा अपनाई गई वननीति का भारतीय वनों पर प्राकृतिक एवं मानवजनित कारणों का विपरीत प्रभाव पड़ा है। किंतु पैंतिस साल व्यतीत हो जाने पर भी भारतीय वनों पर पड़ रहे कुप्रभावों को निष्प्रभावी करने के लिये भारत सरकार द्वारा अभी तक कोई ठोस वननीति नहीं तैयार की गई है। जबकि भारत-नेपाल सीमावर्ती भारतीय वनों पर बढ़ रहे नेपालियों के दबाव को रोकने, वन संपदा व जैव विविधता की सुरक्षा के लिये वर्तमान वननीति में बदलाव किया जाना अतिआवश्यक हो गया है।      
भारत के सभी राष्ट्रीय उद्यानों एवं वंयजीव बिहारों में दक्षिण भारत की अपेक्षा उत्तर भारत के हिमालय की तराई में आबाद राष्ट्रीय उद्यान एवं वनपशु बिहार सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील हैं। देश के वनों की सुरक्षा के लिये आजादी के बाद 1952 में पहली ‘वननीति’ बनी थी। इसके बाद बदलते परिवेश तथा समय की मांग के अनुरूप वर्ष 1978 में दूसरी वननीति बनी, जो अद्यतन यही लागू है। विडम्बना यह कही जाएगी कि इस वननीति में नेपाल राष्ट्र की सीमा पर स्थित महत्वपूर्ण जैव विविधता के संरक्षण एवं वनों की सुरक्षा को नजरन्दाज किया गया है। जबकि मित्र राष्ट्र नेपाल से भारत की लगभग 1400 किमी लम्बी सीमा सटी हुई है। सन् 1975 से पूर्व भारत-नेपाल सीमा के दोनों ओर घने वनक्षेत्र स्थित थे, जिसमें दोनों ओर के समृद्ध वनक्षेत्र होने के कारण वंय-पशुओं का आवागमन निर्बाध रूप से होता था। उत्तर भारत में हिमालय की तराई में फैले अधिकांश वनक्षेत्र की सीमा पूर्व में पश्चिम बंगाल, दार्जलिंग जिले से लेकर पश्चिम में उत्तरांचल में पिथौरागढ़ तक स्थित है। पिथौरागढ़ में काली नदी के दोनों तरफ नेपाल राष्ट्र का इलाका एवं भारत का धारचूला कस्बा आबाद है। आवागमन की दृष्टि से दुर्गम होने के बाद भी यह क्षेत्र तिब्बत में पाए जाने वाले ‘चीरू’ नामक हिरन के बालो से बने ‘शाहतूश शालों’ की तस्करी के लिये विश्व विख्यात है। अपनी अति विशेष खासियत के कारण उच्च वर्ग में इस शाहतूस शालों की खासी मांग बनी रहती है। यही कारण है कि अधिकांश वंयजीव तस्कर बाघ, तेदुंआ आदि के अंगों के बदले शाहतूस शाल प्राप्त करके उसकी तस्करी करते हैं।
गौरतलब है कि वर्ष 1975 में नेपाल राष्ट्र द्वारा अपनाई गई ‘सरपट वन कटान नीति’ के कारण हिमालय की तराई के वनाच्छादित भू-भाग से नेपाल के इलाकों से वनों का सफाया हो गया। नेपाल राष्ट्र की सुनियोजित नीति के तहत सरकार ने इन क्षेत्रों में सेवानिवृत्त नेपाली सैनिको को बसा दिया। जिसका प्रमुख उदेश्य भारतीय सीमा पर मजबूत नेपाली नागरिको की सामाजिक फौज की स्थापना था। खाली हुई वनभूमि पर आबाद हुए नेपाली फौजियों को नेपाल सरकार द्वारा प्राथमिकता से असलहों के लाईसेंस भी प्रदान किए गए। हालांकि कालान्तर में नेपाल की लोकतात्रिंक सरकारों की स्थिति आयाराम-गयाराम की रही इसके कारण इन क्षेत्रों में आबाद हुए गांव माओवादियों के गढ़ बन गए, जो अब भी नेपाल सरकार के लिये समस्या का प्रमुख कारण बने हुए हंै। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विगत साल के माह दिसम्बर में नेपाल के जिला कैलाली में जंगल के बीच अतिक्रमण करके बसे तथाकथित माओवादियों एवं नेपाली नागरिकों से वन विभाग ने भूमि को मुक्त कराने का प्रयास किया तो दोनों पक्षों के बीच हिसंक और खूनी संघर्ष हो गया जिसमें तीन नागरिक एवं दो वनकर्मी मारे गए और दर्जन भर से ऊपर लोग घायल हुए थे।
यद्यपि यह मामला नेपाल की सरकार का है वह माओवादियों से कैसे निपटती है? लेकिन नेपाल की सरपट वन कटान नीति का भारतीय वनों पर अच्छा-खासा प्राकृतिक एवं मानवजनित कारणों से भारी विपरीत प्रभाव पड़ा है। नेपाल की ओर से वन के कट जाने के कारण भारतीय क्षेत्र में स्थित प्रमुख जैवविविध क्षेत्र में जलप्लावन एवं गाद (सिल्टिंग) जमा होने की समस्या बढ़ने लगी और सीमावर्ती वनक्षेत्र सूख गए साथ ही जंगल के घास मैदानों पर भी इसका दुष्प्रभाव पड़ा जबकि मानवजनित कारणों से वनों की सुरक्षा भी प्रभावित हुई। इसके अतिरिक्त पिछले तीन-चार सालों से नेपाल से सटे भारतीय क्षेत्रों में बाढ़ की विनाशलीला का कहर भी बढ़ने लगा है। यह भी सर्वविदित है कि नेपाल, चीन, कोरिया, ताईवान आदि कई देश वंयजीव-जंतु उत्पाद के प्रमुख व्यवसायिक केंद्र हैं। जिसमें भारी मात्रा में ऊँचे दामों पर वंयजीव उत्पादों की खरीद-फरोख्त होती है। जिनके लिये कच्चा माल हिमालय एवं हिमालय की तराई में बसे जैव विविधता क्षेत्रों में उलब्ध है। ये राष्ट्र वंयजीव एवं उससे निर्मित सामग्री का आयात-निर्यात करने वाले देशों की भूमिका अदा करते हैं। इन्ही क्षेत्रों में सारा सामान विश्व बाजार में प्रवेश करता है। जहां प्रतिवर्ष 2-5 बिलियन अमेरिकी डालर का व्यापार होता है। वयंजीवों के अंगो का यह अवैध कारोबार नारकोटिक्स के बाद दूसरे नम्बर पर आता है। इस स्थिति की गंभीरता का अनुमान नेपाल राष्ट्र ने पहले ही समझ लिया था शायद इसी का परिणाम है कि नेपाल सरकार ने अपने प्रमुख राष्ट्रीय उद्यानों के वंयजीवों की सुरक्षा का दायित्व नेपाल आर्मी को सौंप दिया था। इसका परिणाम यह निकला कि नेपाली सैनिको के दबाव के कारण वंयजीव तस्कर भारत, श्रीलंका, म्यांमार, मलेशिया जैसे देशों में सक्रिय हो गए। हाल ही में यहां पकड़े गए वंयजीव अंगो के तस्कर भी अपने बयानों में स्वीकार कर चुके हैं कि नेपाल राष्ट्र के प्रमुख बाजारों में निर्बाध वंयजीवों के उत्पादों की तस्करी जारी है तथा नेपाल में एकत्र होने के बाद वंयजीवों के अंग तिब्बत, चीन, कोरिया पहुंचकर ऊँचे दामों पर बिकते हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है अपनी वनसंपदा एवं वयंजीवों की सुरक्षा के लिये नेपाल राष्ट्र ने यथोचित प्रबंध कर रखा है लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय तस्करी के मार्गो पर उसका कोई नियंत्रण नही है।
नेपाल राष्ट्र द्वारा ‘सरपट वन कटान नीति’ के अन्तर्गत बृहद पैमाने पर किए गए वन कटान का भारतीय क्षेत्रों पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से क्या प्रभाव पड़ा अभी तक इसका मूल्यांकन नहीं किया गया है। इतना ही नहीं उपरोक्त नीति के कारण भारतीय वन क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रतिप्रभाव को निष्प्रभावी करने के लिये भी कोई विशेष नीति भारत सरकार द्वारा नहीं अपनाई गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस गंभीर स्थिति का मूल्यांकन किए बगैर इसे राज्यों के ऊपर छोड़ दिया गया है। यदि पूर्व में पश्चिम बंगाल से पश्चिम में उत्ताखंड तक फैले महानंदा वंयजीव बिहार, मानस वंयजीव बिहार, बुक्सा टाइगर रिजर्व, बाल्मीकी टाइगर रिजर्व, सोहागीबरवा वंयजीव प्रभाग, सुहेलदेव वंयजीव प्रभाग, कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग, दुधवा टाइगर रिजर्व, किशनपुर वंयजीव बिहार, पीलीभीत का लग्गा-भग्गा वनक्षेत्र की स्थिति को देखा जाए तो ज्ञात होता है कि भारतीय सीमा की ओर नियंत्रण एवं संरक्षण की यथोचित व्यवस्था है परंतु नेपाल राष्ट्र की तरफ इन क्षेत्रों में पड़ने वाले विपरीत प्रभावों को न्यूनतम स्तर पर ले जाने के लिये वनकर्मी अपने को असहज महसूस करते हैं। भारतीय वनों पर लगातार नेपाली नागरिको का दबाब बढ़ता जा रहा है। जिससे वंयजीवो का अवैध शिकार हो अथवा पेड़ों को काटना हो, इसमें नेपाल नागरिक जरा भी कोताही नहीं बरतते हैं। स्थानीय स्तर के प्रंबध को यदि नजरन्दाज कर दिया जाए तो पैंतिस वर्ष बाद भी हमारे देश की वननीति में उपरोक्त कुप्रभावों को निष्प्रभावी करने के लिये अभी तक न तो कोई मूल्याकंन किया गया है और न ही नई वननीति तैयार की गई है तथा भविष्य में भी ऐसी कोई आशा दिखाई नही पड़ती है। परंतु बदलते परिवेश में अब यह आवश्यक हो गया हैै कि हिमालय एवं हिमालय की तराई में नेपाल राष्ट्र की सीमा पर भारतीय क्षेत्र में बसे जैव विविधता क्षेत्रों की सुरक्षा हेतु एक व्यवहारिक ठोस वननीति बनाई जाए, अन्यथा की स्थिति में भारतीय वनों पर नेपाल की तरफ से पड़ रहे दुष्प्रभावों के भविष्य में और भी घातक परिणाम निकल सकते हैं, इस बात से भी कतई इंकार नही किया जा सकता है। (लेखक वाइल्ड लाइफर पत्रकार है)

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

दुधवा का स्वर्णकाल अब बनकर रह गया यादगार

दुधवा पार्क की स्थापना पर विशेष- 
 दुधवा का स्वर्णकाल अब बनकर रह गया यादगार
            दुधवा राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना दो फरवरी सन् 1977 में वन प्रबन्धन, वन्यजीवों के संरक्षण व संवर्द्धन के लिये की गई थी। इसके लिये बताए गए नियम तथा कानून यथार्थ में खरे नही उतर रहें हैं। यद्यपि सन् 2000-01 से लागू किये गये दस वर्षीय मैनेजमेंट प्लान के अनुसार चल रहे कार्यो के आशातीत सफल परिणाम नहीं निकल पाये हैं। वरन् वन्यजीवों की संख्या लगातार घटती ही जा रही है। तमाम वन्यजीवों के साथ ही आमरूप से वनराज बाघ के होने वाले दर्शन अब धीरे-धीरे दुर्लभ ही होते जा रहे हैं। जिससे लग रहा है कि वन्यजीवों तथा बाघों से भरपूर दुधवा का लगभग एक दशक पूर्व वाला स्पर्णकाल लोगों के लिये भविष्य में यादगार बनकर रह जायेगा। उधर जंगल के समीपवर्ती गांवों के नागरिक जो वन एवं वन्यजीवों के संरक्षण व सुरक्षा में आगे रहकर सहभागिता करते थे वही अब पार्क कानून की पाबंदियों से उनके दुश्मन बन गए हैं। ऐसी स्थिति में आवश्यक हो गया है कि नागरिकों के हितों को अनदेखी किए बगैर वनजीवन तथा मानव के संबंधों को नई परिभाषा दी जाए तभी सार्थक व दूरगामी परिणाम निकल सकते हंै।
    उल्लेखनीय है कि सन् 1861 में अंगे्रजी हुकूमत में काष्ठ उत्पादन के लिये खैरीगढ़ परगना क्षेत्र के 303 वर्ग किमी जंगल को संरक्षित किया गया। तत्पश्चात सन 1886 में मिस्टर ब्राउन द्वारा बनाए गए वैज्ञानिक प्लान के अनुसार यहां वन प्रबंधन की शुरूआत की गई। सन् 1905 में वन विभाग का नियंत्रण हो जाने के बाद विलुप्त प्रजाति बारहसिंघा के संरक्षण के लिये 15.7 वर्ग कि0मी0 वनखेत्र को सोनारीपुर सेंक्चुरी के नाम से संरक्षित किया गया। कालांतर में वन्यजीवों के संरक्षण को ध्यान में रखकर सरकार ने इस क्षेत्रफल को बढ़ाकर 212 वर्ग किमी क्षेत्रफल को दुधवा सेंक्चुरी के रूप में संरक्षित कर दिया। सन् 1977 दो फरवरी को सरकार ने वन, वन्यजीवों के साथ ही जैव-विविधता को संरक्षण देने के लिये दुधवा राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना कर दी। 634 वर्ग किमी दुधवा के वन क्षेत्रफल में किशनपुर वन्यजीव बिहार का 204 वर्ग किमी वनक्षेत्र शामिल करके 1987 में दुधवा टाइगर रिजर्व की स्थापना की गई। सन् 1994 में 66 वर्ग किमी आरक्षित वनक्षेत्र दक्षिणी बफर के रूप में जोड़ दिए जाने के बाद कुल 884 वर्ग किमी वनक्षेत्रफल दुधवा टाइगर रिजर्व के तहत संरक्षित हो गया है।
    गौरतलब है कि वन तथा वन्यजीवों को संरक्षण व सुरक्षा देने के उद्देश्य से वनपक्षी एवं पशु संरक्षण अधिनियम 1912, भारतीय वन अधिनियम 1927 के बाद वन्यजीव-जंतु संरक्षण अधिनियम 1972 बनाया गया। इनके लगभग बेअसर रहने पर सन् 1991 एवं 2000 और इससे पूर्व भी अधिनियम में किये गये तमाम महत्वपूर्ण संशोधनों के बाद भी उत्तर प्रदेश में वनमाफिया एवं वन्यजीवों तस्करों और शिकारियों की कारगुजारियां बेखौफ जारी हैं। इसके अतिरिक्त वन्यजीवों तथा वन की सुरक्षा एवं संरक्षण के लिये राष्ट्रीय उद्यान के भी नियम कानून बने हुए हैं। जो बदलते परिवेश में अब बेमानी हो गए हंै और दुधवा राष्ट्रीय उद्यान की प्रगति में बाधक बन गए हैं। राष्ट्रीय उद्यान के कानून एवं नियमों में वन्यजीवों का जीवनचक्र प्रभावित न हो इसलिए उनके वासस्थल क्षेत्र में मानव प्रवेश निषिद्ध करके उनको प्राकृतिक वातावरण उपलब्ध कराने की इसमें परिकल्पना की गई है। साथ ही जैव विविधता को संरक्षण देने के उद्देश्य से जंगल में जो जैसा है वैसा ही रहेगा उसमें परिवर्तन न किए जाने का कानून भी बनाया गया है। किताब में तो यह कानून अच्छा है लेकिन यथार्थ के आइने में यह नियम-कानून खरे नहीं उतर रहें हैं। इस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियाँ विषम हैं और ग्रामीणजन राष्ट्रीय उद्यान बनने से पूर्व जंगल से वन उपज का लाभ लेते रहे जिस पर अब पूर्णतया प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसके कारण वन तथा वन्यजीवों के संरक्षण में संवेदनशील हो भावात्मक रूप से जुड़े ग्रामीणों का स्वभाव इनके प्रति क्रुर हो गया है तथा वन उपज की चोरी को बढ़ावा भी मिला है। यहां एक विचारणीय बात यह भी है कि वन्यजीवों द्वारा मारे गए पालतू पशु का मुआवजा जो सरकार द्वारा निर्धारित किया गया है, वह काफी कम है। जैसे बैल का 2300 रुपए, भंैसा 2500 रुपए तथा गाय-घोड़ा का 1200-1200 रुपए आदि देने के साथ ही फसल क्षतिपूर्ति भी लगभग नाममात्र निर्धारित है। जबकि दुधवा में सफलता पूर्वक चल रही गैण्डा पुर्नवासन परियोजना के तहत विचरण करने वाले 30 सदस्यीय गैण्डा परिवार के सदस्य अक्सर जंगल के बाहर आकर कृषि फसलों को भारी क्षति पहुचाते हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि लगभग 24 साल इस परियोजना को हो जाने के बाद भी प्रदेश सरकार द्वारा गैण्डा से होने वाली फसल क्षति का मुआवजा का निर्धारण अभी तक नही किया गया है। वनपशुओं से होने वाली जानमाल की क्षति की वाजिब भरपाई न होने से ग्रामीणजन हमेशा वन्यजीवों को दुश्मन की निगाह से देखते हैं।
    उधर दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना हो जाने के बाद सन् 1983 से 1993 तक वन विशेषज्ञ विश्व भूषण गौड़ द्वारा बनायी गई वन प्रबंधन कार्य योजना पर यहां कार्य किया गया। इसमें वन एवं वंयजीव संरक्षण जैव विविधता की सुरक्षा के साथ ही काष्ठ उत्पादन को भी प्रमुखता दी गई थी। तत्पश्चात सन् 1993-94 से 2000-01 तक डा0 आर0एल0 सिंह की वार्षिक कार्य योजना के तहत वन प्रंबधन किया गया। वर्तमान में यहां तैनात रहे तत्कालीन फील्ड निदेशक व अब सूबे के प्रमुख वन संरक्षक रूपक डे द्वारा तैयार की गई कार्ययोजना पर पूर्णतया वैज्ञानिक ढ़ंग से प्रबंधन किया जा रहा है। इस पर सन् 2010 तक कार्य चलेगा। इस प्लान में वैज्ञानिक ढंग से प्रबंधन, वन्यजीवों की प्रगति आधारित अनुश्रवण, आद्र क्षेत्रों का विकास, फायर कंट्रोल एवं प्राकृतवास पर प्रतिकूल कारकों को चिन्हिृत कर उनके नियंत्रण पर विशेष जोर दिया गया है। दस साल का समय व्यतीत हो रहा है लेकिन इस कार्य योजना के भी अनुकूल परिणाम नही निकले हैं। अलबत्ता अति संरक्षण के चलते मानव एवं वन्यजीवों के बीच की खाई चैड़ी ही होती जा रही है और इससे जंगल में वन्यजीवों की संख्या में भी गिरावट दर्ज हो रही है। जबकि वन विभाग लगातार कागजों में वन्यजीवों की संख्या को बढ़ाकर दर्शित करता आ रहा है। वन एवं वन्यजीवों के संरक्षण व सुरक्षा के लिये विश्व प्रकृति निधि-भारत द्वारा नई कार्ययोजना का प्रारूप तैयार किया जा रहा है। इस कार्ययोजना को तैयार करने वालों ने अगर वन्यजीवों के साथ में मानव के हितो को भी ध्यान में रखकर कार्ययोजना तैयार नही की तो शायद इसका हस्र भी पूर्ववर्ती कार्ययोजनाओं की तरह ही होगा। इस बात से इन्कार नही किया जा सकता है।
    दुधवा राष्ट्रीय उद्यान को स्थापित हुए 33 साल व्यतीत हो गए हैं। इसके लाभ-हांनि का यदि आंकलन मोटे तौर पर किया जाए तो बचे-खुचे वन तथा वन्यजीवों की सुरक्षा व संरक्षण की दृष्टि से आवश्यकता के अनुरूप किया जा रहा वन प्रबंधन समय की मांग है और इसमें सभी को सहयोग भी देना चाहिए। लेकिन संरक्षण की अधिकता में मानवहित को नजरंदाज किया जा रहा है इससे आशातीत परिणाम नहीं निकल रहें हैं। वन विभाग तथा आमजनता के बीच बढ़ी दूरियां वन प्रबंधन के लिये हितकर नहीं कही जा सकती हैं। इसका प्रत्यक्ष परिणाम है पिछले पांच साल में वन्यजीवों की लगातार घटती संख्या है। पार्क स्थापना से पूर्व जब जंगल में मानव प्रवेश निषेद्ध नहीं था; तब घास-फूस, जलौनी लकड़ी आदि वन उपज का लाभ ग्रामीणों को दिया जाता था; अब इसे ग्रासलैण्ड मैनेजमेन्ट के तहत जलाया जाता है। इससे जमीन पर रेंगने वाले जीव-जंतु जलकर मर जाते हैं तथा कीमती लकड़ी जिसे बंेचकर राजस्व प्राप्त किया जा सकता है वह भी कोयला बन जाती है। वन विभाग संरक्षित वन क्षेत्र को पूर्णतया निषिद्ध बनाने के प्रयास में लगा हुआ है। इससे प्राकृतिक परिस्थितियां तो उत्पन्न हो जाएगीं। किंतु जो परिणाम अब तक नही निकल पाए हैं इससे सार्थक दूरगामी परिणाम क्या निकल पाएगें। इस पर सवालिया निशन पूर्ववत् लगा हुआ है। बढ़ती जनसंख्या, बदलते परिवेश एवं विषम परिस्थितियांे में यह आवश्यक हो गया है कि अब वन एवं वन्यजीवों तथा मानव के संबंधों को नई परिभाषा दी जाए जिससे मानव का भावात्मक लगाव वन्यजीवों के प्रति पैदा हो सके। इसको नजरदंाज करके उठाए गए कदम फलदायक कदापि नहीं होगें। (लेखक वाइल्ड लाईफर एवं पत्रकार है)

शनिवार, 30 जनवरी 2010

आजाद हुआ सुरमा


आदिवासी ग्राम सुरमा में वनाधिकार कानून के तहत मिली  आजादी






हिन्दुस्तान की आजादी के 62 वर्ष बाद उत्तर प्रदेश के जनपद खीरी स्थित दुधवा नेशनल पार्क के कोर जोन में बसा आदिवासी जनजाति थारू क्षेत्र के ग्राम को पिछले 33 साल से अपने वजूद को बचाने के लिये जद्दोजहद कर रहे सुरमा गांव को आखिर आजादी मिल ही गई। यह आजादी भी देश में लागू किये गये वनाधिकारी अधिनियम के तहत हासिल हुई है। इससे पूर्व जंगलात के कानून एवं वन विभाग कर्मचारियों द्वारा किये जाने वाले उत्पीड़न एवं शोषण से मिल रही मुक्ति से ग्रामीणो में खासा उत्साह देखा जा रहा है।

रविवार, 10 जनवरी 2010

अपने घर में सुरक्षित नही रहें बाघ





उत्तर प्रदेश के दुधवा नेशनल पार्क की सीमा से सटे नार्थ खीरी वनक्षेत्र एवं उत्तराखंड के जिम कार्बेट नेशनल पार्क में एक-एक बाघ की जनवरी के प्रथम सप्ताह में हुई बाघों की अस्वाभाविक मौतों ने पूरे देश में खासी सनसनी फैला दी है यह भी तब हुआ है जब दुनिया भर के बाघो की दयनीय स्थिति पर विचार करने के लिये इस साल माह सितम्बर मे रूस विश्व शिखर वार्ता का आयोजन करने जा रहा है। जिसमें बाघ के सवाल पर दुनिया के केन्द्र में भारत इसलिये है क्योंकि संसार भर के जंगलों में मौजूद बाघों में 60 प्रतिशत बाघ भारत में रहते हैं। जंगल की शान बाघ पर संकट के बादल मड़रा रहे हैं। तमाम सरकारी, गैर सरकारी प्रयासों के बाद भी बाघों की दुनिया सिमटती जा रही है। यदि यही क्रम रहा तो सम्भव है कि हमारी आने वाली पीढ़ी को बाघ के दर्शन किताबों या अजायबघरों में ही हो सकेगंें। बाघ जहां वनों के विनाश एवं राजा रजवाड़ों, नबावों मे शिकार के शौक का निशाना बना रहा वहीं आज अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में उसके शरीर के अवयवों की बढ़ती मांग भी विनाश का एक प्रमुख कारण है। कुल मिलाकर भारत में बाघों की घटती संख्या बेहद चिंता का विषय है।
आधुनिक सभ्यता एवं संस्कृति के विकास के पूर्व ही बाघ एक धार्मिक तथा रहस्य मय संास्कृतिक प्रतीक के रूप मंे हमारी श्रृद्धा का प्रतीक रहा है। आधुनिक विज्ञान ने भी इस बात की पुष्टि की है कि हमारे पूर्वजों ने मानव तथा प्रकृति के सम्बन्धों के रूप मंें इस शक्तिशाली शिकारी जीव की संकल्पना केवल भावुकता से प्रेरित होकर नही की। हमारे प्राचीन ग्रंथो में तो वन्यजीवों की रक्षा का समुचित प्राविधान का उल्लेख है। धार्मिक अवस्थाओं से जोड़कर अनेक जीवों की युगो तक रक्षा की जाती रही है।
आखेट का रोंमांच, एशिया के कुछ एक देशो में बाघ के शरीर को अवयवों की बढ़ती मांग वन्यजीवों के व्यापार में मुनाफा, मानव द्वारा प्रकृति मंे स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने की प्रवृत्ति आदि ने जंगल का राजा कहे जाने वाले बाघ के अस्तित्व पर संकट पैदा कर दिया है। सरकार द्वारा वन्यजीवों की सुरक्षा के लिये जहां बनाये गये प्राणि उद्यान एवं अभ्यारण्य मात्र दिखावा साबित हो रहे हैं, वहीं बाघों के संरक्षण के लिये राष्ट्रीय उद्यानों में चल रहा प्रोजेक्ट टाइगर भी असफलता एवं नाकामी के पर्याय बन गये हंै। सरकारी नीतियों एवं वन्य संरक्षण विभाग, वन विभाग बड़े पैमाने पर हो रहे बाघ के शिकार को रोकने में असमर्थ ही नजर आ रहे हैं। इसका प्रमाण यह है कि राजस्थान के सारिस्का राष्ट्रीय उद्यान एवं मध्य प्रदेश के पन्ना नेशनल पार्क से बाघ विलुप्त हो चुके हैं, जबकि बिहार के बाल्मीक नगर सेंक्चुरी से पिछले 05 साल के भीतर बाघों की संख्या 54 से घटकर 09 पर टिक गई है। उत्तराखंड के जिम कार्बेट नेशनल पार्क में भी आधा दशक पहले 150 से ऊपर रही बाघों की संख्या 100 के आस-पास पहुच गई है। कमोबेश यही स्थिति दुधवा नेशनल पार्क की भी है। यद्यपि पार्क प्रशासन यहां 106 बाघों के होने का दावा करता है। किन्तु अगर स्वर्गीय पद्मश्री अर्जन सिंह द्वारा कही गई बात को माना जाय तो दुधवा में केवल 03 दर्जन के आस-पास ही बाघ बचे हैं। 
भारत में बाघों को बचाने के लिये 17 प्रदेशो में 23 संरक्षित क्षेत्र बनाये गये हैं, जिसमें ताजा आकंडो के अनुसार 1,411 बाघों की उपस्थिति का दावा किया जा रहा है लेकिन इस पर भी तमाम संगठनों द्वारा उगलियां उठाई जा रही है। भारत में बाघो की दयनीय स्थिति को सुधारने के लिये वर्ष 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया गया, तब बाघों की संख्या दो हजार के आस-पास थी। जो वर्ष 2002 में बढ़कर तीन हजार छः सौ बाईस तक पहुच गई थी। यह भी तब सम्भव हुआ था जब पर्यावरण एवं वन्यजीव प्रेमी तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरागांधी व राजीव गांधी ने वन व बाघ को बचाने के लिये स्वयं दिलचस्पी दिखाई थी। उसके बाद एक बार फिर बाघांे का बेतहासा अवैध शिकार हुआ। राजस्थान का सारिस्का राष्ट्रीय उद्यान जब बाघों से खाली हो गया तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सारिस्का का भ्रमण करके देश में बाघों की घटती संख्या पर चिंता जाहिर की थी। इसके बाद जून 2006 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की तीसरी बैठक हुई। जिसमें बाघों के संरक्षण हेतु राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण तथा वन्यजीवों से जुड़े अपराधांे को प्रभावी ढं़ग से रोकने के लिये राष्ट्रीय वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो के गठन का निर्णय लिया गया था। परन्तु केन्द्र सरकार द्वारा किये गये अबतक के प्रयास बाघ तक पहुंचते-पहुंचते भटक जाते हैं जिससे बाघो की दशा बद् से बद्तर होती जा रही है। इसका प्रमुख कारण है कि बाघों के प्राकृतिकवासों का अन्धाधुंध विनाश हुआ एवं कंकरीट के जंगलों की बेतहासा वृद्धि हुई, जिसमें मानव की बढ़ती आबादी व अनियंत्रित औद्योगिक विकास का भी योगदान है। बाघों के प्राकृतिक आवासों के निकट बस्तियां बसीं और बिना सोचे विचारें औद्योगिक गतिविधियों में विद्युत उत्पादन, उत्खनन आदि परियोजनाओं से पर्यावरण को क्षति पहुची है। जिससे बाघों के शरणगाह कम हुये। फलस्वरूप बाघ ऐसे स्थलों पर पहुच जाता है जहां उसका शिकार आसानी से हो जाता है। इसके अलावा प्राकृतिक आपदाओं एवं मानवजनित समस्यों के कारण जंगल मे बाघ द्वारा खाये जाने वाला शिकार भी कम हुआ है। बाघों को बचाने के लिये सबसे पहले कोशिश जंगलों को बचाने की करनी होगी।
बाघो का शिकार एवं वन्यजीवों की तस्करी का धंधा पूरे विश्व में पनपा, मगर भारतीय बाघ के शिकार को प्रोत्साहन दिया है चीन, दक्षिण कोरिया, ताईवान, हांगकांग आदि दक्षिण एशिया के परम्परागत दवा के व्यापारियों ने। बाघों के अवयवों से कामोत्तेजक पदार्थो के बढ़ते प्रचलन नें बाघ के अवैध शिकार को भी गति दी है। इसके फलस्वरूप भारतीय बाघ के अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है। बाघों के शिकार और घटती संख्या पर देश के पर्यावरण एवं वनराज्य मंत्री जयराम रमेश भी मान चुके है कि देश में बाघों का बड़े पैमाने पर शिकार हो रहा है और बाघों की खाल की तस्करी मादक द्रव्यों के बाद दूसरे नम्बर पर आती है। उन्होने यह भी माना है कि बाघों के संरक्षण का जिम्मा राज्य सरकारों पर नही छोड़ा जा सकता है।
भारत सहित दुनिया के 12 देशो मे पाया जाने वाला बाघ कहीं भी सुरक्षित नही है। इस गम्भीर स्थित में भी अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, भारत आदि 07 देशांें को बाघों की तस्करी के खिलाफ सामूहिक अभियान छेड़ने के लिये एक जुट किया था। लेकिन इस संदर्भ में भारत और चीन के बीच वर्ष 1995 में हुये प्रोटोकाल समझौते की विफलता को देखते हुये बाघों के शिकार से जुड़ी आंशकाएं तिरोहित नहीं होती हैं। वन्यजीवों से जुड़ी वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट आफ इण्डिया भी बाघों की संख्या में आई गिरावट के लिये तस्करी को सबसे बड़ी वजह मानता है। इसलिये देश को अपने बाघों के संरक्षण के लिये खुद चिंता करनी होगी। 
जंगल में जंगलराज है वन संरक्षण अधिनियम, वन्यजीव-जन्तु संरक्षण अधिनियम, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है। इसे केन्द्र एवं राज्य सरकारें नही रोक पाई हैं। विभिन्न योजनाओं के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव के अध्ययन को बनी विशेषज्ञों की समिति की सिफारिशें अलमारियों में बन्द हैं। बाघ के भविष्य को बचाने के लिये वन्यजीव सरंक्षण से जुड़े वैज्ञानिकों के तकनीकी कौशल की भी निरन्तर उपेक्षा जारी है। केन्द्र और प्रदेशों की अफसरशाही केवल ऐसे आकड़ें तैयार करने में जुटी है जिससे विश्व को बताया जा सके कि बाघ सुरक्षित हैं। इसलिये शिकार की असली तस्वीर नहीं उभर पाती है। केन्द्र सरकार को इस बात का खतरा रहता है कि यदि शिकार की वास्तविक स्थिति का पता चल गया तो अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं और वन्यजीव संरक्षण के नाम पर मिल रही मदद समाप्त हो जायेगी।
आज समय की मांग है कि बाघ संरक्षण के लिये चल रहे प्रोजेक्ट टाइगर में पारदर्शिता लाई जाय एवं वन प्रबन्धन व वन्यजीव संरक्षण को अलग-अलग किया जाय तथा वनक्षेत्र के निकट रहने वाली जातियों का विश्वास पुनः हासिल किया जाय। जरूरी है कि जंगल और मानव के रिश्तांे को नई परिभाषा दी जाए। सरकार को चाहिये कि वह सुरक्षित क्षेत्रों एवं बाघ के प्राकृतिक आवास स्थलों के निकट रहने वाले लाखों लोगों को रोजगार की गारन्टी दे तथा प्राकृतिक संसाधनों में उनका अधिकार बरकरार रखा जाय। इन्हीं समन्वित प्रयासों से ही बाघ के अस्तित्व की रक्षा हो सकेगी। अन्यथा की दशा में वनराज बाघ किताबो के पन्नो में सिमट जायेगें।(लेखक वाइल्डलाईफर एवं पत्रकार है)



शनिवार, 9 जनवरी 2010

खीरी में बाघ मारा गया

                दुधवा नेशनल पार्क की सीमा से सटे नार्थ खीरी फारेस्ट डिवीजन की पलिया रेंज के तहत पांच जनवरी को  परसपुर वन चौकी से २०० मीटर दूर ८-९ साल के बाघ का शव पाया गया. अनुमान है कि शिकारियों ने इस बाघ को बिजली के तारों में फाँस कर मारा होगा, वन विभाग ने इस घटना को छिपाने का भरसक प्रयास किया शायद इसी लिए रात २.०० बजे शव को पोस्टमार्टम के लिए आई.वी.आर.आई बरेली को भेज दिया.येसी क्या जरूरत थी कि शव को रात में ही भेजना जरूरी था ? विभागीय अफसर अब यह कहकर अपनी नाकामी छिपा रहें हैं कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के कारणों का पता लग पाएगा.  इससे पूर्व भी विगत साल इसी छेत्र में एक बाघ का शव पाया गया था. इस जंगलात में बाघों की चहलकदमी होती रही है इसके बाद भी इनकी सुरछा के पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं किए गए ?  इससे लगता है कि वन महकमा बाघों की सुरछा में लगातार लापरवाही बरत रहा है. 
वन विभाग द्वारा इसी तरह बाघों की सुरछा में लापरवाही एवं उदासीनता बरती जाती रही तो खीरी के जंगलों से बाघ गायब हो जाएँगे. विभाग के आलाफसरों की जवाबदेही तय करके उनके खिलाफ कार्यवाही की जानी चाहिए .ताकि आने वाले दिनों में यहाँ के बाघों का भविष्य सुरछित रह सके.


रविवार, 3 जनवरी 2010

दुधवा के टाईगरों के रखवाले विली अब इतिहास बने

           दुधवा नेशनल पार्क के बाघों के रखवाले ही नहीं वरन यूपी के विश्व बिख्यात वन्यजीव प्रेमी पद्मश्री विली अर्जन सिंह २०१० के प्रथम दिन यानी ०१ जनवरी की रात ०९ बजे इस दुनिया से विदा लेकर स्वर्ग में अंतर्ध्यान हो गये. उनकी दुखद मौत की सूचना पर वन्यजीव प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई. उनके साथ ही ईस्टमित्रों ने श्री विली के अंतिम दर्शन करके शोक सवेंदनाये ब्यक्त की . यह श्री विली के भाग्य की विडम्बना कही जाए या फिर शासन=प्रशासन की असवेद्न्सीनता कि कोई भी अधिकारी सही विली के आवास पर शाम तक झाँकने नहीं गया. इससे वन्यजीव प्रेमियों की भावनाओं को करारा झटका लगा है. 
             वैसे अगर यह कहा जाये तो विली के लिए यह बात भी बिलकुल सटीक बैठती है कि जंगल के बाघ को  बनराज कहा जाता है वह पूरी जिन्दगी अपना कुनबा बडाता है और  जब उसकी मौत होती है तो उसके करीब कोई नही होता है. यही हाल कुछ दुधवा के टाईगर यानी विली अर्जन सिंह के साथ हुआ. उनकी भी जब मौत हुई तो अंतिम घड़ी में श्री विली के पास उनका कोई अपना नही था यानी कोई सगा-सम्बन्धी. उनके करीब थे केवल उनके सेवादार, जो हमेशा उनके सुख-दुःख में साथ रहते थे. दुसरे करीबी मित्र थे उनके पास पास डब्ल्यू.डब्ल्यू. ऍफ़. के मुदित गुप्ता.हालाँकि श्री विली आजीवन कुंवारे रहे और अपना पूरा जीवन बाघों को बचाने में लगा दिया. वन्यजीवों से उन्हें बहुत लगाव था. श्री विली का  कहना था कि इस धरती पर अगर बाघ नही रहे तो मानव जीवन भी नही रहेगा दुनिया नस्ट हो जायेगी.      
           १५ अगस्त १९१७ को गोरखपुर में पैदा हुए विली अर्जन सिंह का पटियाला के राजघराने से ताल्लुक था सेना में कैप्टन की नौकरी से त्यागपत्र देने के बाद उहोंने  आजादी से कुछेक साल पहले इस तराई छेत्र को अपनी कर्मभूमि बनाया. श्री विली का कहना था कि १२ साल की उम्र में एक बाघ को गोली मारी थी. उसके बाद केवल उन बाघों को ही गोली का निशाना बनाया जो नरभक्छी हो चुके थे. एक जमाने में मशहूर शिकारी रहे विली अर्जन सिंह की ख्याति बाघों के रखवाले के रूप में देश-विदेश तक फ़ैली. वन्यजीवों को सुरछा देने के लिए दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना में श्री विली का महत्वपूर्ण योगदान रहा. 
          इंग्लैड में एक पार्क से तत्कालीन प्रधानमन्त्री स्व. इंदिरा गांघी को  मिली सायवेरियन प्रजाति की  बाघिन तारा को पालकर अंगुली पर नचाने वाले श्री विली अंतर रास्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुए.हलाकि नरभक्छी होने पर तारा को गोली का निशाना बनाकर मौत दी गई थी.  उन्होंने हैरिएट और जूलियट नाम के दो तेदुआं भी पाले जो बड़े होकर जंगल में भाग गये थे. इनके पास एक कुतिया भी रही जिसे वह अत्यधिक प्यार करते थे. कुतिया और तारा एक साथ कटोरी में दूध पीतीं थी. 
          वन्यजीव की रखवाली में जीवन ब्यतीत करने वाले श्री विली को १९७३ में पद्मश्री, 2006 में पद्म भूषण, 2005 में पालगेटी, २००६ में यश भारती, तथा डब्ल्यू.डब्ल्यू. ऍफ़ से गोल्ड मैडल एवं एवीएन एमसेका लाईफ टाईम एचीवमेंट अवार्ड मिला. श्री विली ने बाघों की रहस्यमय दुनिया और उनके जीवन पर आधा दर्जन किताबें भी लिखी. श्री विली अरेबियन नाईट आदि उपन्यासों के भी शौक़ीन थे. उनके पुस्तकालय विश्व के मशहूर उपन्यासकारों की  दुर्लभ पुस्तकें भी मौजूद है. 
         विली अर्जन सिंह की  मौत के साथ ही दुधवा के बाघों का हितैषी ही नही वरन यूपी से वन्यजीवों के रछकों की कतार का शिरमौर पुरोधा का अंत हो गया है. जिसकी पूर्ति अब असम्भव है. उनका जीवन सघर्षशील रहा और वे हमेशा वन्यजीवों को बचाने में लगे रहे उनके कार्यों को न वन विभाग भुला पाएगा और न ही वन्यजीवप्रेमी.श्री विली की अंतिम इच्छा के अनुरूप उनके शव को टाईगर हैवन के प्रागण में सुपुर्दे-खाक किया गया, इस मौके पर वन विभाग के अफसर, डब्ल्यू डब्ल्यू ऍफ़ के अधिकारी, तमाम वन्य  जीवप्रेमी, नाते-रिश्तेदार, सेवादार, पत्रकार, गणमान्य नागरिक तथा प्रशासनिक व् पुलिस के स्थानीय अधिकारी तो मौजूद रहे.
दुधवा के टाईगरों के रखवाले विली अब इतिहास बने