Wildlife Photography, a group on Flickr.
स्रष्टि कंजर्वेशन एंड वेलफेयर सोसाइटी [पंजीकृत] वन एवं वन्यजीवों की सहायता में समर्पित Srshti Conservation and Welfare Society [Register] Dedicated to help and assistance of forest and wildlife
शनिवार, 3 सितंबर 2011
गुरुवार, 18 अगस्त 2011
शनिवार, 30 जुलाई 2011
सोमवार, 2 मई 2011
सुरमा में मनाया गया जश्ने आजादी दिवस
दुधवा/सूरमा-खीरी। आदिवासी जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी अधिनियम यानी वनाधिकार कानून का लाभ लेने वाले पलिया तहसील के ग्राम सूरमा तथा गोलबोझी देश के ऐसे पहले ग्राम हो गए हैं जिनको नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व क्षेत्र के जंगल में रहने के बाद भी इस कानून के तहत घर एवं खेती वाली जमीन का मालिकाना हक मिल गया है।
संघर्ष की चौथाई शताब्दी तक अधिकार की लड़ाई लड़ने के बाद मिली विजय पर सूरमा में जश्ने आजादी धूमधाम से मजदूर दिवस के अवसर पर मनाया गया। जिसमें भारी संख्या में लोगों ने गाजा-बाजा के साथ नाच-गाकर जमकर आजादी का जश्न मनाया।
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| सुरमा में मनाया गया विजय दिवस |
केन्द्र सरकार के बनाए गए आदिवासी जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी अधिनियम के तहत पलिया तहसील के आदिवासी जनजाति थारू क्षेत्र के ग्राम सूरमा एवं गोलबोझी के निवासियों को घर एवं कृषि जमीन का मालिकाना हक मिल गया है। विगत आठ मार्च को गांव पहुंचे डीएम समीर वर्मा ने वर्षो से वन विभाग की गुलामी में जीवन गुजारने वाले थारू परिवारों को अधिकार पत्र सौंपकर एक नए इतिहास की शुरूआत कर की।
इससे पूर्व सूरमा और गोलबोझी के थारू परिवार वन विभाग के रहमोकरम पर जीवन गुजारने के साथ ही उनके उत्पीड़न एवं शोषण का शिकार बनकर आजाद भारत में गुलामों जैसा जीवन गुजारने को विवश थे। गांवों में न सड़क, बिजली और न स्कूल बन सके यहां तक थारूजन पक्का मकान भी नहीं बना सकते थे।
वनाधिकार कानून के तहत मालिकाना हक मिल जाने के बाद अब गांवों में विकास को गति मिलेगी। दुधवा नेशनल पार्क के जंगल के बीचोंबीच रहने वाले सूरमा के निवासियों ने वन विभाग से हक पाने के लिए चौथाई शताब्दी यानी करीब 25 साल तक कोर्ट कचेहरी का संघर्ष किया इस लड़ाई को विजय मिली वनाधिकार कानून से। इसमें राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच के अशोक चौधरी, रोमा एवं
रजनीश आदि के साथ ही घटक संगठन आदिवासी थारू महिला किसान मंच एवं राज्य स्तरीय वनाधिकार समिति के सदस्य रामचंद्र राणा आदि का सक्रिय सहयोग रहा। परिणाम स्वरूप सूरमा देश का ऐसा पहला ग्राम बन गया है जिसे नेशनल पार्क एवं टाइगर रिजर्व के बीच में होते हुए भी वनाधिकार कानून का लाभ मिला है। वन विभाग की गुलामी से मिली आजादी का जश्न ग्राम सूरमा में एक मई को मजदूर दिवस पर धूमधाम से मनाया गया। मजदूर दिवस के अवसर पर ग्राम सूरमा में मनाए गए विजय दिवस पर हुई सभा में वक्ताओं ने कहा कि
प्रदेश सरकार वनाधिकार कानून को लागू कराने के लिए गंभीर है परन्तु प्रशासन एवं वन विभाग के अधिकारी इसमें अडं़गा डाल रहे हैं। थारू क्षेत्र के प्रमुख कस्बा गौरीफंटा एवं चंदनचौकी आदि गांवों में दी गई नोटिसें गैर कानूनी है और संसद का अपमान है।
जनसभा को संबोधित करते हुये राष्ट्रीय वनजन श्रमजीवी मंच के अध्यक्ष अशोक चौधरी ने कहा कि उप्र ही नहीं वरन् महाराष्ट्र में भी आदिवासियों को वनाधिकार का लाभ दिया जा रहा है यूपी की सरकार बधाई की पात्र है वह वनाधिकार को लागू करने के लिए प्रयासरत है परन्तु प्रशासन एवं वन विभाग इसमें अडं़गा डाल रहा है वनाधिकार कानून को पूरी तरह से लागू करने के लिए संघर्ष जारी रहेगा। सोनभद्र की शांता भट्टाचार्य, देहरादून के मन्नी लाल, रोमा, प्रदुमन आदि ने विजय दिवस क्यों मनाया जा रहा है इस पर विस्तार से प्रकाश डाला। संचालन करते हुए मंच वरिष्ठ कार्यकर्ता के रजनीश ने कहा कि सूरमा को मिला वनाधिकार ऐतिहासिक है जो एक नजीर बन गया है इससे नेशनल पार्को एवं टाइगर रिजर्व क्षेत्रों में रहने वाले हजारों गांवों के आजाद होने का नया रास्ता मिल गया है। उन्होंने कहा कि
गौरीफंटा एवं चंदनचौकी समेत अयं गांवों को दुधवा पार्क ने नोटिसें जारी की है जो गैर कानूनी है और संसद का अपमान है। इन गांवों के संबंध में तय करने का अधिकार केवल ग्राम स्तरीय वन समिति को है।
उन्होंने कहा कि प्रशासन की मनमानी जारी रही तो आंदोलन चलाया जाएगा। सभा की अध्यक्षता ग्राम की थारू महिला झुलसी देवी ने की। राज्यस्तरीय वनाधिकार समिति के सदस्य रामचंद्र राणा ने सभी के प्रति आभार जताया। ग्राम में शाम 5 बजे मजदूर दिवस के अवसर पर जश्न-ए-आजादी की विजय पताका फहराई गई। इस अवसर पर थारू क्षेत्र के सभी गांवों के साथ सोनभद्र, मिर्जापुर, पीलीभीत, सहारनपुर, दिल्ली, लखनऊ, मोहम्मदी आदि तमाम गांवों के हजारों लोग उपस्थित रहे।
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| वनाधिकार कानून से वच्चों के भविघ्य में छाएगा उजाला |
गुरुवार, 21 अप्रैल 2011
दुधवा के लिए सुहेली बनी अभिशाप
दुधवा नेशनल पार्क मध्य तथा किनारे प्रवाहित होने वाली सुहेली नदी कभी अपने समीपवर्ती
वन्यजीवों को पानी देकर उनकी प्राणदायिनी होती थी। लेकिन सिलटिंग और प्राकृतिक परिवर्तन के चलते अब उनके विनाश का कारण बनती जा रही है। इसके अतिरिक्त नदी से सटा ग्रामीमांचल भी इसमें बार-बार आने वाली बाढ़ की त्रासदी झेलकर बर्बादी की कगार पर पहुंच गया है।
उल्लेखनीय है कि नेपाल से निकली सुहेली नदी वर्षा में पानी के साथ मिट्टी- बालू साथ लाती है। इसका जमाव (सिलटिंग) होने के कारण नदी के गहराई कम हो गई इससे आसपास के निचले भूभागों में भी सिलटिंग होने से वे उंचे हो गए है। इसके कारण कभी समीपवर्ती नकउहा नाला का पानी निर्वाध रूप से नहीं निकल पा रहा है। परिणाम स्वरूप नदी ने नया चैनल पीपी नाला बना दिया है, साथ ही प्रेम पुलिया नाला से जो पानी सुहेली में जाता था उसकी भी वापसी होने लगी
है। इस तरह नकउहा पुल से सुहेली पुल तक पीडब्लूडी रोड के दोनों तरफ से सुहेली नदी का पानी नकउहा नाला में तेज गति से आ रहा है। इसके कारण पीपी नाला द्वारा किए जाने वाले कटान की चपेट में जहां जंगल आ रहा है वहीं दुधवा रोड के किनारों का कटान भी हो रहा है इससे कई स्थानों पर पीपी नाला के कटान का खतरा सड़क पर बढ़ता ही जा रहा है। लेकिन पीडब्लूडी द्वारा कटान की रोकथाम के प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। कटान का दायरा बढ़ता गया तो निकट भविष्य में दुधवा रोड का नामोनिशान खत्म हो जाएगा तब नेपाल सहित आदिवासी जाति थारू क्षेत्र के 45 गांवों समेत दुधवा का सम्पर्क कट सकता है। गौरतलब यह भी है कि सुहेली नदी में हुए इस प्राकृतिक परिवर्तन का दुष्प्रभाव समीपवर्ती ग्रामीणांचल पर भी पड़ने लगता है। थोड़ी वर्षा होते ही उफनाई सुहेली नदी का पानी आसपास के गांवों एवं खेतों में भर जाता है जिसमें सर्वाधिक नुकसान फसलों को को होता है। तथा ग्रामीण भी बार-बार आने वाली बाढ़ की त्रासदी झेलने को विवश हो जाते हैं।
सुहेली नदी अब वन्यजीवों की दुश्मन बन गई है। इससे होने वाली सिलटिंग से सैकड़ों एकड़ हरा भरा जंगल सूख गया है तथा निचले भागों के चारागाह सिमट गए है। इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव बारहसिंघों के जीवन चक्र पर पड़ने लगा है जबकि अन्य स्थानों की तलाश में गांवों की ओर आते हैं जहां उनका अवैध शिकार करने से ग्रामीण परहेज नहीं करते है। इससे वन्यजीवों की संख्या में लगातार गिरावट आने लगी है। यद्यापि शासन प्रशासन द्वारा सुहेली नदी की सफाई-खुदाई पर करोड़ों रूपया खर्च किया जा चुका है जो ठेकेदारों और अफसरों की बंदरबाट की भेंट चढ़ गया। जिससे नतीजा शून्य ही निकला है। परिणाम स्वरूप सुहेली नदी अब समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्र जंगल एवं वन्यजीवों के विनाश का कारण बनने लगी है। बावजूद इसके पार्क प्रशासन के जिम्मेदार अफसर मूक-बघिर बने सुहेली नदी क बिनाश देख रहें हैं।
सुहेली नदी अब वन्यजीवों की दुश्मन बन गई है। इससे होने वाली सिलटिंग से सैकड़ों एकड़ हरा भरा जंगल सूख गया है तथा निचले भागों के चारागाह सिमट गए है। इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव बारहसिंघों के जीवन चक्र पर पड़ने लगा है जबकि अन्य स्थानों की तलाश में गांवों की ओर आते हैं जहां उनका अवैध शिकार करने से ग्रामीण परहेज नहीं करते है। इससे वन्यजीवों की संख्या में लगातार गिरावट आने लगी है। यद्यापि शासन प्रशासन द्वारा सुहेली नदी की सफाई-खुदाई पर करोड़ों रूपया खर्च किया जा चुका है जो ठेकेदारों और अफसरों की बंदरबाट की भेंट चढ़ गया। जिससे नतीजा शून्य ही निकला है। परिणाम स्वरूप सुहेली नदी अब समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्र जंगल एवं वन्यजीवों के विनाश का कारण बनने लगी है। बावजूद इसके पार्क प्रशासन के जिम्मेदार अफसर मूक-बघिर बने सुहेली नदी क बिनाश देख रहें हैं।
| सुहेली नदी के दुष्प्रभाव से सूखने लगा है हरा-भरा जंगल |
सोमवार, 18 अप्रैल 2011
वनाधिकार क़ानून आदिवासी का बना हथियार
सूरमा हिन्दुस्तान का पहला ग्राम वन गया है जिसे नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व क्षेत्र के बीच में आबाद होने के बावजूद वनाधिकार कानून का लाभ दिया गया है
दुधवा नेशनल पार्क के मध्य आबाद ग्राम सूरमा में आयोजित किए गए शिविर में जिलाधिकारी समीर वर्मा ने केन्द सरकार के ऐतिहासिक अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 एवं नियम 2007 के तहत 289 थारू परिवारों को उनके घर, खेत और खलिहान के मालिकाना हक का प्रमाण पत्र दिया। श्री वर्मा ने कहा कि प्रयास करके एक साल के भीतर वनाधिकार कानून को लागू कराया गया है। श्री वर्मा ने सभी से वन एवं वन्यजीव संरक्षण व सुरक्षा में पूरा सहयोग दिए जाने की अपील की। उन्होंने वताया कि सूरमा ग्राम अम्वेडकर ग्राम विकास योजना में चयनित है शीघ्र ही विकास के कार्य शुरू कराए जाएगें। डीएम समीर वर्मा ने ग्राम सूरमा में 289 थारू परिवारों को 625,477 हेक्टैयर वन भूमि के मालिकाना हक के अधिकार पत्र दिए। इसमें आवास के लिए 32,637 हेक्टैयर एवं कुषि हेतु 592,84 हेक्टैयर जमीन के अधिकार पत्र अिए गए हैं। डीएम समीर वर्मा ने वताया कि दिए गए अधिकार पत्रों के अनुसार जमीन को राजस्व अभिलेखों में दर्ज कर दिया गया है। 23 साल की लम्वी लड़ाई लड़ने के बाद मिली सफलता के वाद सूरमावासियों में खुशी की लहर दौड़ गई है। गोलवोझी में वितरित किए कुल 58 अधिकार पत्र के तहत 47,842 हेक्टैयर जमीन परउनको मालिकाना हक दिया गया है। इसमें आवास के लिए 3,588 हेक्टेयर तथा कृषिकी 40,245 हेक्टेयर वन भूमि पर मालिकाना हक दिया गया है। डीएम समीर वर्मा ने कहा कि सामुदायिक अधिकारों के लिए शीघ्र ही दावा फार्म भरवाए जाएगें। उन्होंने थारूजनों से वन एवं वंयजीवों की सुरक्षा एवं संरक्षण के कार्यो में सक्रिय सहयोग दिए जाने की अपील की। अधिकार पत्र मिल जाने के बाद घने जंगल के बीच बेवशी व जीवन गुजारने वाले थारू परिवारों के लिए नए युग की शुरूआत का सूरज उदय हुआ है।
आदिवासी जनजाति थारूक्षेत्र में आबाद ग्राम सूरमा देश का पहला ग्राम बन गया जो नेशनल पार्क एवं टाइगर रिजर्व क्षेत्र में बसे होने के बाद भी उसे बनाधिकार कानून का लाभ मिला है। हालांकि थारूओं को यह सफलता एक लम्बी लड़ाई लड़ने के बाद मिली है। वर्षों से भारत-नेपाल सीमावर्ती जंगल के बीच आवाद थारू ग्राम सूरमा को 1978 में जब थारू क्षेत्र के 37 ग्रामों में से 35 ग्राम राजस्व में शामिल कर लिए गए तव उसे यह कहकर राजस्व ग्राम का दर्जा नहीं दिया गया कि यह दुधवा नेशनल पार्क की सीमा के भीतर है। इसी श्रेणी में गोलबोझी को भी शामिल कर लिया गया। सन् 1980 में सूरमा गाम के लोग अपना हक पाने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। 23 साल तक चली कानूनी दावपेंचों की लड़ाई में हाईकोर्ट ने सन् 2003 में सूरमावासियों के खिलाफ अपना फैसला सुनाया। इस पर दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन ने सूरमा को उजाड़ने के लिए तमाम असफल प्रयास किए। इस बीच सन् 2008में केन्द सरकार ने ऐतिहासिक अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 एवं नियम 2007 लागू कर दिया। इस ऐतिहासिक वनाधिकार कानून को लागू करने में दुधवा पार्क प्रशासन लगातार अड़गे डालता रहा। सूरमावासियों का उनका हक दिलाने के लिए राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच व उसके स्थानीय घटक संगठन थारू आदिवासी महिला किसान मंच ने सन् 2002में सघर्ष की राह पकड़ी और वनाधिकार पाने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया। इसमें सरकार द्वारा गठित वनाधिकार राज्यस्तरीय निगरानी समिति के सदस्य रामचन्द्र राना ने थारू क्षेत्र की समस्याओं एव वन विभाग द्वारा किए जाने वाले उत्पीड़न को प्रमुखता से शासन तक पहुंचाया जिसका परिणाम यह निकला कि शासन के निर्देश पर वनाधिकार कानून के तहत सूरमा एवं गोलबोझी के निवासियो के वनभूमि पर मालिकाना हक देने के लिए पिछले साल दावा फार्म भरे गए। जांच पड़ताल की प्रक्रिया के वाद आज आठ अप्रैल को सूरमावासियों को वनभूमि पर मालिकाना हक मिल जाने के बाद सूरमा वन विभाग की गुलामी से आजाद हो गया है। वनभूमि में रहने के कारण सूरमा एवं गोलबोझी ग्राम के निवासियों को सरकार द्वारा संचालित योजनाओं का न लाभ मिल रहा था और न ही गांव में सरकारी स्कूल खुल सके थे। यहां तक गांव के निवासी पक्का घर नहीं वना सकते थे। इसके कारण इन गावों के सैकड़ो परिवार आजाद भारत में गुलामी वाला नारकीय जीवन गुजारने को विवश थे। घर, खलिहान, खेत की जमीन पर मालिकाना हक मिल जाने के बाद आज से सूरमा व गोलवोझी में आजादी का नया सूरज उदय हो गया है। वनाधिकार कानून कानून के हथियार से मिली सफलता को लेकर पूरे थारू क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई है थारू इस जीत की खुशी में थारू क्षेत्र में दीवाली मनाई जा रही है।
क्या है वनाधिकार कानून-
अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 एवं 2007 के तहत वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी को काबिज भूमि पर खेती का अधिकार, सामुदायिक अधिकार चाहे किसी नाम से ज्ञात हो इसमें राजाओं एवं जमींदारों के दौरान प्रयुक्त अधिकार शामिल हैं, गौण वन उत्पाद, चारागाहों, जलाशयों, गृह और आवास तथा कोई ऐसा पारम्परिक अधिकार जिसका यथास्थिति, वन निवास करने वाली उन अनुसूचित जनजातियों या अयं परम्परागत वन निवासियों द्वारा रूढ़िगत रूप से उपयोग किया जा रहा हो। कानून में सबसे महत्वूपर्ण अधिकर यह है भी है कि जो अनुसूचित जनजातियों और अयं परम्परागत वन निवासियों के 13 दिसम्बर 2005 से पूर्व किसी भी प्रकार की वन भूमि से पुर्नवास के वैध हक प्राप्त किए बिना अवैध रूप से बेदखल या विस्थापित किया गया हो उसे वनाधिकार का लाभ देने का प्राविधान अधिनियम में दिया गया है। जिसका खुला उल्लंघन दुधवा नेशनल पार्क के अधिकारियों द्वारा किया जा रहा है।
क्या हैं केन्द्र और प्रदेश सरकार के शासनादेश
वनाधिकार कानून लागू किए जाने के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय भारत सरकार के पत्र फाइल संख्या 7-12/2010 दिनांक 21-06-2010 में अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 की धरा 02 (ख) के अंतर्गत राष्ट्रीयय उद्यानों व अभ्यारण्यों में निर्वासित अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासियों को उनके कव्जे की भूमि पर उनके अधिकारों को मान्यता देने एवं उनके अधिकारों को उन्हे सौपने का आदेश दिया गया है। इसी आदेश के क्रम में उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव (वन अनुभाग 2) के पत्र संख्या 273/14-2-2010 दिनांक 11-10-2010 के शासनादेश में कहा गया है कि राष्ट्रीय उद्यानों व अभ्यारण्यों में निर्वासित अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासियों को उनके कव्जे की भूमि पर उनके अधिकारों को मान्यता देने एवं उनके अधिकारों को उन्हे सौपने हेतु कार्यवाही की जानी है। पुनर्स्थापना के पूर्व राष्ट्रीय उद्यानों व अभ्यारण्यों में अधिकारों से सम्वंधित सभी औपचारिकताएं पूरी करने तक कोई बेदखली एवं पुनर्स्थापना अनुमन्य नहीं है। केन्द्र और प्रदेश की सरकार जहां वनाधिकार कानून को लागू करवाने में गंभीर है वहीं दुधवा के अधिकारी शासनादेशों का अनुपालन नहीं कर रहे हैं और वनाधिकार कानून को लागू करवाने में अड़ंगे डालकर थारूओं के साथ अन्य परम्परागत वन निवासियों को उजाड़ने की साजिश जरूर कर रहें हैं। इसके कारण पूरे थारू क्षेत्र के निवासियों में रोष फैल गया है।
दुधवा नेशनल पार्क के मध्य आबाद ग्राम सूरमा में आयोजित किए गए शिविर में जिलाधिकारी समीर वर्मा ने केन्द सरकार के ऐतिहासिक अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 एवं नियम 2007 के तहत 289 थारू परिवारों को उनके घर, खेत और खलिहान के मालिकाना हक का प्रमाण पत्र दिया। श्री वर्मा ने कहा कि प्रयास करके एक साल के भीतर वनाधिकार कानून को लागू कराया गया है। श्री वर्मा ने सभी से वन एवं वन्यजीव संरक्षण व सुरक्षा में पूरा सहयोग दिए जाने की अपील की। उन्होंने वताया कि सूरमा ग्राम अम्वेडकर ग्राम विकास योजना में चयनित है शीघ्र ही विकास के कार्य शुरू कराए जाएगें। डीएम समीर वर्मा ने ग्राम सूरमा में 289 थारू परिवारों को 625,477 हेक्टैयर वन भूमि के मालिकाना हक के अधिकार पत्र दिए। इसमें आवास के लिए 32,637 हेक्टैयर एवं कुषि हेतु 592,84 हेक्टैयर जमीन के अधिकार पत्र अिए गए हैं। डीएम समीर वर्मा ने वताया कि दिए गए अधिकार पत्रों के अनुसार जमीन को राजस्व अभिलेखों में दर्ज कर दिया गया है। 23 साल की लम्वी लड़ाई लड़ने के बाद मिली सफलता के वाद सूरमावासियों में खुशी की लहर दौड़ गई है। गोलवोझी में वितरित किए कुल 58 अधिकार पत्र के तहत 47,842 हेक्टैयर जमीन परउनको मालिकाना हक दिया गया है। इसमें आवास के लिए 3,588 हेक्टेयर तथा कृषिकी 40,245 हेक्टेयर वन भूमि पर मालिकाना हक दिया गया है। डीएम समीर वर्मा ने कहा कि सामुदायिक अधिकारों के लिए शीघ्र ही दावा फार्म भरवाए जाएगें। उन्होंने थारूजनों से वन एवं वंयजीवों की सुरक्षा एवं संरक्षण के कार्यो में सक्रिय सहयोग दिए जाने की अपील की। अधिकार पत्र मिल जाने के बाद घने जंगल के बीच बेवशी व जीवन गुजारने वाले थारू परिवारों के लिए नए युग की शुरूआत का सूरज उदय हुआ है।
आदिवासी जनजाति थारूक्षेत्र में आबाद ग्राम सूरमा देश का पहला ग्राम बन गया जो नेशनल पार्क एवं टाइगर रिजर्व क्षेत्र में बसे होने के बाद भी उसे बनाधिकार कानून का लाभ मिला है। हालांकि थारूओं को यह सफलता एक लम्बी लड़ाई लड़ने के बाद मिली है। वर्षों से भारत-नेपाल सीमावर्ती जंगल के बीच आवाद थारू ग्राम सूरमा को 1978 में जब थारू क्षेत्र के 37 ग्रामों में से 35 ग्राम राजस्व में शामिल कर लिए गए तव उसे यह कहकर राजस्व ग्राम का दर्जा नहीं दिया गया कि यह दुधवा नेशनल पार्क की सीमा के भीतर है। इसी श्रेणी में गोलबोझी को भी शामिल कर लिया गया। सन् 1980 में सूरमा गाम के लोग अपना हक पाने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। 23 साल तक चली कानूनी दावपेंचों की लड़ाई में हाईकोर्ट ने सन् 2003 में सूरमावासियों के खिलाफ अपना फैसला सुनाया। इस पर दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन ने सूरमा को उजाड़ने के लिए तमाम असफल प्रयास किए। इस बीच सन् 2008में केन्द सरकार ने ऐतिहासिक अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 एवं नियम 2007 लागू कर दिया। इस ऐतिहासिक वनाधिकार कानून को लागू करने में दुधवा पार्क प्रशासन लगातार अड़गे डालता रहा। सूरमावासियों का उनका हक दिलाने के लिए राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच व उसके स्थानीय घटक संगठन थारू आदिवासी महिला किसान मंच ने सन् 2002में सघर्ष की राह पकड़ी और वनाधिकार पाने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया। इसमें सरकार द्वारा गठित वनाधिकार राज्यस्तरीय निगरानी समिति के सदस्य रामचन्द्र राना ने थारू क्षेत्र की समस्याओं एव वन विभाग द्वारा किए जाने वाले उत्पीड़न को प्रमुखता से शासन तक पहुंचाया जिसका परिणाम यह निकला कि शासन के निर्देश पर वनाधिकार कानून के तहत सूरमा एवं गोलबोझी के निवासियो के वनभूमि पर मालिकाना हक देने के लिए पिछले साल दावा फार्म भरे गए। जांच पड़ताल की प्रक्रिया के वाद आज आठ अप्रैल को सूरमावासियों को वनभूमि पर मालिकाना हक मिल जाने के बाद सूरमा वन विभाग की गुलामी से आजाद हो गया है। वनभूमि में रहने के कारण सूरमा एवं गोलबोझी ग्राम के निवासियों को सरकार द्वारा संचालित योजनाओं का न लाभ मिल रहा था और न ही गांव में सरकारी स्कूल खुल सके थे। यहां तक गांव के निवासी पक्का घर नहीं वना सकते थे। इसके कारण इन गावों के सैकड़ो परिवार आजाद भारत में गुलामी वाला नारकीय जीवन गुजारने को विवश थे। घर, खलिहान, खेत की जमीन पर मालिकाना हक मिल जाने के बाद आज से सूरमा व गोलवोझी में आजादी का नया सूरज उदय हो गया है। वनाधिकार कानून कानून के हथियार से मिली सफलता को लेकर पूरे थारू क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई है थारू इस जीत की खुशी में थारू क्षेत्र में दीवाली मनाई जा रही है।
क्या है वनाधिकार कानून-
अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 एवं 2007 के तहत वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी को काबिज भूमि पर खेती का अधिकार, सामुदायिक अधिकार चाहे किसी नाम से ज्ञात हो इसमें राजाओं एवं जमींदारों के दौरान प्रयुक्त अधिकार शामिल हैं, गौण वन उत्पाद, चारागाहों, जलाशयों, गृह और आवास तथा कोई ऐसा पारम्परिक अधिकार जिसका यथास्थिति, वन निवास करने वाली उन अनुसूचित जनजातियों या अयं परम्परागत वन निवासियों द्वारा रूढ़िगत रूप से उपयोग किया जा रहा हो। कानून में सबसे महत्वूपर्ण अधिकर यह है भी है कि जो अनुसूचित जनजातियों और अयं परम्परागत वन निवासियों के 13 दिसम्बर 2005 से पूर्व किसी भी प्रकार की वन भूमि से पुर्नवास के वैध हक प्राप्त किए बिना अवैध रूप से बेदखल या विस्थापित किया गया हो उसे वनाधिकार का लाभ देने का प्राविधान अधिनियम में दिया गया है। जिसका खुला उल्लंघन दुधवा नेशनल पार्क के अधिकारियों द्वारा किया जा रहा है।
क्या हैं केन्द्र और प्रदेश सरकार के शासनादेश
वनाधिकार कानून लागू किए जाने के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय भारत सरकार के पत्र फाइल संख्या 7-12/2010 दिनांक 21-06-2010 में अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 की धरा 02 (ख) के अंतर्गत राष्ट्रीयय उद्यानों व अभ्यारण्यों में निर्वासित अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासियों को उनके कव्जे की भूमि पर उनके अधिकारों को मान्यता देने एवं उनके अधिकारों को उन्हे सौपने का आदेश दिया गया है। इसी आदेश के क्रम में उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव (वन अनुभाग 2) के पत्र संख्या 273/14-2-2010 दिनांक 11-10-2010 के शासनादेश में कहा गया है कि राष्ट्रीय उद्यानों व अभ्यारण्यों में निर्वासित अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासियों को उनके कव्जे की भूमि पर उनके अधिकारों को मान्यता देने एवं उनके अधिकारों को उन्हे सौपने हेतु कार्यवाही की जानी है। पुनर्स्थापना के पूर्व राष्ट्रीय उद्यानों व अभ्यारण्यों में अधिकारों से सम्वंधित सभी औपचारिकताएं पूरी करने तक कोई बेदखली एवं पुनर्स्थापना अनुमन्य नहीं है। केन्द्र और प्रदेश की सरकार जहां वनाधिकार कानून को लागू करवाने में गंभीर है वहीं दुधवा के अधिकारी शासनादेशों का अनुपालन नहीं कर रहे हैं और वनाधिकार कानून को लागू करवाने में अड़ंगे डालकर थारूओं के साथ अन्य परम्परागत वन निवासियों को उजाड़ने की साजिश जरूर कर रहें हैं। इसके कारण पूरे थारू क्षेत्र के निवासियों में रोष फैल गया है।
मंगलवार, 8 मार्च 2011
मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011
बुधवार, 9 फ़रवरी 2011
शनिवार, 5 फ़रवरी 2011
बाघ के रास्ते में खड़ा इंसान
पिछले तीन सालों में उत्तर प्रदेश के जिला खीरी एवं पीलीभीत के जंगलों से निकले बाघों के द्वारा खीरी, पीलीभीत, शाहजहांपुर, सीतापुर, बाराबंकी, लखनऊ, फैजाबाद में करीब दो दर्जन के लोग बाघ का शिकार बन चुके हैं. इसे हम इंसानों के लिए त्रासदी कह सकते हैं लेकिन जितनी त्रासदी यह इंसानों के लिए है उससे अधिक त्रासदी उन बाघों के लिए जो इंसानों का शिकार कर रहे हैं. बाघ जन्म से हिंस्रक और खूंखार तो होता है, लेकिन मानवभक्षी नहीं होता। इंसानों से डरने वाले वनराज बाघ को मानवजनित अथवा प्राकृतिक परिस्थितियां मानव पर हमला करने को विवश करती हैं।
इसमें दो बाघों को गोली मारी गयी। जबकि एक बाघ को पकड़कर लखनऊ प्राणी उद्यान भेजा जा चुका है। इसके अतिरिक्त उत्तरांचल में भी जंगल से बाहर आकर मानवभक्षी बनने वाले दो बाघों को बीते एक पखवारे में गोली मारी जा चुकी है। उत्तर प्रदेश के पूरे तराई क्षेत्र का जंगल हो अथवा उत्तरांचल का वनक्षेत्र हो, उसमें से बाहर निकले बाध चारों तरफ अपना आतंक फैलाए हैं और वेकसूर ग्रामीण उनका निवाला बन रहे हैं। बाध और मानव के बीच संधर्ष क्यो बढ़ रहा है? और बाध जंगल के बाहर निकलने के लिए क्यों बिवश हैं? इस विकट समस्या का समय रहते समाधान किया जाना आवश्यक है। वैसे भी पूरे विश्व में बाघों की दुनिया सिमटती जा रही है। ऐसी स्थिति में भारतीय वन क्षेत्र के बाहर आने वाले बाघों को गोली का निशाना बनाया जाता रहा तो वह दिन भी दूर नहीं होगा जव भारत की घरा से बाघ विलुप्त हो जाएगें।
उत्तर प्रदेश के दुधवा टाइगर रिजर्व परिक्षेत्र में शामिल किशनपुर वनपशु विहार, पीलीभीत और शाहजहांपुर के जंगल आपस में सटे हैं। गांवों की बस्तियां और कृषि भूमि जंगल के समीप हैं। इसी प्रकार दुधवा नेशनल पार्क तथा कतरनिया वन्यजीव प्रभाग का वनक्षेत्र भारत-नेपाल की अंतर्राष्ट्रीय खुली सीमा से सटा है साथ ही आसपास जंगल के किनारे तमाम गांव वसे हैं। जिससे सीमा पर नेपाली नागरिको के साथ ही भारतीय क्षेत्र में मानव आबादी का दबाव जंगलों पर बढ़ता ही जा रहा है। इसके चलते विभिन्न परितंत्रों के बीच एक ऐसा त्रिकोण बनता है जहां ग्रामवासियों और वनपशुओं को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जाना ही है। भौगोलिक परिस्थितियों के चलते बनने वाला त्रिकोण परिक्षेत्र दुर्घटना जोन बन जाता है। सन् 2007 में किशनुपर परिक्षेत्र में आबाद गावों में आधा दर्जन मानव हत्याएं करने वाली बाघिन को मृत्यु दण्ड देकर गोली मार दी गयी थी। इसके बाद नवंबर 2008 में पीलीभीत के जंगल से निकला बाघ खीरी, शाहजहांपुर, सीतापुर, बाराबंकी होते हुए सूबे की राजधानी लखनऊ की सीमा तक पहुंच गया था। इस दौरान बाघ द्वारा एक दर्जन ग्रामीणों का शिकार किया गया। बाद में इस आतंकी बाघ को नरभक्षी घोषित करके फैजाबाद के पास गोली मारकर मौत दे दी गयी थी। सन् 2009 के माह जनवरी में किशनपुर एवं नार्थ खीरी फारेस्ट डिवीजन के क्षेत्र में जंगल से बाहर आये बाघ ने चार मानव हत्याएं करने के साथ ही कई पालतू पशुओं का शिकार भी किया। इस पर हुई काफी मशक्कत के बाद बाघ को पिंजरें में कैद कर लखनऊ प्राणी उद्यान भेज दिया गया था।
जन्म से खंूखार होने के बाद भी विशेषज्ञों की राय में बाघ इंसान पर डर के कारण हमला नहीं करता। यही कारण है कि वह इंसानों से दूर रहकर घने जंगलों में छुप कर रहता है। मानव पर हमला करने के लिए परिस्थितियां बिवश करती हैं। विश्वविख्यात बाघ विशेषज्ञ जिम कार्बेट का भी कहना था कि बाघ बूढ़ा होकर लाचार हो गया हो, जख्मी होने से उसके दांत, पंजा, नाखून टूट गये हो या फिर प्राकृतिक या मानवजनित विषम परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हों, तभी बाघ इंसानों पर हमला करता है। उनका यह भी मानना था कि जन्म से खंूखार होने के बाद भी बाघ मानव पर एक अदृश्य डर के कारण हमला नहीं करता और यह भी कोई जरूरी नहीं है कि नरभक्षी बाघ के बच्चे भी नरभक्षी हो जायें।
सन् 2010 पीलीभीत के जंगल से निकले बाघ द्वारा खीरी, शाहजहांपुर में द्वारा आठ ग्रामीण मौत के घाट उतारे गए थे। इस पर वन विभाग ने प्रयास करके बाघ को पिंजरे में कैद करके लखनउ प्राणि उद्यान में भेज दिया था। उत्तर प्रदेश में ही नहीं वरन उत्तरांचल में भी बाघ जंगल से बाहर भाग रहे हैं। 2011 के माह जनवरी व फरवरी के वीते एक पखवारे के भीतर उत्तरांचल के जिम कार्वेट पार्क के ग्रामीण सीमाई क्षेत्रों में दो बाघों को मानवभक्षी घोषित करके गोली मारी जा चुकी है। इसके अतिरिक्त चीन में बाघ के अंगों की बढती मांग के कारण पैसों के लालच में भी भारत के वनक्षेत्रों में बाघों का अवैध शिकार किया जा रहा है। अवैध शिकार के कारण ही राजस्थान के सारिस्का नेशनल पार्क और मध्य प्रदेश के रणथम्भौर नेशनल पार्क से बाघ गायब हो चुके हैं। देश में संकटापन्न दशा से गुजर रहे बाघों की दुनिया को एक तरफ जहां शिकरी समेट रहे हैं वहीं दूसरी तरफ वनक्षेत्रों से बाहर आने वाले बाघों को आतंकी या मानवभक्षी घोषित करके मौत के घाट उतार देना न समस्या का समाधान है और न ही यह बाघों के हित में है।
बाघ अथवा वन्यजीव जंगल से क्यों निकलते हैं इसके लिए प्राकृतिक एवं मानवजनित कई कारण हैं। इनमें छोटे-मोटे स्वार्थो के कारण न केवल जंगल काटे गए बल्कि जंगली जानवरों का भरपूर शिकार किया गया। आज भी नेशनल पार्क का आरक्षित वनक्षेत्र हो या संरक्षित जंगल हो उनमें लगातार अवैध शिकार जारी है। यही कारण है कि वन्यजीवों की तमाम प्रजातियां संकटापन्न होकर विलुप्त होने की कगार पर हैं। इस बात का अभी अंदेशा भर जताया जा सकता है कि इस इलाके में बाघों की संख्या बढ़ने पर उनके लिए भोजन का संकट आया हो। असमान्य व्यवहार आसपास के लोगों के लिए खतरे की घंटी हो सकता है। मगर इससे भी बड़ा खतरा इस बात का है कि कहीं मनुष्यों और जंगली जानवर के बीच अपने को जिन्दा रखने के लिए खाने की जद्दोजेहाद नए सिरे से किसी परिस्थितिकीय असंतुलन को न पैदा कर दे। जब तक भरपूर मात्रा में जंगल रहे तब तक वन्यजीव गांव या शहर की ओर रूख नहीं करते थे। लेकिन मनुष्य ने जब उनके ठिकानों पर हमला बोल दिया तो वे मजबूर होकर इधर-उधर भटकने को मजबूर हो गए हैं।
इधर प्राकृतिक कारणों से जंगल के भीतर चारागाह भी सिमट गए अथवा वन विभाग के कर्मचारिययों की निजस्वार्थपरता से हुए कुप्रबंधन के कारण चारागाह ऊंची घास के मैदानों में बदल गए। परिणम स्वरूप वनस्पति आहारी वन्यजीव चारा की तलाश में जंगल के बाहर आते हैं तो अपनी भूख शांत करने के लिए वनराज बाघ भी उनके साथ पीछे-पीछे बाहर आकर आसान शिकार की प्रत्याशा में गन्ने के खेतों को अस्थाई शरणगाह बना लेते हैं। परिणाम सह अस्तित्व के बीच मानव तथा वन्यजीवों के बीच संघर्ष बढ़ जाता है। इसको रोकने के लिए अब जरूरी हो गया है कि वन्यजीवोंके अवैध शिकार पर सख्ती से रोक लगाई जाये तथा चारागाहों को पुराना स्वरूप दिया जाए ताकि वन्यजीव चारे के लिए जंगल के बाहर न आयें। इसके अतिरिक्त बाघों के प्राकृतिक वासस्थलों में मानव की बढ़ती घुसपैठ को रोका जाये साथ ही ऐसे भी कारगर प्रयास किये जायें जिससे मानव एवं वन्यजीव एक दूसरे को प्रभावित किये बिना रह सकें। ऐसा न किए जाने की स्थिति में परिणाम घातक ही निकलते रहेंगे, जिसमें मानव की अपेक्षा सर्वाधिक नुकसान बाघों के हिस्से में ही आएगा।
शुक्रवार, 12 नवंबर 2010
दुधवा में पर्यटन हुआ महंगा
देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए मंहगा हुआ दुधवा नेशनल पार्क उत्तर प्रदेश के एकमात्र विश्व विख्यात दुधवा नेशनल पार्क का भ्रमण करना अब देशी- विदेशी पर्यटकों के लिए खासा मंहगा हो गया है। दो से तीन गुना तक हुई बढ़ोत्तरी की दरें इस साल 15 नवम्बर से शुरू हो रहे नवीन पर्यटन सत्र से लागू होगी। सन् 2003 के बाद यह वृद्धि की गई है। जिससे दुधवा नेशनल पार्क के पर्यटन व्यवसाय पर बिपरीत प्रभाव पड़ सकता है इस संभावना से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि यूपी का इकलौता विश्व पर्यटन मानचित्र पर स्थापित दुधवा नेशनल पार्क प्रकृति की अनमोल धरोहर के साथ विलुप्तप्राय वन्यजीवों की विभिन्न प्रजातियों को अपने आगोश में समेटे है। इसमें शेड्यूल वन की श्रेणी में चिन्हित बाघ एवं तेंदुआ के साथ ही हाथियों के झुण्ड को स्वच्छंद रूप से विचरण करता हुआ देखा जा सकता है। जबकि देश में आसाम के बाद दुधवा ही ऐसा नेशनल पार्क है जिसमें तीस सदस्यीय गैण्डा परिवार रहता है। इनके संरक्षण और संवर्द्धन के लिए दुधवा पार्क में जहां ’गैण्डा पुनर्वास परियोजना’ चल रही है। वहीं बाघों की सुरक्षा एवं संरक्षण का दायित्व ’प्रोजेक्ट टाइगर’ संभाले है।
दुधवा नेशनल पार्क के वन क्षेत्र में वृक्षों की 75 प्रजातियां 21 प्रकार की झाड़ियां, 17 तरह की बेल व लताएं तथा 77 प्रकार की घासों समेत 179 प्रकार की पानी में उगने वाले पौधे चिन्हित किए जा चुके हैं। इनमें से 24 प्रजातियां संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा चिड़ियों की 411, टेपटाइल की 25, एम्फीबियन की 15 तथा स्तनपाई जीवों की 51 प्रजातियां पाई जाती हैं। जबकि यूरोप, साइबेरिया आदि बर्फीले क्षेत्रों के विदेशी प्रवासी पक्षी भी शीतकाल के दौरान दुधवा पार्क के तालाबों एवं झीलों में देखे जा सकते हैं। इसमें यहां पाए जाने वाले बंगाल śलोरिकन एवं लेसर śलोरिकन नाम के दुर्लभ पक्षी भी दुधवा पार्क की पहचान बन चुके हैं। प्राकृतिक वैराव से परिपूर्ण दुधवा नेशनल पार्क के मनोहरी दृश्य देखने के साथ ही पशु-पक्षियों को कलरव को सुनकर पर्यटकों के लिए रोमांचकारी होता है। लेकिन अब प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण नयना भिराम नजारों सहित दुर्लभ प्रजाति के वयंजीवों को स्वच्छंद विचरण करता हुआ देखने के लिए भ्रमण हेतु आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों को दुधवा दर्शन काफी महंगा साबित होगा। वह भी इसीलिए क्योंकि 15 नवम्बर से शुरू हो रहे पर्यटन सत्र से शासन द्वारा की गई मूल्य वृद्धि के अनुसार ही रेस्ट हाउस, थारूहट आदि का आरक्षण किया जाएगा। सन् 2003 से चल रही दरों में सात साल बाद दो से तीन गुना की वृद्धि की गई है।
उल्लेखनीय है कि प्रवेश शुल्क में हुई वृद्धि के अनुसार प्रति व्यक्ति तीन दिन के लिए पहले पचास रूपया था अब एक सौ रूपए हो गया है। पूर्व में बच्चों का प्रवेश निःशुल्क था अब देशी पर्यटक बच्चे का शुल्क 60 रूपए और विदेशी को सात सौ रूपए देने होगें। इसी प्रकार गाड़ियों के प्रवेश शुल्क में भी वृद्धि की गई है। जबकि हाथी सवारी के लिए चार व्यक्ति दो घंटा हेतु 300 रूपए देते थे अब प्रति व्यक्ति को 150 रूपए देने होंगे। दुधवा नेशनल पार्क में ठहरना भी महंगा हो गया है। इसमें वन विश्राम भवन दुधवा का कक्ष चार सौ रूपए में आरक्षित होता था अब हुई वृद्धि में भवन की श्रेणी निर्धारित की गई है। उसके अनुसार पर्यटक को भुगतान करना होगा। थारूहट 150 रूपए के बजाय अब चार सौ से पांच सौ रूपए में आरक्षित किए जायेंगे। इसी प्रकार डारमेटŞी में भी पचास रूपए से बढ़ाकर 75 रूपए प्रति व्यक्ति किया गया है। जबकि पूर्व में बनकटी वन विश्राम भवन आदि एक सौ रूपए में बुक होते थे अब तीन सौ रूपए प्रतिदिन का लिया जाएगा। किशनपुर वन विश्राम भवन अब 150 रूपए के बजाय 500 रूपए में आरक्षित होगा। दुधवा में फीचर फिल्म तथा डाक्युमेंट्री बनाने के शुल्क में भी भारी वृद्धि की गई है। पूर्व की नागिनल दर यानी फीचर फिल्म 2500 रूपए एवं डाक्युमेंट्री फिल्म 1500 था तब दुधवा में कोई निर्माता दिलचस्पी नहीं लेता था अब चार गुना वृद्धि के साथ फीचर फिल्म का एक लाख रूपए एवं डाक्युमेंट्री फिल्म का 6 हजार रूपए लिया जाएगा। इस पर भी निर्माता को सुरक्षा शुल्क अलग से देना होगा। दुधवा में भ्रमण महंगा होने से अब आम पर्यटक इससे और दूर हो जाएगा जिससे पर्यटन व्यवसाय से होने वाली आय पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है।
दुधवा नेशनल पार्क में 15 नवम्बर से आवास सुविधा
पर लागू होने वाली नई दरें-
विवरण देशी विदेशीदुधवा वन विश्राम भवन-
वातानुकूलित कक्ष संख्या एक 1000 रुपए 3000 रुपए
विश्राम भवन कक्ष संख्या दो 750 रुपए 2250 रुपए
विश्राम भवन कक्ष संख्या 3,4,5 400 रुपए 1200 रुपए
थारूहट एक व दो 500 रुपए 1500 रुपए
थारूहट तीन से चौदह 400 रुपए 1000 रुपए
डारमेट्री प्रति व्यक्ति 75 रुपए 225 रुपए
सोठियाना वन विश्राम भवन 400 रुपए 1200 रुपए
लाग हट 200 रुपए 600 रुपए
सोनारीपुर वन विश्राम भवन प्रथम तल 400 रुपए 1200 रुपए
द्वितीय तल 300 रुपए 900 रुपए
वनकटी वन विश्राम भवन 300 रुपए 900 रुपए
किशनपुर वन विश्राम भवन 500 रुपए 1500 रुपए
सलूकापुर, मसानखंभ, वेलरायां,
किला, बेलापरसुआ, वन विश्राम
भवन 300 रुपए 900 रुपए
दुधवा नेशनल पार्क में फीस एवं किराया 15 नवम्बर से लागू नई दरें-
दुधवा नेशनल पार्क में-
प्रवेश शुल्क प्रति व्यक्ति तीन दिन 100 रुपए
विदेशी 800 रुपए
वच्चा 60 रुपए
विदेशी 700 रुपए
अतिरिक्त दिन 40 रुपए
विदशी 350 रुपए
किशनपुर वन्यजीव विहार में-
प्रवेश शुल्क प्रति व्यक्ति तीन दिन 50 रुपए
विदेशी 600 रुपए
वच्चा 30 रुपए
विदेशी 350 रुपए
अतिरिक्त दिन 40 रुपए
विदशी 350 रुपए
दुपहिया वाहन 20 रुपए
कार, जीप 100 रुपए
पर्यटक बस 200 रुपए
रोड फीस हल्की गाड़ी 300 रुपए
मिनी बस 800 रुपए
भारी गाड़ी 1600 रुपए
कैमरा फीस पर्यटकों के लिए निःशुल्क
कैमरा फीस मूवी एवं वीडीयो 5000 रुपए
विदेशी 10000 रुपए
फीचर फिल्म प्रतिदिन 100000 रुपए
विदेशी 150000 रुपए
डाक्युमेंट्री फिल्म प्रतिदिन 6000 रुपए
विदेशी 12000 रुपए
उपरोक्त के लिए सुरक्षा फीस-
फीचर फिल्म 100000 रुपए
विदेशी 150000 रुपए
डाक्युमेंट्री फिल्म 25000 रुपए
विदेशी 25000 रुपए
हाथी सवारी दो घंटा प्रति व्यक्ति 150 रुपए
विदेशी 300 रुपए
मिनी बस 10 सीटर प्रति किमी 45 रुपए
विदेशी 90 रुपए
जीप 6 सीटर प्रति किमी 40 रुपए
विदेशी 80 रुपए
उल्लेखनीय है कि यूपी का इकलौता विश्व पर्यटन मानचित्र पर स्थापित दुधवा नेशनल पार्क प्रकृति की अनमोल धरोहर के साथ विलुप्तप्राय वन्यजीवों की विभिन्न प्रजातियों को अपने आगोश में समेटे है। इसमें शेड्यूल वन की श्रेणी में चिन्हित बाघ एवं तेंदुआ के साथ ही हाथियों के झुण्ड को स्वच्छंद रूप से विचरण करता हुआ देखा जा सकता है। जबकि देश में आसाम के बाद दुधवा ही ऐसा नेशनल पार्क है जिसमें तीस सदस्यीय गैण्डा परिवार रहता है। इनके संरक्षण और संवर्द्धन के लिए दुधवा पार्क में जहां ’गैण्डा पुनर्वास परियोजना’ चल रही है। वहीं बाघों की सुरक्षा एवं संरक्षण का दायित्व ’प्रोजेक्ट टाइगर’ संभाले है।
दुधवा नेशनल पार्क के वन क्षेत्र में वृक्षों की 75 प्रजातियां 21 प्रकार की झाड़ियां, 17 तरह की बेल व लताएं तथा 77 प्रकार की घासों समेत 179 प्रकार की पानी में उगने वाले पौधे चिन्हित किए जा चुके हैं। इनमें से 24 प्रजातियां संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा चिड़ियों की 411, टेपटाइल की 25, एम्फीबियन की 15 तथा स्तनपाई जीवों की 51 प्रजातियां पाई जाती हैं। जबकि यूरोप, साइबेरिया आदि बर्फीले क्षेत्रों के विदेशी प्रवासी पक्षी भी शीतकाल के दौरान दुधवा पार्क के तालाबों एवं झीलों में देखे जा सकते हैं। इसमें यहां पाए जाने वाले बंगाल śलोरिकन एवं लेसर śलोरिकन नाम के दुर्लभ पक्षी भी दुधवा पार्क की पहचान बन चुके हैं। प्राकृतिक वैराव से परिपूर्ण दुधवा नेशनल पार्क के मनोहरी दृश्य देखने के साथ ही पशु-पक्षियों को कलरव को सुनकर पर्यटकों के लिए रोमांचकारी होता है। लेकिन अब प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण नयना भिराम नजारों सहित दुर्लभ प्रजाति के वयंजीवों को स्वच्छंद विचरण करता हुआ देखने के लिए भ्रमण हेतु आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों को दुधवा दर्शन काफी महंगा साबित होगा। वह भी इसीलिए क्योंकि 15 नवम्बर से शुरू हो रहे पर्यटन सत्र से शासन द्वारा की गई मूल्य वृद्धि के अनुसार ही रेस्ट हाउस, थारूहट आदि का आरक्षण किया जाएगा। सन् 2003 से चल रही दरों में सात साल बाद दो से तीन गुना की वृद्धि की गई है।
उल्लेखनीय है कि प्रवेश शुल्क में हुई वृद्धि के अनुसार प्रति व्यक्ति तीन दिन के लिए पहले पचास रूपया था अब एक सौ रूपए हो गया है। पूर्व में बच्चों का प्रवेश निःशुल्क था अब देशी पर्यटक बच्चे का शुल्क 60 रूपए और विदेशी को सात सौ रूपए देने होगें। इसी प्रकार गाड़ियों के प्रवेश शुल्क में भी वृद्धि की गई है। जबकि हाथी सवारी के लिए चार व्यक्ति दो घंटा हेतु 300 रूपए देते थे अब प्रति व्यक्ति को 150 रूपए देने होंगे। दुधवा नेशनल पार्क में ठहरना भी महंगा हो गया है। इसमें वन विश्राम भवन दुधवा का कक्ष चार सौ रूपए में आरक्षित होता था अब हुई वृद्धि में भवन की श्रेणी निर्धारित की गई है। उसके अनुसार पर्यटक को भुगतान करना होगा। थारूहट 150 रूपए के बजाय अब चार सौ से पांच सौ रूपए में आरक्षित किए जायेंगे। इसी प्रकार डारमेटŞी में भी पचास रूपए से बढ़ाकर 75 रूपए प्रति व्यक्ति किया गया है। जबकि पूर्व में बनकटी वन विश्राम भवन आदि एक सौ रूपए में बुक होते थे अब तीन सौ रूपए प्रतिदिन का लिया जाएगा। किशनपुर वन विश्राम भवन अब 150 रूपए के बजाय 500 रूपए में आरक्षित होगा। दुधवा में फीचर फिल्म तथा डाक्युमेंट्री बनाने के शुल्क में भी भारी वृद्धि की गई है। पूर्व की नागिनल दर यानी फीचर फिल्म 2500 रूपए एवं डाक्युमेंट्री फिल्म 1500 था तब दुधवा में कोई निर्माता दिलचस्पी नहीं लेता था अब चार गुना वृद्धि के साथ फीचर फिल्म का एक लाख रूपए एवं डाक्युमेंट्री फिल्म का 6 हजार रूपए लिया जाएगा। इस पर भी निर्माता को सुरक्षा शुल्क अलग से देना होगा। दुधवा में भ्रमण महंगा होने से अब आम पर्यटक इससे और दूर हो जाएगा जिससे पर्यटन व्यवसाय से होने वाली आय पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है।
दुधवा नेशनल पार्क में 15 नवम्बर से आवास सुविधा
पर लागू होने वाली नई दरें-
विवरण देशी विदेशीदुधवा वन विश्राम भवन-
वातानुकूलित कक्ष संख्या एक 1000 रुपए 3000 रुपए
विश्राम भवन कक्ष संख्या दो 750 रुपए 2250 रुपए
विश्राम भवन कक्ष संख्या 3,4,5 400 रुपए 1200 रुपए
थारूहट एक व दो 500 रुपए 1500 रुपए
थारूहट तीन से चौदह 400 रुपए 1000 रुपए
डारमेट्री प्रति व्यक्ति 75 रुपए 225 रुपए
सोठियाना वन विश्राम भवन 400 रुपए 1200 रुपए
लाग हट 200 रुपए 600 रुपए
सोनारीपुर वन विश्राम भवन प्रथम तल 400 रुपए 1200 रुपए
द्वितीय तल 300 रुपए 900 रुपए
वनकटी वन विश्राम भवन 300 रुपए 900 रुपए
किशनपुर वन विश्राम भवन 500 रुपए 1500 रुपए
सलूकापुर, मसानखंभ, वेलरायां,
किला, बेलापरसुआ, वन विश्राम
भवन 300 रुपए 900 रुपए
दुधवा नेशनल पार्क में फीस एवं किराया 15 नवम्बर से लागू नई दरें-
दुधवा नेशनल पार्क में-
प्रवेश शुल्क प्रति व्यक्ति तीन दिन 100 रुपए
विदेशी 800 रुपए
वच्चा 60 रुपए
विदेशी 700 रुपए
अतिरिक्त दिन 40 रुपए
विदशी 350 रुपए
किशनपुर वन्यजीव विहार में-
प्रवेश शुल्क प्रति व्यक्ति तीन दिन 50 रुपए
विदेशी 600 रुपए
वच्चा 30 रुपए
विदेशी 350 रुपए
अतिरिक्त दिन 40 रुपए
विदशी 350 रुपए
दुपहिया वाहन 20 रुपए
कार, जीप 100 रुपए
पर्यटक बस 200 रुपए
रोड फीस हल्की गाड़ी 300 रुपए
मिनी बस 800 रुपए
भारी गाड़ी 1600 रुपए
कैमरा फीस पर्यटकों के लिए निःशुल्क
कैमरा फीस मूवी एवं वीडीयो 5000 रुपए
विदेशी 10000 रुपए
फीचर फिल्म प्रतिदिन 100000 रुपए
विदेशी 150000 रुपए
डाक्युमेंट्री फिल्म प्रतिदिन 6000 रुपए
विदेशी 12000 रुपए
उपरोक्त के लिए सुरक्षा फीस-
फीचर फिल्म 100000 रुपए
विदेशी 150000 रुपए
डाक्युमेंट्री फिल्म 25000 रुपए
विदेशी 25000 रुपए
हाथी सवारी दो घंटा प्रति व्यक्ति 150 रुपए
विदेशी 300 रुपए
मिनी बस 10 सीटर प्रति किमी 45 रुपए
विदेशी 90 रुपए
जीप 6 सीटर प्रति किमी 40 रुपए
विदेशी 80 रुपए
गुरुवार, 4 नवंबर 2010
दयनीय दशा से कब उबरेगा किसान
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| दयनीय दशा से कब उबरेगा किसान Daily News Activist LUCKNOW 04.11.2010 http://65.175.77.34/dailynewsactivist/Details.aspx?id=9999 &boxid=27129694&eddate=11%2F4%2F2010 |
बुधवार, 6 अक्टूबर 2010
बाढ़ ने बिगाड़ा पशुपालन कारोबार
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| Daily News Activist LUCKNOU me 05.10.2010 बाढ़ ने बिगाड़ा पशुपालन कारोबार http://65.175.77.34/dailynewsactivist/Details.aspx?id=9486&boxid=27047464&eddate=10/5/2010 |
मंगलवार, 28 सितंबर 2010
हाथियों की मौत के बाद सरकार को आया होश
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| डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में २८.०९.२०१० में पेज नौ पर हाथियों की मौत के बाद सरकार को आया होश http://65.175.77.34/dailynewsactivist/Details.aspx?id=9390&boxid=27301884&eddate=9/28/2010 |
रविवार, 26 सितंबर 2010
चिकित्सक के अभाव में बागी 'शेरा' मौत के कगार पर
चिकित्सक के अभाव में बागी 'शेरा' मौत के कगार पर
http://www.visfot.com/index.php/paryavaran/3991.html
http://www.visfot.com/index.php/paryavaran/3991.html
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| विस्फोट डाट काम |
सोमवार, 20 सितंबर 2010
डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में लखनऊ दुधवा में बीमार हाथी की दुर्दशा
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| डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट लखनऊ में २०.०९.२०१० को छपा लेख दुधवा नें बीमार हाथी की दुर्दशा http://65.175.77.34/dailynewsactivist/epapermain.aspx |
रविवार, 19 सितंबर 2010
मंगलवार, 7 सितंबर 2010
हिन्दुस्तानियों के सीने पर सेना की गोलियां
उत्तर प्रदेश तथा उत्तरांचल की भारत-नेपाल सीमा पर होने वाली तस्करी, वन कटान, अवैध वन्यजीव शिकार, आईएसआई की सक्रियता तथा आतंकवादी एवं विदेशी घुसपैठ आदि को रोकने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा पैरा मिलिट्री फोर्स सीमा सशस्त्र बल को तैनात किया गया है। सीमा सशस्त्र बल यानी एसएसबी के जवान अपने मूल उद्देश्यों व कार्यों से भटक कर भौतिक सुखों की खातिर आमजनता का बेवजह उत्पीड़न एवं आर्थिक शोषण करने से परहेज नहीं करते हैं और सीधे बंदूक की भाषा में बात करने लगे हैं।
इसी का परिणाम है खीरी जिले के ग्राम त्रिकोलिया में जवानों द्वारा किया गया हिंसक तांडव एवं हत्याकांड, जिसमें दो निरीह बेगुनाह ग्रामीण मारे गए। निरंकुश जवानों के द्वारा आम जनता के साथ किये जाने वाले अनेक तरह के अत्याचारों और शोषण के विरोध में सीमावर्ती गांवों में उनके बीच बढ़ते तनाव से युवाओं के मन में विरोध की आग सुलगने लगी है, जिसकी परिणीत नक्सलवाद या आतंकवाद अथवा हथियारबंद बिरोध के रूप में कभी भी हो सकती है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। यद्यपि त्रिकोलिया काण्ड के मद्देनजर यूपी की सरकार ने सीमावर्ती क्षेत्रों में दिनोंदिन जवानों और ग्रामीणों के बीच बढ़ रहे तनावों और संघर्षों की रोकथाम के लिए भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत मिले एस0एस0बी0 के पुलिस अधिकारों में कटौती किये जाने का प्रस्ताव पुनः केन्द्र सरकार को भेजा है।
2 अगस्त 2010 को एसएसबी की वर्दी तब शर्मसार हो गई जब जवानों ने मामूली विवाद से रोष में आकर दो बेगुनाह ग्रामीणों की गोली मारकर हत्या कर दी। घटना खीरी जिले के ग्राम त्रिकोलिया की है, विवाद सिर्फ इतना था कि सड़क पर साइड न मिलने से एक गाड़ी का पीछा करते हुए एसएसबी के जवान अपने डिप्टी कंमाडेंट के निर्देश पर पूर्व विधायक निरवेन्द्र कुमार ‘मुन्ना‘ के आवास पर पहुंच गए। जहां पर जवानों ने जनप्रतितिनिधि रहे पूर्व विधायक के साथ अभद्रता ही नहीं की वरन् उनको डंडा भी मार दिया। इससे आक्रोशित ग्रामीणों ने जवानों को रोक लिया। इनकी सूचना पर त्रिकोलिया पहुंचे दर्जनों बेलगाम जवानों ने बिना किसी से बात किए लाठीचार्ज का तांडव शुरू कर दिया। उनके द्वारा नियम-कायदों को ताक पर रखकर ग्रामीणों पर बरसाई गई गोलियों से तमाशबीन रहे बेगुनाह गरीब युवक पाइया और बदरूद्दीन की मौत हो गई। इस पूरे घटनाक्रम में भी यह बात उभर कर आई कि यदि एसएसबी के अधिकारी संयम बरत कर समझदारी से परिस्थितियों का आंकलन करते और सिविल पुलिस के सहयोग से कानूनी कार्यवाही करते तो शायद बेवजह हुई दो युवकों की अकाल मौत को टाला जा सकता था।
निरंकुश जवानों द्वारा किया जाने वाला यह हिंसक तांडव कोई पहली घटना नहीं है। सन् 2001 से ही इस फोर्स ने अपनी तैनाती के बाद से भारत-नेपाल सीमावर्ती क्षेत्रों के आदिवासियों तथा अन्य निवासियों पर अत्याचार शुरू कर दिया था। हिंसक घटनाओं के अलावा भारत-नेपाल सीमावर्ती ग्रामीणों के साथ किए जाने वाले बेवजह उत्पीड़न, अत्याचार, आर्थिक शोषण और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ एवं यौन शोषण आदि के विरोध में जवानों तथा ग्रामीणों के बीच टकराव की अनगिनत घटनाएं हो चुकी हैं। जिनमें पुलिस एवं जिला प्रशासन को कानून व्यवस्था को बनाए रखने में काफी मसक्कत करनी पड़ी। यहां तक मामले को रफा-दफा करने के लिए एसएसबी अधिकारियों को सार्वजनिक माफी तक मांगकर शर्मिदंगी भी झेलनी पड़ी। एसएसबी के जवानों द्वारा अपने ही हिंदुस्तनी भाईयों के सीनों पर ही चलाई जा रही गोलियां अगर तस्करों, आतंकवादी, विदेशी घुसपैठियों अथवा भारतीय वन संपदा को बचाने के लिए चलाई जातीं तो आमजनता के बीच विलेन बन रहे एसएसबी के जवानों का रूप हीरो का होता और वाह-वाही तथा सम्मान मिलता अलग से ।
भारत-नेपाल की खुली सीमा दुधवा नेशनल पार्क के जंगल से सटी है, इसलिए सीमाई इलाकों से वन कटान तथा वन्यजीवों के अंगों का अवैध कारोबार एवं तस्करी का गैर कानूनी कार्य एसएसबी एवं बन विभाग और तस्करों की हुई जुगलबंदी के बीच निर्वाध रूप से चल रहा है। यह अवैध गोरखधंधा उजागर न हो जाए इसलिए भी आतंक फैलाकर ग्रामीणों को भयभीत किया जा रहा है, ताकि वह उनके खिलाफ अपना मुंह न खेल सकें। जबकि राष्टृीय सुरक्षा से जुड़ी इस फोर्स का यह आचरण कतई शोभनीय नहीं है। एसएसबी के जवानों के कुकृत्यों से केंद्र सरकार की भूमिका पर भी प्रश्नचिन्ह लगता है। फोर्स कोई भी हो उसका काम यह नहीं है कि वह आम जनता को तंग और परेशान करे। जनता की सुरक्षा के लिए सीमापर लगाई गई फोर्स आज उनकी सुरक्षा के लिए ही सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। खीरी जिले के ही नहीं वरन यूपी के अन्य सीमावर्ती ग्रामीणांचल समेत उत्तरांचल के सीमाई इलाकों की जनता भी इनके अशोभनीय व्यवहार और कुकृत्यों से त्रस्त हैं। इसके चलते भारत-नेपाल सीमा पर एसएसबी की मौजूदगी पर प्रश्नचिन्ह लग गया है।
भारत-नेपाल सीमा पर एसएसबी के लगभग दस साल के क्षेत्रीय इतिहास में कोई अहम व उल्लेखनीय उपलब्धि तो उसके खाते में दर्ज नहीं हो सकी है। जिसमें जवानों को वाहवाही मिली हो, जबकि वर्दी पर बदनुमा दाग तमाम लग चुके हैं। यद्यपि एसएसबी द्वारा जनता का सहयोग पाने तथा परस्पर प्रेम बढ़ाकर सीमा पर शांति कायम रखने के उद्देश्य से सीमावर्ती गांवों में सद्भावना जागरूकता अभियान समय-समय पर चलाए जाते हैं। बावजूद इसके उनके तथा जनता के बीच दूरियां लगातार बढ़ ही रही हैं और जो थोड़ी बहुत शान्ति थी वह भी पूरी तरह से भंग हो चुकी है। आजाद भारत में अंग्रेजी शासन वाले फोर्स की तरह एसएसबी के जवान सीमा पर हुकूमत कर रहें हैं। जबकि फोर्स कोई भी हो उसका उद्देश्य होता है कि संयम से काम लेते हुए बिपरीत परिस्थितियों का आंकलन करके समस्या का निराकरण करना। इसके बजाय जवान अमानवीय व हिंसक तरीका अपनाते हैं जिससे संघर्ष और टकराव बढ़ने लगा है। जबकि कैसी भी विषम एवं विपरीत परिस्थितियां हों उसमें हलका-फुलका बल प्रयोग तो जायज हो सकता है, परंतु गोली चला देना कम से कम अंतिम निर्णय तो कतई नहीं होना चाहिए। क्योंकि आक्रोशित जनता ने भी अगर अत्याचार और शोषण का जवाब हथियारबंद टकराव से देना शुरू कर दिया तो स्थिति और भयावह हो सकती है।
इतिहास गवाह है कि फोर्स कोई भी हो अथवा सरकारी तन्त्र, जिसने जब भी गरीब आम जनता पर अकारण अत्याचार किया तो उसके विरोध में पैदा हुआ है आतंकवाद एवं नक्सलवाद। झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार, पश्चिम बंगाल या जम्मू-कश्मीर आदि प्रान्त हों उनमें सरकारी तंत्र की अन्यायपूर्ण व्यवस्था और सुरक्षा बलों द्वारा किए जाने वाले बेवजह अत्याचार के बिरोध में जड़ जमा चुका नक्सलवाद या फिर आतंकवाद इसी का परिणाम है। यूपी के बिहार से सटे कुछ जिलों में नक्सलवाद अपना सिर उठाने भी लगा है। यह विकट समस्या इस शांतिपूर्ण तराई क्षेत्र में भी पनप सकती है क्योंकि यहां भी एसएसबी के जवान अपने ही हिन्दुस्तानी भाईयों के सीनो पर बेवजह गोलियां दाग रहे हैं। इससे क्षेत्रीय युवाओं के मन में अत्याचार और शोषण के खिलाफ सुलग रही बिरोध की आग को पहचान कर अगर नक्सली नेताओं ने यहां आकर हवा दे दी तो यह शांत इलाका भी नक्सलवाद की चपेट में आकर आतंकवाद को पैदा कर सकता है। क्योंकि यह तराई इलाका पूर्व में 80-90 के दशक में नेक्सलाइट मूवमेंट और सिक्ख आतंकवाद का प्रमुख पनाहगाह रह चुका है। ऐसी बन रही पस्थितियों से निपटने के लिए आवश्यक हो गया है कि फोर्स कोई भी हो उसके जवानों को विपरीत परिस्थितियों में भी संयम बरतने का प्रशिक्षण दिए जाने के साथ ही उनको मानवाधिकारों का भी पाठ पढ़ाया जाए। इसके अतिरिक्त घटनाओं में दोषी पाए जाने वाले जवानों को सख्ती से दण्डित किया जाए, जिससे अन्य जवान भी उससे सबक हासिल करें और वह बेवजह किसी निर्दोश नागरिक पर गोली चलाने की हिम्मत न जुटा सकें। तभी सीमा पर सुरक्षा बलों एवं जनता के बीच बढ़ रही अविश्वास की खाइयों को पाटा जा सकता है और पूरी तरह से शांति कायम हो सकती है।
इसी का परिणाम है खीरी जिले के ग्राम त्रिकोलिया में जवानों द्वारा किया गया हिंसक तांडव एवं हत्याकांड, जिसमें दो निरीह बेगुनाह ग्रामीण मारे गए। निरंकुश जवानों के द्वारा आम जनता के साथ किये जाने वाले अनेक तरह के अत्याचारों और शोषण के विरोध में सीमावर्ती गांवों में उनके बीच बढ़ते तनाव से युवाओं के मन में विरोध की आग सुलगने लगी है, जिसकी परिणीत नक्सलवाद या आतंकवाद अथवा हथियारबंद बिरोध के रूप में कभी भी हो सकती है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। यद्यपि त्रिकोलिया काण्ड के मद्देनजर यूपी की सरकार ने सीमावर्ती क्षेत्रों में दिनोंदिन जवानों और ग्रामीणों के बीच बढ़ रहे तनावों और संघर्षों की रोकथाम के लिए भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत मिले एस0एस0बी0 के पुलिस अधिकारों में कटौती किये जाने का प्रस्ताव पुनः केन्द्र सरकार को भेजा है।
2 अगस्त 2010 को एसएसबी की वर्दी तब शर्मसार हो गई जब जवानों ने मामूली विवाद से रोष में आकर दो बेगुनाह ग्रामीणों की गोली मारकर हत्या कर दी। घटना खीरी जिले के ग्राम त्रिकोलिया की है, विवाद सिर्फ इतना था कि सड़क पर साइड न मिलने से एक गाड़ी का पीछा करते हुए एसएसबी के जवान अपने डिप्टी कंमाडेंट के निर्देश पर पूर्व विधायक निरवेन्द्र कुमार ‘मुन्ना‘ के आवास पर पहुंच गए। जहां पर जवानों ने जनप्रतितिनिधि रहे पूर्व विधायक के साथ अभद्रता ही नहीं की वरन् उनको डंडा भी मार दिया। इससे आक्रोशित ग्रामीणों ने जवानों को रोक लिया। इनकी सूचना पर त्रिकोलिया पहुंचे दर्जनों बेलगाम जवानों ने बिना किसी से बात किए लाठीचार्ज का तांडव शुरू कर दिया। उनके द्वारा नियम-कायदों को ताक पर रखकर ग्रामीणों पर बरसाई गई गोलियों से तमाशबीन रहे बेगुनाह गरीब युवक पाइया और बदरूद्दीन की मौत हो गई। इस पूरे घटनाक्रम में भी यह बात उभर कर आई कि यदि एसएसबी के अधिकारी संयम बरत कर समझदारी से परिस्थितियों का आंकलन करते और सिविल पुलिस के सहयोग से कानूनी कार्यवाही करते तो शायद बेवजह हुई दो युवकों की अकाल मौत को टाला जा सकता था।
निरंकुश जवानों द्वारा किया जाने वाला यह हिंसक तांडव कोई पहली घटना नहीं है। सन् 2001 से ही इस फोर्स ने अपनी तैनाती के बाद से भारत-नेपाल सीमावर्ती क्षेत्रों के आदिवासियों तथा अन्य निवासियों पर अत्याचार शुरू कर दिया था। हिंसक घटनाओं के अलावा भारत-नेपाल सीमावर्ती ग्रामीणों के साथ किए जाने वाले बेवजह उत्पीड़न, अत्याचार, आर्थिक शोषण और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ एवं यौन शोषण आदि के विरोध में जवानों तथा ग्रामीणों के बीच टकराव की अनगिनत घटनाएं हो चुकी हैं। जिनमें पुलिस एवं जिला प्रशासन को कानून व्यवस्था को बनाए रखने में काफी मसक्कत करनी पड़ी। यहां तक मामले को रफा-दफा करने के लिए एसएसबी अधिकारियों को सार्वजनिक माफी तक मांगकर शर्मिदंगी भी झेलनी पड़ी। एसएसबी के जवानों द्वारा अपने ही हिंदुस्तनी भाईयों के सीनों पर ही चलाई जा रही गोलियां अगर तस्करों, आतंकवादी, विदेशी घुसपैठियों अथवा भारतीय वन संपदा को बचाने के लिए चलाई जातीं तो आमजनता के बीच विलेन बन रहे एसएसबी के जवानों का रूप हीरो का होता और वाह-वाही तथा सम्मान मिलता अलग से ।
भारत-नेपाल की खुली सीमा दुधवा नेशनल पार्क के जंगल से सटी है, इसलिए सीमाई इलाकों से वन कटान तथा वन्यजीवों के अंगों का अवैध कारोबार एवं तस्करी का गैर कानूनी कार्य एसएसबी एवं बन विभाग और तस्करों की हुई जुगलबंदी के बीच निर्वाध रूप से चल रहा है। यह अवैध गोरखधंधा उजागर न हो जाए इसलिए भी आतंक फैलाकर ग्रामीणों को भयभीत किया जा रहा है, ताकि वह उनके खिलाफ अपना मुंह न खेल सकें। जबकि राष्टृीय सुरक्षा से जुड़ी इस फोर्स का यह आचरण कतई शोभनीय नहीं है। एसएसबी के जवानों के कुकृत्यों से केंद्र सरकार की भूमिका पर भी प्रश्नचिन्ह लगता है। फोर्स कोई भी हो उसका काम यह नहीं है कि वह आम जनता को तंग और परेशान करे। जनता की सुरक्षा के लिए सीमापर लगाई गई फोर्स आज उनकी सुरक्षा के लिए ही सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। खीरी जिले के ही नहीं वरन यूपी के अन्य सीमावर्ती ग्रामीणांचल समेत उत्तरांचल के सीमाई इलाकों की जनता भी इनके अशोभनीय व्यवहार और कुकृत्यों से त्रस्त हैं। इसके चलते भारत-नेपाल सीमा पर एसएसबी की मौजूदगी पर प्रश्नचिन्ह लग गया है।
भारत-नेपाल सीमा पर एसएसबी के लगभग दस साल के क्षेत्रीय इतिहास में कोई अहम व उल्लेखनीय उपलब्धि तो उसके खाते में दर्ज नहीं हो सकी है। जिसमें जवानों को वाहवाही मिली हो, जबकि वर्दी पर बदनुमा दाग तमाम लग चुके हैं। यद्यपि एसएसबी द्वारा जनता का सहयोग पाने तथा परस्पर प्रेम बढ़ाकर सीमा पर शांति कायम रखने के उद्देश्य से सीमावर्ती गांवों में सद्भावना जागरूकता अभियान समय-समय पर चलाए जाते हैं। बावजूद इसके उनके तथा जनता के बीच दूरियां लगातार बढ़ ही रही हैं और जो थोड़ी बहुत शान्ति थी वह भी पूरी तरह से भंग हो चुकी है। आजाद भारत में अंग्रेजी शासन वाले फोर्स की तरह एसएसबी के जवान सीमा पर हुकूमत कर रहें हैं। जबकि फोर्स कोई भी हो उसका उद्देश्य होता है कि संयम से काम लेते हुए बिपरीत परिस्थितियों का आंकलन करके समस्या का निराकरण करना। इसके बजाय जवान अमानवीय व हिंसक तरीका अपनाते हैं जिससे संघर्ष और टकराव बढ़ने लगा है। जबकि कैसी भी विषम एवं विपरीत परिस्थितियां हों उसमें हलका-फुलका बल प्रयोग तो जायज हो सकता है, परंतु गोली चला देना कम से कम अंतिम निर्णय तो कतई नहीं होना चाहिए। क्योंकि आक्रोशित जनता ने भी अगर अत्याचार और शोषण का जवाब हथियारबंद टकराव से देना शुरू कर दिया तो स्थिति और भयावह हो सकती है।
इतिहास गवाह है कि फोर्स कोई भी हो अथवा सरकारी तन्त्र, जिसने जब भी गरीब आम जनता पर अकारण अत्याचार किया तो उसके विरोध में पैदा हुआ है आतंकवाद एवं नक्सलवाद। झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार, पश्चिम बंगाल या जम्मू-कश्मीर आदि प्रान्त हों उनमें सरकारी तंत्र की अन्यायपूर्ण व्यवस्था और सुरक्षा बलों द्वारा किए जाने वाले बेवजह अत्याचार के बिरोध में जड़ जमा चुका नक्सलवाद या फिर आतंकवाद इसी का परिणाम है। यूपी के बिहार से सटे कुछ जिलों में नक्सलवाद अपना सिर उठाने भी लगा है। यह विकट समस्या इस शांतिपूर्ण तराई क्षेत्र में भी पनप सकती है क्योंकि यहां भी एसएसबी के जवान अपने ही हिन्दुस्तानी भाईयों के सीनो पर बेवजह गोलियां दाग रहे हैं। इससे क्षेत्रीय युवाओं के मन में अत्याचार और शोषण के खिलाफ सुलग रही बिरोध की आग को पहचान कर अगर नक्सली नेताओं ने यहां आकर हवा दे दी तो यह शांत इलाका भी नक्सलवाद की चपेट में आकर आतंकवाद को पैदा कर सकता है। क्योंकि यह तराई इलाका पूर्व में 80-90 के दशक में नेक्सलाइट मूवमेंट और सिक्ख आतंकवाद का प्रमुख पनाहगाह रह चुका है। ऐसी बन रही पस्थितियों से निपटने के लिए आवश्यक हो गया है कि फोर्स कोई भी हो उसके जवानों को विपरीत परिस्थितियों में भी संयम बरतने का प्रशिक्षण दिए जाने के साथ ही उनको मानवाधिकारों का भी पाठ पढ़ाया जाए। इसके अतिरिक्त घटनाओं में दोषी पाए जाने वाले जवानों को सख्ती से दण्डित किया जाए, जिससे अन्य जवान भी उससे सबक हासिल करें और वह बेवजह किसी निर्दोश नागरिक पर गोली चलाने की हिम्मत न जुटा सकें। तभी सीमा पर सुरक्षा बलों एवं जनता के बीच बढ़ रही अविश्वास की खाइयों को पाटा जा सकता है और पूरी तरह से शांति कायम हो सकती है।
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