शनिवार, 21 फ़रवरी 2009

अफसारो की नाकामी से बाघ बन रहें हैं आदमखोर


लखीमपुर जिले के साउथ फारेस्ट डिविजन की भीरा रेंज के ग्राम कापटांडा के आसपास चार मानव हत्या करने वाला बाघ यूपी के वन बिभाग के अफसरों की नाकामी और असफलता की सलीब पर चड्कर 20 फरवरी 2009 को मौत की सजा पा चुका है. अब बन बिभाग के ही लोग जो बाघों के रछक थे वही उसे गोली मार कर मौत की नींद सुलाने के लिए बाघ को खोज रहें है.जबकि दो माह पहले किशनपुर वन पशु बिहार के जंगल से बाहर आए इस बाघ को अगर प्रयास किए जाते तो इसे वापस जंगल में भेजा सकता था लेकिन बनाधिकारियो कोई भी ऐसा सार्थक प्रयास नहीं किया. परिणाम बाघ जंगल में भोजन की हुई कमी के कारण खेत में झुकाकर कम कराने वालों को चोपाया समझकर मानव पर हमला शुरु किया और फिर खूंखार बन कर चार मानव ही हत्या करके बाघ आदमखोर बन गया. इसके बाद भी उसे पकड़ने के अथवा बेहोश करने के सार्थक प्रयास नहीं किए गए और बाघ को मानाव के लिए खतरनाक घोषित करके मुख्य वन संरछक वन्यजीव बीके पटनायक ने बाघ को गोली मरने का आदेश जारी कर दिया है. एक तरफ़ पूरा विश्व बाघ संरछण की बात कर रहा है और यूपी के अफसर अपनी नाकामी पर परदा डालने के लिए मानव हत्या का सहारा लेकर यूपी के जंगलों से बाघोन का सफाया कराने से परहेज़ नहीं कर रहे हैं. इससे पहले भी बिभागीय अफसरों की सुस्ती से पीलीभीत के जंगल से निकाला बाघ लखनऊ तक पहुँचा अब वह फ़ैज़ाबाद के आसपास अपनी जान बचता घूम रहा है. इस बाघ को भी बीच में रोक कर जंगल में वापस किया जा सकता था लेकिन यह न करके अपनी नाकामी की चादर की आड़ लेकर इस बाघ को भी मौत की सजा दिलवाने में सफल रहे थे. आख़िर यह कब तक चलेगा. यह स्वयं में बिचारणीय प्रश्न बन गया है. बाघों को आदमखोर घोषित करने से पहले क्या अध्ययन किया जाता है. शायद नही, क्योकि कांपटांडा वाले बाघ में कागजो पर बने गई कमेटी ने बाघ की मौत के फरमान की सिफारिश कर दी थी. यह क्रूर मजाक बाघ के जीवन के साथ क्यों किया गया इसमें साज़िश की स्पस्ट बू आ रही है.भ्रस्टाचार और अफसरों की नालायकी के कारण यूपी में प्रोजेक्ट टाईगर असफलता की डलान पर चल रहा है. तीस साल में अरबों रुपया खर्चने के बाद भी बाघों की संख्या बडने के बजाय घाट ही रही है. आख़िर क्यों ? कहीं न कहीं सिस्टम में झोल है. और नाकाम बनाधिकारी इस पर परदा डाल रहें हैं. राजस्थान का सारिस्का नेशनल पार्क इसका जीता जागता उदाहरण है. वहाँ भी बनाधिकारियो की ही नाकामियों के चलते बाघ गायब हो गए थे. अब यही साज़िश दुधवा नेशनल पार्क के बाघों के साथ रची जा रही है. बाघ जंगल के बाहर क्यों आते हैं इस पर शोध क्यों नहीं किए जा रहें. बिड्म्बना यह है कि दुधवा प्रशासन किसी को इसकी इजाजत भी नहीं देते है. ऐसा क्यो किया जाता है. इसकी जाँच होनी चाहिए. फिलहाल बाघ को मार देना क्या समस्या का स्थाई समाधान है. जवाब होगा शायद नहीं ? और आगे भी कोई बाघ आदमखोर नहीं बनेगा. इसकी भी कोई गारन्टी नहीं है. ऐसी दशा में अब यह आवश्यक हो गया है कि प्रोजेक्ट टाइगर की समीछा की जाए. और मानव तथा वन्यजीवों के बीच बड रहे संघर्श को नई परिभाषा दी जाए ताकि दोनों अपनी सीमाओं में सुरछित जीवन ब्यतीत कर सकें. अन्यथा की सिथति में परिणाम खतरनाक ही निकलेगे. जिसका खामियाजा दोनो को भुगतना पडेगा.,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,डीपी मिश्रा

मोहताज़ नही प्यार

PYAR kisi ek din ka mohtaaz nhi hota. payar kisi kagaz par likhe shabdo mai nhi hota pyar kisi fool ki khushboo mai bhi nhi hota pyar gift paane ya dene ka nam nhi ..................pyar do dilo ka ,aatmao ka milan hota hai ,kagaz par likhe shabd kisi khas din mai adhik mahatav nhi rakhte ,kisi khas din mai fool ki khushboo nhi barh jati ...............pyar ko mahssus karna hota hai , pyar ka ahsas jaruri hai ....................... aaj pyar sabji bhaji ki tarah sab log bechege n kharidege ..chand fullo,greetings ya gifts ke sath pyar nhi barega .pyar ko barane ke liy aapki bhavnai ki kafi hai, jise tumse sachcha pyar hai wo aaj is valentine day ka mohtaj nhi .......................... aap chahe jitne logo ko happy valentine day kahe .but sorry to say mai kisi spl din mai vishwas nhi karti .mera pyar anmol hai ,unique hai ..mai aaj unko isliy pyar wish nhi karungi k aaj spl din hai balki mai to har din har waqt pyar karti hu unse, mera pyar samay ya tarikh ka nhi sochta .pyar ka ahsas n bhavnao ki tivrta bas pyar prakat karne ka andaaz badal deti hai jo
muze hai pasand mai wo karti hu ........ aapko jo pasand hai wo aap kare.................

शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

कुछ लोग जान से प्यारे होते .....

हर सागर के दो किनारे होते है,
कुछ लोग जान से भी प्यारे होते है,

ये ज़रूरी नहीं हर कोई पास हो,

क्योंकी जिंदगी में यादों के भी सहारे होते है !

दिलको हमसे चुराया आपने ,

दूर होकर भी अपना बनाया आपने,

कभी भूल नहीं पायेंगे हम आपको,

क्योंकि याद रखना भी तो सिखाया आपने।

याद करते है तुम्हे तनहाई में,

दिल डूबा है गमो की गहराई में,

हमें मत धुन्ड़ना दुनिया की भीड़ में,

हम मिलेंगे में तुम्हे तुम्हारी परछाई में।

मौत के बाद याद आ रहा है कोई,

मिट्ठी मेरी कबर से उठा रहा है कोई,

या खुदा दो पल की मोहल्लत और दे दे,

उदास मेरी कबर से जा रहा है कोई।

दर्द को दर्द से न देखो,

दर्द को भी दर्द होता है,

दर्द को ज़रूरत है दोस्त की,

आखिर दोस्त ही दर्द में हमदर्द होता है!

सांसो का पिंजरा किसी दिन टूट

जायेगाफिर मुसाफिर किसी राह में छूट जायेगाअभी साथ है

तो बात कर लिया करोक्या पता कब साथ छूट जायेगा

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

दुधवा नॅशनल पार्क लखीमपुर-खीरी


775 Sqr KM forest area between Mohana and Suhaili river was declared as reserved forest in 1861. In 1977 Government declared 614 sqr KM area of district Kheri reserved as Dudwa National Park. Dudwa National Park is known as the Ist National Park of the state after formation of Uttrakhand. Another reserve area "Kishunpur Pashu Vihar" sanctuary located about 30 KM from Dudwa. Spread over about 204 sqr.km. , it lies on the banks of river Sharda and is surrounded by Sal forest of adjoining reserve forests.
In 1987 Dudwa National Park and Kishunpur Pashu Vihar was merged to form Dudwa Tiger Reserve (DTR). The Dudwa Tiger Reserve has total area of 818 sqr KM. It is home to a large number of rare and endangered species which includes Tiger, Leopard cat, Slath beer, rinosaurs (One horn), Hispid hare, Elephants, Black deer& Swamp deer etc,,,,,,,,

शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

पिछले पाँच वर्षों में 400 से अधिक बाघ लापता हो चुके
भारत में बाघों की संख्या आधी हुई
भारत सरकार ने बाघों की ताज़ा आंकड़े जारी किए हैं जिनके अनुसार बाघों की संख्या आधी हो गई है.

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण ऑथारिटी के सचिव राजेश गोपाल ने बताया,'' सन् 2002 के सर्वेक्षण में बाघों की संख्या 3500 आंकी गई थी लेकिन ताज़ा सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 1411 बाघ बचे हैं.''

हालांकि सरकार का कहना है कि पिछले आंकड़े सही नहीं थे.

राजेश गोपाल का कहना था कि इस बार बाघों की संख्या के लिए नया तरीका अपनाया गया. पिछली बार पैरों के निशान के आधार पर इनकी संख्या का निर्धारण किया गया था जिसमें चूक की गुजांइश थी.

उनका कहना था,'' अब बाघ केवल देश के 17 राज्यों में पाए जाते हैं और वे केवल बाघ संरक्षित क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं.''

घटती संख्या पर चिंता

मध्य प्रदेश में इनकी संख्या सबसे अधिक 300 है. उत्तराखंड में 178, उत्तर प्रदेश में 109 और बिहार में 10 बाघ होने का अनुमान हैं.

इसी तरह आंध्र प्रदेश में 95, छत्तीसगढ़ में 26, महाराष्ट्र में 103, उड़ीसा में 45 और राजस्थान में 32 बाघ होने का आकलन किया गया है.

इसके पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बाघों की कम होती संख्या पर चिंता प्रकट की थी और कहा था कि कि जंगलों पर जनसंख्या का दबाव कम करने के प्रयास किए जाएँ.

इसके बाद बाघों की रक्षा के लिए भारत सरकार ने एक कार्यदल का गठन किया था और पर्यावरणविद् सुनीता नारायण को उसका प्रमुख बनाया गया था.

अवैध शिकार और घटते जंगलों को इसका सबसे बड़ा कारण बताया जा रहा है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में संरक्षण के उपायों के बावजूद बाघों की संख्या लगातार घट रही है.

माना जा रहा है कि

उल्लेखनीय है कि विश्व के 40 प्रतिशत बाघ भारत में रहते हैं.
...........D.P.MISHRA

शुक्रवार, 16 जनवरी 2009

डांस ...............

क़ानून का उपहास नागरिकों के जीवन से खिलवाड

यूपी के जिला खीरी में तहसील पलिया में मैलानी-गोंडा रेलपथ पर बने रेल पुल से सड़क और रेल यातायात संचालित होता है. कानूनन ओवरलोड वाहनॉ के आवागमन पर रोक है. लेकिन रेल अफसरों ने निज:स्वार्थ में इस तरह के वाहनो को रोकने के लिए पुल के दोनों तरफ़ लगे मीटर हाइट गेजो को हटवा दिया है. इससे पुल जीर्ण्-शीर्ण हो ही रहा है साथ में नागरिकों का जीवन भी खतरे में पद जाता है,.................................... मालूम हो दुधवा नेशनल पार्क को जोड़ने वाला यही एकमात्र पुल है,,,,,,जिसपर अक‍सर घंटों जाम भी लग जाती है,,,,,,,,

गुरुवार, 1 जनवरी 2009

नया साल सभी को मुबारक हो

WISH YOU HAPPY NEW YEAR 2009
May the coming year of 2009
also mark the beginning of Peace, Prosperity,
Love, Happiness, Bright Futures and Warmest विशेस
----डीपी मिश्रा

सोमवार, 29 दिसंबर 2008

यूपी के खीरी में एक तेदुआं और मरा

यूपी के दुधवा टाईगर रिजर्व के तहत कतर्नियाघट वन्यजीव प्रभाग के समीपवर्ती नार्थ खीरी वन प्रभाग के जंगल मे शावको के साथ डेरा जमाए एक बाघिन ने अपने बच्चो पर खतरा देखकर एक युवा तेदुआ से भिड़ गई. इस द्वंदयुद्ध में कमजोर पढे तेदुआ को मौत के घाट उतार दिया. इस तरह खीरी में एक तेदुआ की असमय मौत हों गई. जिसे वाइल्ड लाईफ के लिए अपूरणीय छ्ती माना जा रहा है. इससे पहले बिगत माह घायल तेदुआ की लखनऊ ले जाते समय मौत हों गई थी. जबकि माह मई में आदमखोर हुए तेदुआ को ग्रामीणों ने खेत में जिंदा जला दिया था. इस तरह सन् 2008 में तीन तेदुओ की हुई असमय मौतों ने यहाँ वन्यजीवों की सुरछा के लिए चल र्ही योजनाओं को करारा झट्का पहुचाया है. ............................................ डीपी मिश्र

सोमवार, 15 दिसंबर 2008

आतंक के पीछे क्या मकसद है ?

देश में रोज हों रही आतंकी घटनाओं ने समाज को हिलाकर रख दिया है। लगातार बिस्फोटो ने आम आदमी कीं सुरछा और देश के खुफिया तंत्र पर सवालिया निशान लगाया है। हर आतंक कीं घटना के बाद कडी सुरछा ब्यवस्था का राग अलापा जाता है। लेकिन नतीजा शून्य रहता है। आतंकी योजनाबद्ध तरीके से घटनाओं को अंजाम देकर साफ निकल जाते हैं। उसके बाद पुलिस का काम घटना में मारे गये लोगों को उठाना और घायलो को अस्पातल पहुँचाने तक रह जाता है। जबकि सुरछा एजेसिया बिस्फोट के तरीको का पता लगाने में जुट जाती है। जब तक हम बिस्फोट के तरीको का पता लगा पाते है। तब तक आतंकी एक नई घटना को अंजाम दे देते हैं। पुलिस व जांच एजेंसियो का काम फिर वही से शुरू हों जाता है. यह आतंकी कौन हैं? और इनका मकसद क्या है? यह बात हमेशा पर्दे के पीछे रह जाती है. चंद वही मोहरे आते हैं जिनका काम खत्म हो चुका होता है. इसमे ज्यादातर हमारे बीच के कुछ गुमराह युवक होते है. जयपुर्, बगलौर्, अहमदबाद, बिस्फोट हों या दिल्ली में हुए ताजा धमाके इस बात को साबित करते हैं कि अपने हाथो हम मात खा रहे हैं. देश के जो युवक इन आतंकियों से जुड्ते हैं वह अनपढ़ से लेकर उच्च शिछा प्राप्त होते है. इन युवको के जुड्ने का मकसद क्या है इस बात का पता न सुरछा एजेंसिया लगा पा रही हैं और न ही यह युवक इसकी वजह बता पाते हैं. पुलिस ने मुठभेड़ के दौरान कई को मार गिराया, जबकि कुछ को गिरफ्तार किया. फिर भी यह बात सामने नही आई है कि इन्होने यह देश बिरोधी कदम क्यों उठाया. और इसके पीछे कौन सी मजबूरिया रही. मुख्यरूप से इस बात पे गहन जाँच कीं जरूरत है कि भारतमाता के लाल देश को क्यों नुकसान पहुंचा रहे हैं. और जब बात मुस्लिम समाज से जुडे लोगों की हों तो और भी खतरनाक हों जाती है पिछले कुछ महीनो में देश के बिभिन्न जगहों पर हुए बिस्फोटो ने मुसलिम को ही जिम्मेदार करार दिया है. जबकि देश में चौदह करोड मुसल्मान अपनी पूरी धर्मिक स्वतंत्रता के साथ रह्ते है. चंद मुस्लिम युवको के कारण पूरे देश का मुसलमान संदिग्ध निगाह से देखा जाने लगा है. मौजूदा समय में मुसिलम अघोषित रुप से आतंक का पर्याय करार दिया जा रहा है. इसमे मुख्य रुप से दोषी मुस्लिम समाज के वह अगुवाकर भी हैं जो अपनी बात मजबूत तरीके से नही रखते हैं किसी भी मुस्लिम धर्मगुरू व नेता का आतंकवाद के बिरोध में मजबूत बयान नही आया.पहले हम किसी आतंकी घट्ना के पीछे पडोसी मुल्क पाकिस्तान का हाँथ बताकर अपना पीछा छुडा लेते थे और यह आरोप मड्ते थे कि देश में आईएसआई आतंकवाद की जडो को मजबूत कर कही है. लेकिन अब स्थितिया कफी हद तक भिन्न हों गई हैं, अब देश में ही जन्मी सिमी और इंडियन मुज्जाहिद्दीन जैसी सस्थाए आतंक्वादी घटनाओं को अंजाम दे रही हैं. इन संस्थाओ के संस्थापक से लेकर कार्यकर्ता तक भारतीय हैं. महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इन संस्थाओं को पैसा और हथियार कौन मुहैया करा रहा है. और किन-किन माध्यमों से इन तक पहुँच रहे हैं ? भारतीय खुफियातंत्र इनका पता लगाने में क्यों नाकामयाब हैं. भारी तादात में आतंक कीं घटनाएँ होने के बाद भी खुफियतंत्र के पास भी केवल सतही जानकारियाँ उपलब्ध हैं. अब जरूरत इस बात कीं है कि खुफियातंत्र उन वजहों को तलाश करे जो आतंकवाद को बढ़ावा दे रहें हैं इतना ही नही वह आतंक कीं घटना के उस मास्टरमाइंड तक पहुँचने का रास्ता भी तलाश करें. ना कि किसी को भी पकड़कर उसे मास्टरमाइंड साबित करने में अपनी ऊर्जा खपाए. राजनीतिक स्तर पर भी इन घटनाओं का लाभ उठाना छोड़कर देशहित कीं बात करनी चाहिए, और समाज को इन आतंकियों के मनसूबो को असफल करने के लिए तैयार करना चाहिए. तभी इस तरह कीं घटनाओं पर रोक लग सकेगी.............................................................. डीपी मिश्र

बुधवार, 10 दिसंबर 2008

आतंकवादियों का कोई धर्मं नही होता

26/11ब्लैक नवंबर, केवल मुंबई पर हमला नहीं था, बल्कि यह हमला धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक संविधान और समूचे भारतीय गणतंत्र के साथ साथ इंसानियत पर भी हमला था। इस हमले में मुंबई एटीएस के बहादुर महानिदेशक हेमंत करकरे और दो अन्य अधिकारियों समेत 20 सिपाहियों को अपनी जान गंवानी पड़ी। यूं तो हर मुठभेड़ में ( जो वास्तविक हो ) में किसी न किसी सैनिक को जान गंवानी पड़ती है लेकिन करकरे की पीठ पर वार किया गया और हत्यारे करकरे का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा सके। जब जब मुंबई हादसे और करकरे का जिक्र आ रहा है तो बार बार ब्लैक नवंबर से महज दो या तीन दिन पहले करकरे का वह वक्तव्य याद आ जाता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि मालेगांव बमकांड में पकड़े गए आतंकवादियों के पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई से संबंध हैं। करकरे के इस बयान के बाद ही भगवा गिरोह के कई बड़े गददीदारों के बयान आए थे कि 'एटीएस की सक्रियता संदिग्ध है'। देखने में आया कि करकरे के इस बयान के तुरंत बाद ही मुंबई पर हमला हो गया। क्या करकरे की शहादत एटीएस को चुनौती है कि अगर करकरे की बताई लाइन पर चले तो अंजाम समझ लो? करकरे की बात अब सही लग रही है , क्योंकि हमलावर आतंकवादी मोदिस्तान गुजरात के कच्छ के रास्ते ही बेरोक टोक और बेखौफ मुंबई तक पहुंचे थे। इससे पहले भी कई बार खुलासे हो चुके हैं कि देश में आरडीएक्स और विस्फोटकों की खेप गुजरात के रास्ते ही देश भर में पहुंची। भगवा गिरोह गुजरात को अपना रोल मॉडल मानता है और परम-पूज्य हिंदू हृदय समा्रट रणबांकुरे मोदी जी महाराज घोषणाएं कर चुके हैं कि गुजरात में आतंकचाद को कुचल देंगे।ष्लेकिन तमाशा यह है कि जो लोग 26 नवंबर की शाम तक करकरे को खलनायक साबित करने पर आमादा थे अचानक 27 नवंबर को उनका हृदय परिवर्तन हो गया और उन्हें अपने कर्मों पर इतना अधिक अपराधबोध होने लगा कि वो करकरे की विधवा को एक करोड़ रुपए की मदद देने पहुंच गए। लेकिन जितनी ईमानदारी और बहादुरी का परिचय करकरे ने दिया उससे दो हाथ आगे बढ़कर उनकी विधवा पत्नीष्ने एक करोड़ रुपए को लात मारकर करकरे की ईमानदारी और बहादुरी की मिसाल को कायम रखकर ऐसे लोगों के मुंह पर करारा तमाचा मारकर संदेश दे दिया कि जीते जी जिस बहादुर को खरीद नहीं पाए उसकी शहादत को भी एक करोड़ रुपए में खरीद नहीं सकते हो गुजरात में मंदिर गिराने वाले भगवा तालिबानों! ब्लैक नवंबर से रतन टाटा को 4000 करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को कई हजार करोड़ रुपए और सौ से अधिक जानों का नुकसान हो सकता है। करकरे समेत 20 जाबांज सिपाहियों की शहादत से सैन्य बलों को नुकसान हो सकता है, लेकिन इसका फायदा सिर्फ और केवल सिर्फ भगवा गिरोह को हुआ है और उसने यह फायदा उठाने का भरपूर प्रयास भी किया है। करकरे की शहादत के बाद अब लंबे समय तक मालेगांव की जांच ठंडे बस्ते में चली जाएगी और गिरफ्तार भगवा आतंकवादी ( कृपया हिंदू आतंकवादी न पढ़ें चूंकि हिंदू आतंकवादी हो ही नहीं सकता! ) न्यायिक प्रक्रिया में सेंध लगाकर बाहर भी आ जाएंगे और जो राज ,करकरे खोलने वाले थे, वह हमेशा के लिए दफन भी हो जाएंगे। हमारे पीएम इन वेटिंग का दल लाशों की राजनीति करने में कितना माहिर है, इसका नमूना 27 नवंबर को ही मिल गया। 27 नवंबर को जब मुंबई बंधक थी, सैंकड़ों जाने जा चुकी थीं और एनकाउंटर चल रहा था, ठीक उसी समय टीवी चैनलों पर एक राजस्थानी हसीन चेहरा ( जो रैंप पर अपने जलवे बिखरने के कारण भी सुर्खियों में रहा है ) आतंकवाद पर विफल रहने के लिए कांग्रेस और केंद्र सरकार को कोस रहा था और ' भाजपा को वोट / आतंक को चोट ' का नारा दे रहा था। अगर आतंक पर चोट के लिए भाजपा को वोट देना जरुरी है तो 26 नवंबर की रात से लेकर 29 नवंबर तक आतंक को कुचल देने वाले मोदी जी महाराज, पीएम इन वेटिंग, दुनिया के नशे में से पापी पाकिस्तान का नामो निशान मिटा देने की हुकार भरने वाले हिंदू हृदय सम्राट बाला साहेब ठाकरे किस दड़बे में छिपे थे? ये वीर योध्दा कमांडो के साथ क्यों लड़ाई में शामिल नहीं थे? भगवा गिरोह कहता है कि केंद्र सरकार नपुंसक है, हम भी मान लेते हैं कि केंद्र सरकार नपुंसक है। लेकिन 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद शहीद करने वाले और मुंबई, सूरत, अहमदाबाद की सड़कों पर कांच की बोतलों पर स्त्रियों को नग्न नचाने और सामूहिक बलात्कार करने वाले वो बहादुर भगवा शूरवीर किस खोह में छिपे थे? मुंबई के पुलिस महानिदेशक को, वर्दी उतारकर आने पर यह बताने कि मुबई किसके बाप की है ,चुनौती देने वाले मराठा वीर राज ठाकरे कहां दुबक गए थे ? पाक आतंकी तो वर्दी उतार कर आए थे। दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रो0 गिलानी पर थूकने वाले वीर मुंबई में थूकने क्यों नहीं गए? याद होगा कि बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद भाजपा ने कांग्रेस से पूछा था कि वह इंसपैक्टर शर्मा को श्शहीद मानती है या नहीं ? ठीक यही सवाल आज हम अडवाणी जी और परम प्रतापी मोदी जी से पूछना चाहते हैं कि वे करकरे को शहीद मानते हैं कि नहीं ? अगर नहीं तो मोदी करकरे की विधवा को एक करोड़ रुपए देने क्यों गए थे ? यदि इसलिए गए थे कि करकरे शहीद हैं तो स्वीकार करो कि करकरे ने जो कहा था कि मालेगांव के आतंकवादियों के आईएसआई से संबंध हैं, सही है और मुंबई हमला आईएसआई ने इसी सत्य पर पर्दा पर डालने के लिए कराया है। मुंबई हादसा एनडीए सरकार द्वारा देश के साथ किए गए उस विश्वासघात का परिणाम है, जब भाजपा सरकार ने आतंकवाद के मुख्य सा्रेत खूुखार आतंकवादियों को सरकारी मेहमान बनाकर कंधार तक पहुचाया था और आज तक उस विश्वासघात के लिए भाजपा ने देश से माफी नहीं मांगी है, जिसके चलते आतंकी घटनाओं से बारबार भारत का सीना चाक होता है और करकरे जैसे बहादुर जांबाज सिपाही शहीद होते हैं। आखिर वह कौन सा कारण है कि मोहनचंद शर्मा की अंत्येटि में पहुंचने वाले लोग करकरे को आखरी सलाम करने नहीं पहुंचते हैं और 20 सैनिकों की शहादत के बाद भी उन्हें ये देश नपुंसक नजर आता है ??????? करकरे भले ही आज नहीं है, लेकिन करकरे की शहादत आतंकवाद विरोधी लड़ाई को हमेशा ज्योतिपुंज बनकर रास्ता दिखाती रहेगी और उनका यह मंत्र कि 'आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता है' आतंकविरोधी मिशन को पूरा करने का हौसला देता रहेगा।