सोमवार, 6 सितंबर 2010

आखिर जंगल से बाहर क्यों आते है बाघ ?

पीलीभीत के जंगलों से निकल वाया शाहजहांपुर "खीरी" पहुंचा बाघ
अक्सर जंगलों में शिकार की कमी के चलते ये जंगल का राजा मजबूरन अपना रुख बदलता है मानव आबादी की तरफ, दरअसल बाघ जब जंगल बदलने की कोशिश करता है तब मानव-और बाघ में टकराव की स्थित लामुहाला उत्पन्न होती है, जंगलों की नष्ट हुई श्रंखलाये इसका कारण बनती है अब बाघ को क्या मालूम कुछ ही कदमों पर ये जंगल ख़त्म हो जायेगें और आदिम बस्ती और उसके खेत खलिहानों में आदमी और उसके जानवरों से उसे बावस्ता होना पड़ेगा! आखिरकार ये जंगल खोजता खोजता भटक जाता है इन्सान के बनाये माया जाल में! जहां या तो उसकी मौत हो जाती है, या कैद ! एक रात में बीसों मील यात्रा कर लेने वाले इस जानवर को अब इतने विशाल जंगल नसीब नहीं है वजह साफ़ है कि विकास के नाम पर इन श्रंखलाबद्ध जंगलों को हमने तबाह कर दिया नतीजा हमारे सामने है! -Man-animal conflict! -Moderator

बिल्ली प्रजाति का अतिबलशाली ‘बाघ’ जन्म से हिंस्रक और खूंखार होता है, लेकिन मानवभक्षी नहीं होता है। इंसानों से डरने वाले वनराज बाघ को मानवजनित अथवा प्राकृतिक परिस्थितियां मानव पर हमला करने को विवश करती हैं। जब कभी बाहुल्य क्षेत्रफल में जंगल थे तब मानव और वन्यजीव दोनों अपनी-अपनी सीमाओं में सुरक्षित रहे, समय बदला और आबादी बढ़ी फिर किया जाने लगा वनों का अंधाधुन्ध विनाश।



जिसका परिणाम यह निकला कि जंगलों का दायरा सिमटने लगा, वन्यजीव बाहर भागे और उसके बाद शुरू हुआ न खत्म होने वाला मानव और वन्यपशुओं के बीच का संघर्ष। इसी का परिणाम है कि पिछले तीन सालों में जिला खीरी एवं पीलीभीत के जंगलों से निकले बाघों के द्वारा खीरी, पीलीभीत, शाहजहांपुर, सीतापुर, बाराबंकी, लखनऊ, फैजाबाद तक दो दर्जन के आसपास मानव मारे जा चुके हैं। इसमें दो बाघों को गोली मारी गयी। जबकि एक बाघ को पकड़कर लखनऊ प्राणी उद्यान भेजा जा चुका है। अब एक बार फिर पिछले पीलीभीत के जंगल से निकला बाघ आठ मनुष्यों को अपना निवाला बना चुका है। उसे पकड़ने की कवायद वन विभाग द्वारा की जा रही है।



दुधवा टाइगर रिजर्व परिक्षेत्र में शामिल किशनपुर वनपशु विहार, पीलीभीत और शाहजहांपुर के जंगल आपस में सटे हैं। गांवों की बस्तियां और कृषि भूमि जंगल के समीप हैं। जिससे मानव आबादी का दबाव जंगलों पर बढ़ता ही जा रहा है। इसके चलते विभिन्न परितंत्रों के बीच एक ऐसा त्रिकोण बनता है जहां ग्रामवासियों और वनपशुओं को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जाना ही है। भौगोलिक परिस्थितियों के चलते बनने वाला त्रिकोण परिक्षेत्र दुर्घटना जोन बन गया है। सन् 2007 में किशनुपर परिक्षेत्र में आबाद गावों में आधा दर्जन मानव हत्याएं करने वाली बाघिन को मृत्यु दण्ड देकर गोली मार दी गयी थी। इसके बाद नवंबर 2008 में पीलीभीत के जंगल से निकला बाघ खीरी, शाहजहांपुर, सीतापुर, बाराबंकी होते हुए सूबे की राजधानी लखनऊ की सीमा तक पहुंच गया था। इस दौरान बाघ द्वारा एक दर्जन ग्रामीणों का शिकार किया गया। बाद में इस आतंकी बाघ को नरभक्षी घोषित करके फैजाबाद के पास गोली मारकर मौत दे दी गयी थी। सन् 2009 के शुरूआती माह जनवरी में किशनपुर एवं नार्थ खीरी फारेस्ट डिवीजन के क्षेत्र में जंगल से बाहर आये बाघ ने चार मानव हत्याएं करने के साथ ही कई पालतू पशुओं का शिकार भी किया। इस पर हुई काफी मशक्कत के बाद बाघ को पिंजरें में कैद कर लखनऊ प्राणी उद्यान भेज दिया गया था। अब सन् 2010 में एक बार फिर पिछले माह पीलीभीत के जंगल से निकला बाघ खीरी, शाहजहांपुर में मानव का शिकार कर रहा है। इसके द्वारा आठ ग्रामीण मौत के घाट उतारे जा चुके हैं।



इसके आतंक से ग्रामीणों में दहशत फैली है और वन विभाग बाघ को पिंजरे में कैद करने के लगातार प्रयास किये जा रहे हैं। जन्म से खूंखार होने के बाद भी विशेषज्ञों की राय में बाघ इंसान पर डर के कारण हमला नहीं करता यही कारण है कि वह इंसानों से दूर रहकर घने जंगलों में छुप कर रहता है।



मानव पर हमला करने के लिए परिस्थितियां बिवश करती हैं। विश्वविख्यात बाघ विशेषज्ञ जिम कार्बेट का भी कहना है कि बाघ बूढ़ा होकर लाचार हो जाये अथवा जख्मी होने से उसके दांत, पंजा, नाखून टूट गये हो या फिर प्राकृतिक या मानवजनित उसके विषम परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हों, तभी बाघ मानव पर अटैक करता है। उनका यह भी मानना था कि जन्म से खार होने के बाद भी बाघ मानव पर एक अदृश्य डर के कारण हमला नहीं करता और यह भी कोई जरूरी नहीं है कि नरभक्षी बाघ के बच्चे भी नरभक्षी हो जायें।



बाघ अथवा वन्यजीव जंगल से क्यों निकलते हैं इसके लिए प्राकृतिक एवं मानवजनित कई कारण हैं। इनमें छोटे-मोटे स्वार्थो के कारण न केवल जंगल काटे गए बल्कि जंगली जानवरों का भरपूर शिकार किया गया। आज भी अवैध शिकार जारी है। यही कारण है कि वन्यजीवों की तमाम प्रजातियां संकटापन्न होकर विलुप्त होने की कगार पर हैं। इस बात का अभी अंदेशा भर जताया जा सकता है कि इस इलाके में बाघों की संख्या बढ़ने पर उनके लिए भोजन का संकट आया हो। असमान्य व्यवहार आसपास के लोगों के लिए खतरे की घंटी हो सकता है।



मगर इससे भी बड़ा खतरा इस बात का है कि कहीं मनुष्यों और जंगली जानवर के बीच अपने को जिन्दा रखने के लिए खाने की जद्दोजेहाद नए सिरे से किसी परिस्थितिकीय असंतुलन को न पैदा कर दे। जब तक भरपूर मात्रा में जंगल रहे तब तक वन्यजीव गांव या शहर की ओर रूख नहीं करते थे। लेकिन मनुष्य ने जब उनके ठिकानों पर हमला बोल दिया तो वे मजबूर होकर इधर-उधर भटकने को मजबूर हो गए हैं। इधर प्राकृतिक कारणों से चारागाह भी सिमट गए या कुप्रबंधन के कारण वे ऊंची घास के मैदानों में बदल गए। इसके कारण वनस्पति आहारी वन्यजीव चारा की तलाश में जंगल के बाहर आते हैं तो अपनी भूख शांत करने के लिए वनराज बाघ भी बाहर आकर आसान शिकार की प्रत्याशा में गन्ने के खेतों को अस्थाई शरणगाह बना लेते हैं। परिणाम सह अस्तित्व के बीच मानव तथा वन्यजीवों के बीच संघर्ष बढ़ जाता है। इसको रोकने के लिए अब जरूरी हो गया है कि वन्यजीवोंके अवैध शिकार पर सख्ती से रोक लगाई जाये तथा चारागाहों को पुराना स्वरूप दिया जाए ताकि वन्यजीव चारे के लिए जंगल के बाहर न आयें। इसके अतिरिक्त बाघों के प्राकृतिक वासस्थलों में मानव की बढ़ती घुसपैठ को रोका जाये साथ ही ऐसे भी कारगर प्रयास किये जायें जिससे मानव एवं वन्यजीव एक दूसरे को प्रभावित किये बिना रह सकें। ऐसा न किए जाने की स्थिति में परिणाम घातक ही निकलते रहेंगे, जिसमें मानव की अपेक्षा सर्वाधिक नुकसान बाघों के हिस्से में ही आएगा।

गजराज क्यों भटक रहे हैं ?


भारत में पूज्य माने जाने वाले 'गजराज' को अपने अस्तित्व के लिए आजकल एक नई लड़ाई लड़नी पड़ रही है। उनके शिकार, घटते जंगल और आहार में कमी और उससे भी ज्यादा इनकी आए दिन मनुष्य के साथ मुठभेड़ या गुस्से में इनका उपद्रव इनके लिए बड़ी मुसीबत बनता जा रहा है। कहीं इनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है तो कहीं बढ़ रही है। वन्य पशुओं के आने-जाने के रास्ते पर बढ़ते अतिक्रमण के चलते रोजमर्रा के टकराव की कीमत दूसरे वन्यजीवों को भी चुकानी पड़ती है।


पिछले कुछ सालों से भारत सरकार को पूर्वोत्तर के पड़ोसी देशों एवं लोगों से अपील करनी पड़ रही है कि उनके गांवों-खेतों में गलती से घुस आए हाथियों की हत्या न की जाए। प्रजनन, मौसम की मार से बचने और खाने की तलाश में वन्य जीव हर साल एक निश्चित अवधि या मौसम में एक इलाके से दूसरे इलाके की ओर जाते हैं। इस प्रक्रिया को आव्रजन कहा जाता है। ये हाथी हर साल थाईलैंड से भूटान की तराई में जाते हैं, जिसके बीच पूर्वोत्तर भारत का हिस्सा पड़ता है। हर साल ये हाथी रास्ते में आने वाले कई गांव उजाड़कर कई लोगों को मार देते हैं और कई लोग इन मुठभेड़ों में घायल भी हो जाते हैं। टकराव के रास्ते समस्या यह है कि जंगल में बने हाथियों के प्राचीन रास्तों पर लोगों ने गांव बसा लिए हैं, जिस वजह से हाथी भारत वापस जाने के लिए अपना रास्ता नहीं ढूंढ़ पा रहे हैं और भटक कर हिंसक हो रहे हैं।

ये हाथी थाईलैंड से भूटान की ओर आते हैं और भारत का पूर्वोत्तर हिस्सा उनके रास्ते में पड़ता है। मगर अधिकारियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में हाथियों की संख्या बढ़ी है। इसी वजह से हाथी अलग-अलग रास्तों से जंगलों में घुसने की कोशिश करते हैं। यह समस्या सिर्फ बांग्लादेश, थाईलैंड या भूटान की ही नहीं, बल्कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की भी है। सिर्फ असम में ही पिछले 15 वर्षों में हाथियों ने 600 से अधिक लोगों की जान ली है। पूर्वोत्तर भारत में जंगली हाथी अच्छी-खासी संख्या में पाए जाते हैं और अकेले असम में इनकी संख्या पांच हज़ार से अधिक बताई जाती है। जैसे-जैसे असम में लोगों की आबादी बढ़ती गई, लोगों ने ऐसे इलाकों में पांव पसारने शुरू कर दिए, जो हाथियों के आने-जाने के रास्ते थे। नतीजतन हाथी उनके रास्ते में आने वाले गांवों में तबाही मचा देते हैं, जिसका उन्हें अपनी जान देकर ख़ामियाजा भुगतना पड़ता है। हाथियों के उपद्रव से भड़के लोग इन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं और कभी गुड़ में जहर रखकर तो कभी शिकारियों को बुलाकर हाथियों की जान ले लेते हैं।

हाथी एक सामाजिक प्राणी है और झुंड बनाकर रहता है। यह प्राणी काफी संवेदनशील होता है। जानवरों में हाथी की याददाश्त काफी तेज मानी जाती है, यहां तक कि अपने झुंड़ के किसी सदस्य के मारे जाने पर अकसर हाथी गुस्से में आकर तबाही मचा देते हैं। सैटेलाइट से मिली तस्वीरें ताजे अध्ययनों में बताती हैं कि असम में 1996 से 2006 के बीच जंगल की लगभग चार लाख हेक्टेयर जमीन पर गांव वालों ने अतिक्रमण कर आबादी बसाकर खेती-बाड़ी शुरू कर दी है। अब जरूरत है ऐसे उपायों की जिनसे मनुष्य की हाथियों से मुठभेड़ को टाला जा सके। हाथियों के अकसर आबादी वाले इलाके में घुसने से जानमाल का बड़ा नुकसान भी होता है, पर इस घुसपैठ का कारण ढूंढ़ने के लिए, पहले ये सोचना होगा कि हाथी हमारे इलाकों में घुस आए हैं या फिर हम ही उनके इलाके में घुस गए हैं।

असम में जंगली हाथियों के नियंत्रण के लिए 'कुंकी' नाम से जाने, जाने वाले पालतू हाथियों की मदद ली जा रही है। असम और पश्चिम बंगाल के बहुत से इलाकों में अकसर उग्र हाथियों के झुंड खेतों, गांवों और लोगों पर हमला कर भारी तबाही मचाते हैं। विशेषज्ञों ने उग्र हाथियों को पालतू हाथियों के जरिये घेरकर उन्हें रास्ते पर लाने की कोशिश की है। इसके नतीजे भी सार्थक निकले हैं। सबसे अधिक प्रभावित इलाकों में इस रणनीति को अपनाया गया, वहां हाथियों की हिंसा से मरने वालों की संख्या में आश्चर्यजनक रुप से कमी हुई है। इस परियोजना के अधिकारी जंगली हाथियों के झुंड की गतिविधियों पर नजर रखते हैं और उनको पालतू हाथियों से घेरकर गांव से दूर रखते हैं। इस योजना को वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड से भी मदद हासिल है। हाथियों को भगाने के क्रूर पारम्परिक तरीकों जैसे करंट लगाना, फन्दे कसना और बम फोड़ना आदि से यह रणनीति काफी कारगर सिद्ध हुई है और वन्यजीव प्रेमी भी इस पहल से उत्साहित हैं।

हाथियों की बढ़ती समस्या के बाद भारत में अब कोशिश की जा रही हैं कि दो जंगलों के बीच एक गलियारा विकसित कर उसका संरक्षण किया जा सके। सुरक्षित रास्ता देने के लिए हाथियों के गलियारे पर तैयार की गई रिपोर्ट पर लगभग सभी बड़े विशेषज्ञों की राय ली गई थी और उम्मीद है कि इससे हाथियों को जंगलों में ही रोकना संभव होगा और उनके आबादी वाले इलाकों में घुसने की घटनाओं में कमी आएगी। भारत में ऐसे 88 गलियारों की पहचान की गई है और उन पर कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं सरकार के साथ मिलकर काम भी कर रही हैं, पर भारत में वन्यजीवों के रहवास के लिए किए जा रहे सभी प्रयासों में एक समस्या मुंह बाए खड़ी रहती है, वह है बढ़ती जनसंख्या। लगातार बढ़ती जनसंख्या और जंगल पर बढ़ते दबाव ने पिछले कुछ दशकों में हाथियों की समस्या को बढ़ाया है। इसके लिए देखना होगा कि हाथी दो जंगलों के बीच जिन इलाकों का उपयोग ऐतिहासिक रूप से करते रहे हैं, वहां कितने गांव हैं, आबादी का कितना घनत्व है इत्यादि।

दरअसल यही वो इलाके हैं जिन्हें विशेषज्ञ कॉरिडोर कहते हैं और इनके बंद हो जाने के कारण हाथियों ने मानव रहवासी क्षेत्रों में घुसपैठ कर मुसीबतें बढ़ा दी हैं। देश के विभिन्न राज्यों में स्थित इन गलियारों को अब हाथियों के आवागमन के लिए संरक्षित करने की कोशिश की जा रही है। इस योजना से वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया, इंटरनेशनल फंड फॉर एनिमल वेलफेयर, यूएस विश एंड वेलफेयर सर्विस और एशियन नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन जुड़े हैं। इसके अलावा गलियारों के संरक्षणों के लिए केंद्र और राज्य सरकार की भी सहायता ली जा रही है। अब उम्मीद यही है कि इन गलियारों को 'राजकीय गलियारा' घोषित कर दिया जाए और लोगों को जानकारी दी जाए कि इन इलाकों में विकास कार्य नहीं किए जा सकते। अब ऐसे इलाकों में लोगों को सिर्फ हाथियों से बचना ही नहीं है, हाथियों को बचाना भी जरूरी है। यह जागरूकता प्राकृतिक संतुलन कायम करने के लिए सबसे जरूरी है।

गुरुवार, 10 जून 2010

दुधवा नेशनल पार्क कैसे पहुंचे



कैसे पहुंच कर रूकें और देखें दुधवा को- 

                               -देवेन्द्र प्रकाश मिश्र 

प्रकृति की अनमोल धरोहर समेटे है दुधवा 


नेशनल पार्क

दुधवा -जनपद-लखीमपुर-खीरी

राज्य-उत्तर प्रदेश

भारत

स्थापना- 1 फ़रवरी १९७७

क्षेत्रफ़ल-     884 वर्ग किलोमीटर


भौगोलिक स्थित-  देशान्तर-अक्षांश-

80º28' E and 80º57' E (Dudhwa)

80º E to 80º50' E(Kishanpur) 


28º18' N and 28º42' N (Dudhwa)

28º N to 28º42' N (Kishanpur) 

समुन्द्र तल से ऊँचाई- 150-182 मीटर

दुधवा नेशनल पार्क की दूरी  दिल्ली से पूर्व दिशा में 

लगभग 430 कि०मी०, एंव लखनऊ से उत्तर पश्चिम की तरफ़ 230 कि०मी० है।

दिल्ली से दुधवा आने के लिए गाजियाबाद, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, शाहजहाँपुर, खुटार, मैलानी,



 गोला होते हुए पलिया पहुँचा जा सकता है, जहाँ से दुधवा मात्र 10 कि०मी० की दूरी पर स्थित है।

लखनऊ से दुधवा आने के लिए सिधौली, सीतापुर, हरगांव, लखीमपुर, भीरा, से पलिया होते हुए दुधवा 


नेशनल पार्क पहुंच सकते हैं।


वर्षा- 1500 mm (औसत)


जंगल- मुख्यता साल (शाखू) वन

वन्य जीव- खासतौर से यह जंगल पर्यटकों व शोधार्थियों को हिरनों की पाँच प्रजातियों- चीतल, साभर,

काकड़, बारहसिंहा, बाघ, तेन्दुआ, भालू, स्याही, फ़्लाइंग स्क्वैरल, हिस्पिड हेयर, बंगाल फ़्लोरिकन, 

हाथी,  गैन्गेटिक डाल्फ़िन, मगरमच्छ, लगभग 400 पक्षी प्रजातियां एंव रेप्टाइल्स (सरीसृप), 

एम्फ़ीबियन, तितिलियों के अतिरिक्त दुधवा के जंगल तमाम अज्ञात व अनदेखी प्रजातियों का घर है। 

वनस्पति- साल, असना, बहेड़ा, जामुन, खैर के अतिरिक्त कई प्रकार के वृक्ष इस वन में मौजूद हैं। 

विभिन्न प्रकार की झाड़ियां, घासें, लतिकायें, औषधीय वनस्पतियां व सुन्दर पुष्पों वाली वनस्पतियों का 

बसेरा है दुधवा नेशनल पार्क।

थारू हट- पर्यटकों के रूकने के लिए दुधवा में आधुनिक शैली में थारू हट उपलब्ध हैं।  रेस्ट हाउस- 

प्राचीन इण्डों-ब्रिटिश शैली की इमारते पर्यटकों को  इस घने जंगल में आवास प्रदान करती है, जहाँ प्रकृति 

दर्शन का रोमांच दोगुना हो जाता हैं। 


मचान- दुधवा के वनों में ब्रिटिश राज से लेकर आजाद भारत में बनवायें गये लकड़ी के मचान कौतूहल व

 रोमांच उत्पन्न करते हैं।

थारू संस्कृति- कभी राजस्थान से पलायन कर दुधवा के जंगलों में रहा यह समुदाय राजस्थानी संस्क्रुति 

की झलक प्रस्तुत करता है, इनके आभूषण, नृत्य, त्योहार व पारंपरिक ज्ञान अदभुत हैं, राणा प्रताप के 

वंशज बताने वाले इस समुदाय का इण्डों-नेपाल बार्डर पर बसने के कारण इनके संबध नेपाली समुदायों से 

हुए, नतीजतन अब इनमें भारत-नेपाल की मिली-जुली संस्कृति, भाषा व शारीरिक सरंचना हैं। 


"प्रदेश का एकमात्र विश्व प्रसिद्ध दुधवा नेशनल पार्क है,  मोहाना व सुहेली नदियों के मध्य स्थित यह वन  

प्राकृतिक रूप से रह-रहे पशु-पक्षियों एवं पेड़-पौधों की जैव-विविधता प्रकृति की अनमोल धरोहर को 

अपने आगोश में समेटे है । दुधवा नेशनल पार्क एवं किशनपुर पशु विहार को 1987-88 में भारत 

सरकार के प्रोजेक्ट टाइगर परियोजना में शामिल करने से इसका महत्व और भी बढ़ गया है । भारत के 

राष्ट्रीय पार्को में चल रहे प्रोजेक्ट टाइगर में दुधवा का नाम दूसरे स्थान पर पहुंच गया है । यहां पल रही 

विश्व की अनूठी गैंडा  पुनर्वास परियोजना के 27 सदस्यीय गैंडा परिवार के स्वछंद घूमते  सदस्य पर्यटकों  

के लिए आकर्षण का केंद्र बिंदु बने रहते हैं । इसीलिए हर साल बड़ी तादाद में सैलानी और वन्य-जीव 

विशेषज्ञ यहां आते हैं  ।


करीब 884 वर्ग किमी दुधवा टाइगर रिजर्व के 


जंगल में किशनपुर पशु विहार 204 वर्ग 


किमी एवं  680 वर्ग, किमी दुधवा नेशनल 


पार्क का क्षेत्रफल शामिल है ।
मौसम- नवंबर से फरवरी तक यहां का 


अधिकतम तापमान 20 से 30 डिग्री सेल्सियस, 


न्यूनतम 4 से 8 डिग्री सेल्सियस रहने से प्रात: 


कोहरा और रातें ठंडी होती हैं । मार्च से मई तक 


तापमान अधिकतम 30 से 35 डिग्री सेल्सियस 


और न्यूनतम 20 से 25 डिग्री सेल्सियस मौसम 


सुहावना रहता है । जून से अक्टूबर में अधिकतम 


तापमान 35 से 40 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम 20 से 25 डिग्री सेल्सियस रहने से भारी वर्षा और 


जलवायु नम रहती है ।


कैसे पहुंचे : दुधवा नेशनल पार्क के समीपस्थ रेलवे स्टेशन दुधवा, पलिया और मैलानी है । यहां आने के 


लिए दिल्ली, मुरादाबाद, बरेली, शाहजहांपुर तक ट्रेन द्वारा और इसके  बाद 107 किमी सड़क यात्रा करनी 


पड़ती है, जबकि लखनऊ से भी पलिया-दुधवा  के लिए ट्रेन मार्ग है । सड़क मार्ग से दिल्ली-मुराबाद-


बरेली-पीलीभत अथवा शाहजहांपुर, खुटार, मैलानी, भीरा, पलिया होकर दुधवा पहुंचा जा सकता है ।


लखीमपुर, शाहजहांपुर, सीतापुर, लखनऊ, बरेली, दिल्ली आदि से पलिया के लिए रोडवेज की बसें एवं 


पलिया से दुधवा के लिए निजी बस सेवा उपलब्ध हैं । लखनऊ, सीतापुर, लखीमपुर, गोला, मैलानी, से 


पलिया होकर दुधवा पहुंचा जा सकता है । 


ठहरने की सुविधा :  दुधवा वन विश्राम भवन का आरक्षण मुख्य वन संरक्षक-वन्य-जीव- लखनऊ से 


होता है, थारूहट दुधवा, वन विश्राम भवन बनकट, किशनपुर, सोनारीपुर, बेलरायां, सलूकापुर का 


आरक्षण स्थानीय मुख्यालय से होगा । सठियाना वन विश्राम भवन से आरक्षण फील्ड डायरेक्टर 


लखीमपुर कार्यालय से कराया जा सकता है । 
दुधवा रेस्टहाउस




दुधवा नेशनल पार्क में फीस एवं किराया


प्रवेश शुल्क प्रति व्यक्ति 3 दिन    50 रू०


विदेशी                                 150 रू०


रोड फीस हल्की गाड़ी             150 रू०


मिनी बस                             300 रू०


कैमरा फीस मूवी एवं वीडियो   2500 रू०


विदेशी                                5000 रू०


फीचर फिल्म प्रतिदिन           2000 रू०


विदेशी                             20,000 रू०


डाक्युमेंट्री फिल्म प्रतिदिन   25,000 रू०


विदेशी                                5000 रू०   


उपरोक्त के लिए सुरक्षा फी स           


फीचर फिल्म                        2500 रू०


विदेशी                                4000 रू०


डाक्युमेंट्री फिल्म                  1500 रू०


विदेशी                                4000 रू०


हाथी की सवारी


चार व्यक्ति प्रति चक्कर 2 घंटा       300 रू०


विदेशी                                        900 रू०


मिनी बस 15 सीटर प्रति किमी      30 रू०


विदेशी                                        90 रू०



दुधवा नेशनल पार्क 15 नवम्बर को पर्यटकों के लिए खोल दिया जाता है, और बारिश की शुरूवात 


में ही 15 जून से पार्क में पर्यटन बंद कर दिया जाता है।


दुधवा नेशनल पार्क के खुलने की तिथि 15 नवंबर ज्यों-ज्यों नजदीक आती जा रही है, त्यो-त्यों पर्यटकों 


के स्वागत व भ्रमण के लिए की जाने वाली तैयारियों को यहां अंतिम रूप देने का कार्य पूरा किया जाता है 


। अन्य प्रमुख महानगरों से दुधवा को यातायात के साधनों की समुचित व्यवस्था, देशी -विदेशी पर्यटको 


को जमावाड़ा दुधवा में लगता है ।


मानसून सत्र शुरू होने पर 15 जून से पर्यटकों के लिए बंद किया गया दुधवा नेशनल पार्क 15 नवंबर से 


पर्यटकों के भ्रमण के लिए खुलता है।  अब आने वाले पर्यटकों के लिए दुधवा पर्यटन स्थल में नए स्वागत 


कक्ष का निर्माण कराया गया है, तथा आटोडोरियम का निर्माण भी लगभग हो गया है । पर्यटकों की 


सुविधा के लिए 15 केवीए का जनरेटर लगाने के साथ ही  पर्यटन सोलर स्ट्रीट लाइटें भी लगा दी गई हैं । 


सठियाना, दक्षिण सोनारीपुर, किशनपुर, बनकटी, बेलरायां आदि गेस्ट हाउसों में सोलर पावर प्लांट 


लगाए गए हैं । इससे पर्यटयकों को बिजली व पानी की किल्लत का सामना नहीं करना पड़ेगा ।


बताया कि दुधवा में गैंडा, बाघ, बारहसिंघा, तेंदुआ, चीतल आदि वन्ययजीव समेत अन्य तमाम 


प्रजातियों के साइबेरियन पक्षियों के झुंड और विलुप्त प्राय बंगाल फ्लोरिकन देखे जा सकते हैं ।


पलिया कस्बे में निर्मित हवाई पट्टी यदि शुरू हो जाए और देश व प्रदेश के महानगरों से 


आवागमन की समुचित व्यवस्था हो जाए तो दुधवा में आने वाले पर्यटकों की संख्या में इजाफा 


हो सकता है ।




पर्यटकों को आटोडोरियम से मिलेगी तमाम जानकारियां-


 सूबे के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क में आने वाले पर्यटकों को जागरूक करने के लिए इस साल 


नवनिर्मित आटोडोरियम शुरू होगा, इसमें विलुप्त हो रही वन्यजीवों से संबंधित तमाम जानकारियां होगी 


तथा वन एवं वन्यजीव का परिचय देकर पर्यटकों को इनके संरक्षण के लिए प्रेरित किया जाएगा । 11 


सदस्यीय हाथी दल पर्यटकों को जंगल की शैर कराएगा ।

ट्री-हट

छह साल से उद्घाटन के इंतजार में है, ट्री 


हाउस-


 ट्री हाउस 


दुधवा टाइगर रिजर्व के तत्कालीन 


उपनिदेशक पीपी सिंह ने पर्यटकों के लिए 


लगभग छ:ह साल पूर्व दुधवा के जंगल में यह 


ट्री हाउस का निर्माण कराया था । यह ट्री हाउस 


विशालकाय साखू पेड़ो के सहारे लगभग पचास 


फुट ऊपर 


बनाया गया है । डबल बेडरूम वाले इस ट्री 


हाउस को सभी आवश्यक सुविधाओं से 


सुसज्जित किया गया है । लगभग चार लाख 


रूपए की लागत से बना हुआ शानदार ट्री हाउस 


पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बिंदु बना हुआ है । जानकारी होने पर पर्यटक इसे देखे बिना चैन नहीं  


पाते हैं. 


दू धवा नेशनल पार्क की आवास सुविधा-

दुधवा वन विश्राम भवन   400 रू०  200 रू०

विदेशियों के लिए-           1200 रू० 600 रू०

थारूहट दुधवा -              150 रू०

विदेशियों के लिए -           450 रू०

विश्राम भवन बनकटी-     100 रू०

विदेशियों के लिए-             300 रू०

विश्रामभवन किशनपुर-      150 रू०

विदेशियों के लिए-            450 रू०

डारमेट्री प्रति व्यक्ति -          50 रू०

विदेशियों के लिए-             150 रू०

छात्रों के लिए-                   30 रू०

विदेशी छात्र-                     90 रू०


प्रकृति दर्शन के लिए दुध

शनिवार, 5 जून 2010

दुधवा में आए विदेशी शोधार्थी बनाएगें प्रोजेक्ट


-देवेन्द्र प्रकाश मिश्र 
अवेक इंटरनेशनल संस्थान द्वारा रूस के टूर लीडर मिस्टर पासा के नेतृत्व में पांच देशों के विद्यार्थी दुधवा टाइगर रिजर्व के भ्रमण पर है। २ जून २००१० को इनका आगमन खीरी के इस सुरम्य वन में हुआ और ये टीम ५ जून २०१० तक यहाँ के वन्य जीवों व जंगलों का अध्ययन करेंगी, इस प्रतिनिधि मंडल ने जंगल भ्रमण के दौरान थारू गांवों में हो रहे प्रकृति के सरंक्षण व संवर्धन के लिए विश्व प्रकृति निधि द्वारा किए जा रहे प्रयासो को देखा, भगवन्त नगर में  विश्व प्रकृति निधि द्वारा बायो गैस, सूर्य उर्जा, और वर्मी कम्पोस्ट खाद बनाने की ट्रेनिंग जैसे कार्यक्रमों का संचालन किया जा रहा है, कई पर्यावरण गोष्ठी आदि के आयोजनों से थारू जनजाति और जंगलों के मध्य समन्वय स्थापित करने के प्रयासों का भी इन विदेशी छात्रों ने ब्योरा लिया।
यह टीम पासा के निर्देशन व हरदोई जिले की संस्था सार्वजनिक शिक्षोन्नयन एंव संस्थान के सहयोग से इन इलाकों में प्रकृति, शिक्षा, व अन्य सामाजिक मसलों का अध्ययन कर रही है,

संयुक्त राष्ट्र संघ के मिलेनियम डेवेलपमेन्ट गोल प्रोजेक्ट 2015 के तत्वाधान में पूरी दुनिया से 320  प्रतिनिधियों द्वारा दुनियाभर से पर्यावरण, शिक्षा, हेल्थ, एड्स, गर्भवती महिलाओं व बच्चों की दशा पर विस्तृत रिपोर्ट पेश की जायेगी, ताकि भविष्य में इन गंभीर मुद्दों पर उचित प्रयास किए जा सके। ये विदेशी छात्र भी इसी प्रोग्राम का हिस्सा है, जो विभिन्न भूभागों से उपरोक्त विषयों पर आंकड़े जुटायेंगे। दुधवा टाइगर रिजर्व के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश व भारत के अन्य भूभागों में ये टीम तकरीबन डेढ़ महीने तक भ्रमण करने के बाद वापस लौटेगी।

टीम मेंबर्स में मलेशिया से कार्की, एनी, फ़िलीपीन्स से रोआना, नीदरलैंड से दान, मैक्सिको सिटी व रूस के प्रतिनिधि हैं।

मंगलवार, 4 मई 2010

दावानल से गड़बड़ाया दुधवा का पारिस्थितिकीय तंत्र


ग्रीष्मकाल शुरू होते ही गावों और प्रदेश के जंगलों में भी आग लगने का दौर शुरू हो जाता है। जंगलों में आग से होने वाली तबाही एवं बर्बादी से जहां वन्य प्राणियों का जीवन संकटमय हो जाता है। जंगलों में आग अकूत वन संपदा को तो स्वाहा कर देती ही है, इस दावानल से वन्य जीवन भी दहल उठता है-नष्ट हो जाता है। हजारों लोग बेघर होकर खुले आसमान के नीचे जीवन गुजारने को विवश हो जाते हैं। हर साल अग्निपीड़ितों को मुआवज़े के नाम पर करोड़ों रूपए तो दिए जाते हैं परंतु भविष्य में आग रोकने या उसके त्वरित नियंत्रण की व्यवस्था करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई देती है। प्रतिवर्ष आग अपना इतिहास दोहराकर नुकसान के आंकड़ों को बढ़ा देती है। राज्य सरकार जंगलों को आग से बचाने के लिए कोई सार्थक कदम नहीं उठा रही है। यूपी के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क के जंगलों में बार-बार लगने वाली आग को रोकने के लिए आधुनिक साधनों और संसाधनों की समुचित भारी कमी है। लगातार आग से दुधवा के जंगल का न सिर्फ पारिस्थितिक तंत्र गड़बड़ा रहा है, बल्कि जैव-विविधता के अस्तित्व पर भी भारी संकट खड़ा हो गया है। दुधवा नेशनल पार्क में दावानल के नियंत्रण की तमाम व्यवस्थाएं फायर सीजन से पूर्व की जाती हैं। अगर आग रोकने का प्रबंध योजनाबद्ध और ईमानदारी से कराया जाए तो आग को विकराल होने से पहले ही उस पर नियंत्रण हो सकता है। निजी स्वार्थों में कराए गए दावानल नियंत्रण के प्रबंध हमेशा फेल होते देंखे गए हैं। दुधवा पार्क प्रशासन ये तैयारियां फरवरी से 15 जून के मध्य में करता है मगर जंगल में लगने वाली आग का रूप जब भी विकराल होता है तब उसके सारे प्रबंध धरे रह जाते हैं। 'उसके बाद शुरू होता है नुकसान की भरपाई और मुवावजे का काला खेल।'


जंगल में कई कारणों से आग लगती है या फिर लगाई जाती है। इसमें समयबद्ध एवं नियंत्रित आग विकास है किंतु अनियंत्रित आग विनाशकारी होती है। दुधवा के जंगल में ग्रासलैंड मैनेजमेंट एवं वन प्रवंधन के लिए नियंत्रित आग लगाई जाती है। इसके अतिरिक्त शरारती तत्वों या ग्रामीणजनों का सुलगती बीड़ी जंगल में छोड़ देना आग का कारण बन जाता है। जबकि वन्य जीवों के शिकारी भी पत्तों से होने वाली आवाज दबाने के लिए जंगल में आग लगा देते हैं। दुधवा नेशनल पार्क के वनक्षेत्र की सीमाएं नेपाल से सटी हैं और इसके चारों तरफ मानव बस्तियां आबाद हैं। इसके चलते जंगल में अनियंत्रित आग लगने की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है।

इसका भी प्रमुख कारण है कि नई घास उगाने के लिए मवेशी पालक ग्रामीण जंगल में आग लगा देते हैं जो अपूर्ण व्यवस्थाओं के कारण अकसर विकाराल रूप धारण करके जंगल की बहुमूल्य वन संपदा को भारी नुकसान पहुंचाती है और वनस्पितियों एवं जमीन पर रेंगने वाले जीव-जंतुओं को जलाकर भस्म कर देती है। विगत के दो वर्षों में कम वर्षा होने के बाद भी बाढ़ की विभीषिका के कहर का असर वनक्षेत्र पर व्यापक रूप से पड़ा है। बाढ़ के पानी के साथ आई मिट्टी-बालू इत्यादि की सिलटिंग से जंगल के अन्दर तालाबों, झीलों, भगहरों की गहराई कम हो गई है। स्थिति यह है कि जिनमें पूरे साल भरा रहने वाला पानी वन्य जीवों-जंतुओ को जीवन प्रदान करता था वह प्राकृतिक जल स्रोत अभी से ही सूखने लगे हैं। जंगल में नमी की मात्रा कम होने से कार्बनिक पदार्थ और अधिक ज्वलनशील हो गए हैं, जिसमें आग की एक चिंगारी सैकड़ों एकड़ वनक्षेत्र का जलाकर राख कर देती है।

सन् 2001 से 2007 तक दुधवा के जंगलों में आग लगने के कारणों का अध्ययन एवं विश्लेषण दुधवा पार्क के एक उपप्रभागीय वनाधिकारी ने किया था। जिसके अनुसार सन् 2001-02 में औसत वर्षा होने के कारण जंगल में आग लगने की घटनाएं अधिक रहीं किंतु नुकसान कम हुआ। सन् 2003-04 में अधिक वर्षा होने के कारण आग से जलने के लिए आवश्यक कार्बनिक पदार्थों में नमी की अधिकता रही जिससे आग लगने की 36 घटनाओं में 16.76 हेक्टेयर वनक्षेत्र प्रभावित हुआ जबकि सन् 2005 से 2007 के मध्य कम वर्षा के कारण कार्बनिक पदार्थों की नमी कम रही और आग लगने की 36 घटनाओं में दावानल का क्षेत्रफल एक हेक्टेयर अधिक रहा था। बल्कि सन् 2008-09 में कम वर्षा के कारण दावानल की घटनाओं में प्रभावित क्षेत्रफल बढ़ने से जंगल को भारी क्षति पहुंची। इस साल भी जंगल में आग लगने का सिलसिला जारी है। इससे हरे-भरे जंगल की जमीन पर दूर तक राख ही राख दिखाई देती है। लगातार आग लगने से जंगल में कई प्रजातियों के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लग गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अनियंत्रित आग बड़ी मात्रा में कार्बन डाईआक्साइड और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करके ग्लोबल वार्मिंग बढ़ा रही है और इससे जंगल की जैव-विविधता के अस्तित्व पर भी खतरा खड़ा हो जाता है।

आठ सौ छियासी वर्ग किलोमीटर में फैले दुधवा के जंगल में आग नियंत्रण के लिए फायर लाईन बनाई जाती है और आग लगने का तुरंत पता लग जाए इसके लिए तमाम संवेदनशील स्थानों पर वाच टावर स्थापित किए गए हैं। किंतु आग लगने पर उसके नियंत्रण के लिए तुरंत मौके पर पहुंचने के लिए रेंज कार्यालय या फारेस्ट चौकी पर वाहन नहीं है ऐसी स्थिति में कर्मचारी जब तक साइकिलों से या दौड़कर वहां पहुंचते हैं तब तक आग जंगल को राख में बदल चुकी होती है। जंगल के समीपवर्ती ग्रामीण भी अब आग को बुझाने में वन कर्मचारियों को इसलिए सहयोग नहीं देते हैं क्योंकि 1977 में क्षेत्र के जंगल को दुधवा नेशनल पार्क बना दिया गया। इसके बाद पार्क कानूनों के अंतर्गत आसपास के सैकड़ों गावों को पूर्व में वन उपज आदि की सभी सुविधाओं पर प्रतिवंध लगा दिया गया है। जबकि इससे पहले आग लगते ही गांवों के सभी लोग एकजुट होकर उसे बुझाने के लिए दौड़ पड़ते थे।

इस बेगार के बदले में उनको जंगल से घर बनाने के लिए खागर, घास-फूस, नरकुल, रंगोई, बांस, बल्ली आदि के साथ खाना पकाने के लिए गिरी पड़ी अनुपयोगी सूखी जलौनी लकड़ी एवं अन्य कई प्रकार की वन उपज का लाभ मिल जाया करता था। लेकिन बदलते समय के साथ अधिकारियों का अपने अधीनस्थों के प्रति व्यवहार में बदलाव आया तो कर्मचारियो में भी परिवर्तन दिखाई देता है। स्थिति यह हो गई है कि कर्मचारी वन उपज की सुविधा देने के नाम पर ग्रामीणों का आर्थिक शोषण करने के साथ ही उनका उत्पीड़न करने से भी परहेज नहीं करते हैं। अब ग्रामीणों का जंगल के प्रति पूर्व में रहने वाला भावात्मक लगाव खत्म हो गया है। उधर आग लगने की सूचना पर पार्क अधिकारियों का मौके पर न पहुंचना और अधीनस्थों को निर्देश देकर कर्तव्य से इतिश्री कर लेना यह उनकी कार्यप्रणाली बन गई है। इससे हतोत्साहित कर्मचारियों में खासा असंतोष है और वे भी अब आग को बुझाने में कोई खास रूचि नहीं लेते हैं। जिससे जंगल को आग से बचाने का कार्य और भी दुष्कर होता जा रहा है। परिणाम दुधवा के जंगलों में लग रही अनियंत्रित आग वन्य जीवों और वन संपदा को भारी क्षति पहुंचा रही है। पार्क के उच्च अधिकारी यह स्वीकार करते हैं कि आग लगने की बढ़ रही घटनाओं का एक प्रमुख कारण है कि स्थानीय लोगों के बीच संवाद का न होना है। वह यह भी मानते हैं कि वित्तीय संकट, कर्मचारियों की कमी, निगरानी तंत्र में आधुनिक तकनीकियों का अभाव, अग्नि नियंत्रण की पुरानी पद्धति आदि ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से जंगल की आग को रोकने की दिशा में प्रभावशाली कदम नहीं उठाए जा पा रहे हैं।

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

Rajyapal Sri B.L.JOSHE Dudhwa aaye



यू. पी.के  राज्यपाल 
श्री बी. एल. जोशी 
सपरिवार 
दुधवा नेशनल पार्क 
में आये. 






























दुधवा में अब गैंडों और मानव के बीच संघर्ष शुरू


एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडे को 25 साल पहले इस तराई क्षेत्र की उनकी जन्मभूमि पर बसाया गया था। किसी वन्यजीव को पुनर्वासित करने का यह गौरवशाली इतिहास विश्व में केवल दुधवा नेशनल पार्क ने बनाया है। भारत सरकार ने पहले आसाम के पावितारा वन्यजीव विहार से दो नर और तीन मादा गैंडे लाकर दुधवा में गैंडा पुनर्वास परियोजना शुरू कराई थी। इसमें से दो मादा गैडों की मौत 'शिफ्टिंग स्टेस' के कारण हो गई थी तब परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए सन् 1985 में नेपाल के चितवन नेशनल पार्क से सोलह हाथियों के बदले चार मादा गैंडों को लाया गया। विश्व की यह एकमात्र ऐसी परियोजना है जिसमें 106 साल बाद गैडों को उनके पूर्वजों की धरती पर पुनर्वासित कराया गया है। गंगा के तराई क्षेत्र में सन् 1900 में गैंडे का आखिरी शिकार इतिहास में दर्ज है, इसके बाद गंगा के मैदानों से एक सींग वाला भारतीय गैंडा विलुप्त हो गया था। 
दुधवा नेशनल पार्क में चल रही विश्व की अद्वितीय गैंडा पुनर्वास परियोजना संबंधित अफसरों की लापरवाही कुप्रबंधन एवं उपेक्षा का शिकार हो गयी है। उर्जाबाड़ से संरक्षित वनक्षेत्र में रहने वाले तीस सदस्यीय गैंडा परिवार के पांच सदस्य करंटयुक्त फैंसिंग तोड़कर बाहर घूम रहे हैं। पार्क प्रशासन के अफसर गैंडों की सुरक्षा की कोई पुख्ता दीर्घकालिक व्यवस्था नहीं कर रहे हैं। इससे मानव के आक्रोश से उनका जीवन भी संकट में है। इसके अतिरिक्त एक ही नर गैंडा की संतानों का परिवार होने से उनके ऊपर अनुवांशिक प्रदूषण यानी अन्तःप्रजनन के खतरे की तलवार भी लटक रही है। दुधवा नेशनल पार्क की दक्षिण सोनारीपुर रेंज के 27 वर्ग किलोमीटर के जंगल को उर्जाबाड़ से घेरकर अप्रैल 1984 में गैंडा पुनर्वास परियोजना शुरू की गई थी। तमाम उतार-चढ़ाव एवं साधनों और संसाधनों की कमी के बाद भी यह परियोजना काफी हद तक सफल रही है। स्वच्छंद विचरण करने वाले तीस सदस्यीय गैंडा परिवार का जीवन अब हमेशा खतरों से घिरा रहता है, क्योंकि इनकी रखवाली और सुरक्षा में तैनात पार्क कर्मियों को निगरानी करना तो सिखाया जाता है किंतु बाहर भागे गैंडा को पकड़कर वापस लाने का तरीका ये नहीं जानते हैं।
इन अव्यवस्थाओं के कारण इस एक दशक से तीन नर एवं दो मादा गैंडा उर्जाबाड़ के बाहर दुधवा नेशनल पार्क क्षेत्र की गेरुई नदी के किनारे और गुलरा क्षेत्र के खुले जंगल समेत निकटस्थ खेतों में विचरण करके किसानों की फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं। दुधवा रेंज कार्यालय से करीब चार किलोमीटर दूर चौखंभा वनक्षेत्र में गौरीफंटा रोड पर पहली बार एक गैंडा विचरण करते देखा गया। अब यह गैंडा सोठियाना रेंज के जंगल में असुरक्षित घूम रहा है। यह वनक्षेत्र दक्षिण सोनारीपुर के उर्जाबाड़ वाले इलाके से 15-20 किमी दूर है। गैंडा वहां तक कैसे पहुंचा? यह बात अपने आप में वन विभाग की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह है। इस गैंडा की घर वापसी के कोई प्रयास पार्क प्रशासन ने नहीं किए हैं। 
दुधवा के जंगल के चारों तरफ किनारे पर तमाम गांव आबाद हैं और वन क्षेत्र से सटे खेतों में फैंस तोड़कर बाहर विचरण करने वाले गैंडे लगातार फसलों को भारी क्षति पहुंचा रहे हैं। बीते दशक में मलिनियां गांव के पास गैंडा एक किसान को मार चुका है और अलग-अलग गैंडों के हमलों में पौन दर्जन लोग घायल हो चुके हैं। वन पशुओं से की जाने वाली फसल क्षति और जनहानि की मुआवजा सूची में यूपी सरकार ने 25 साल व्यतीत हो जाने के बाद भी गैंडा को शामिल नहीं किया है। इससे वन विभाग किसान को गैंडे से फसल क्षति का मुआवजा नहीं देता है। फसलों का नुकसान और जनहानि होने के बाद भी उसकी भरपाई ना मिलने से आक्रोशित ग्रामीण खुले जंगल और खेतों के आसपास घूमने वाले गैंडों को कभी भी जानी नुकसान पहुंचा सकते हैं। दुधवा पार्क प्रशासन ने गैडों की मानीटरिंग और उनकी सुरक्षा के लिए अलग से चार हाथी और कर्मचारियों का भारी अमला लगाया गया है लेकिन रेंज और वन चौकियों पर मूलभूत सुविधाएं उपलव्ध न होने से कर्मचारी अपनी इस तैनाती को कालापानी की सजा मानते हैं। विषम परिस्थितियों में वे ड्यूटी को पूरी क्षमता के बजाय बेगार के रूप में करते हैं जिससे गैंडों के जीवन पर भारतीय ही नहीं वरन नेपाली शिकारियों की भी कुदृष्टि का हर वक्त खतरा मंडराता रहा है।
दुधवा में अपने पूर्वजों की धरती पर पुनर्वासित बांके नाम के पितामह गैंडा से हुई वंश वृद्धि से यहां तीस सदस्यीय गैंडा परिवार स्वच्छंद विचरण कर रहा है। एक ही पिता से हुई संतानें चार पीढ़ी तक पहुंच गई हैं। जिनके ऊपर विशेषज्ञों के अनुसार अनुवांशिक प्रदूषण यानी अन्तःप्रजनन-इनब्रीडिंग- का खतरा मंडरा रहा है। उनका मानना है कि अन्तःप्रजनन की विकट समस्या से निपटने के लिए यहां बाहर से गैंडे का लाया जाना जरूरी है। गौरतलब है कि दुधवा प्रोजेक्ट टाइगर में शामिल किशनपुर वनपशु बिहार और नार्थ-खीरी वन प्रभाग की संपूर्णानगर वनरेंज के जंगल और उससे सटे खेतों में पिछले करीब एक साल से मादा गैंडा अपने एक बच्चे के साथ घूम रही है। वन विभाग एवं पार्क प्रशासन इसकी सुरक्षा एवं निगरानी करने के बजाय यह कहकर अपना पल्लू झाड़ रहा है कि यह गैंडा मादा नेपाल की शुक्लाफांटा सेंक्चुरी की है, जो पीलीभीत के लग्गा-भग्गा जंगल से होकर आई है और घूम-फिर कर वापस चली जाएगी। 
पूर्व में जब यह परियोजना शुरू की गई थी तब सोलह हाथियों के बदले चार मादा गैंडे नेपाल से लाई गई थी, अब एक नेपाली मादा गैंडा अपने बच्चे के साथ घूम रही है तो फ्री में मिल रही इस मादा गैंडा को यहां के गैंडा परिवार में क्यों नहीं शामिल कराया जा रहा है? वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि प्रयास करके पार्क प्रशासन अगर इस मादा गैंडा को दुधवा के गैंडा परिवार में शामिल कर ले तो यहां के गैंडों के ऊपर मंडरा रहा इनब्रीडिंग यानी अंतःप्रजनन का खतरा आंशिक रूप से काफी हद तक टल सकता है। लेकिन पार्क के अफसर इस दिशा में कोई भी प्रयास करते नहीं दिख रहे हैं। इससे लगता है कि पार्क प्रशासन गैंडा पुनर्वास परियोजना के प्रति कतई गंभीर नहीं है। 
गैंडा पुनर्वास परियोजना के योजनाकारों ने तय किया था कि यहां की समष्टि में तीस गैंडा को लाकर बसाया जाएगा। उसके बाद फैंस हटाकर उनको खुले जंगल में छोड़ दिया जाएगा। उनका यह सपना तो पूरा नहीं हुआ। गैंडों की बढ़ती संख्या को देखकर समष्टि के वृहद फैलाव, आवागमन की सुविधा, अंतःप्रजनन रोकने एवं संक्रामक संहारक तत्वों के विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के उद्देश्य से दक्षिण सोनारीपुर में इस समष्टि के निकट नई फैंस बनाने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया था। वहां से स्वीकृति मिलने के बाद पांच साल पहले शुरू किया गया कार्य आज भी अधूरा पड़ा है और बजट आने का इंतजार कर रहा है। 
जर्जर हो चुकी 25 साल पुरानी उर्जाबाड अनुपयोगी हो गई है, लकड़ीचोर और शिकारी फैंस के तारों को काट देते हैं इससे भी गैंडो को बाहर निकलने में आसानी रहती है। वैसे भी गैंडों की बढ़ रही संख्या के अनुपात में अब उनके रहने वाले जंगल का भी क्षेत्रफल कम हो गया है। इसका क्षेत्रफल समय रहते बढ़ाया जाना आवश्यक हो गया है साथ ही गैंडों की मानीटरिंग के लिए अत्याधुनिक साधन और सुरक्षा के लिए संसाधन उपलब्ध कराने की बात भी पार्क अधिकारी कहते हैं। यहां की समस्याओं का समाधान करने में न केंद्र सरकार गंभीर दिखाई देती है और न ही प्रदेश की सरकार कोई दिलचस्पी ले रही है। इससे व्याप्त तमाम अव्यवस्थाओं के कारण क्षेत्र में गैंडा और मानव के मध्य एक नया संघर्ष जरूर शुरू हो गया है। इसके बाद भी दुधवा पार्क प्रशासन के संरक्षित क्षेत्र के बाहर घूम रहे गैंडों की सुरक्षा एवं उनको फैंस के भीतर लाने के कतई कोई प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। इनके साथ कभी भी कोई अनहोनी हो सकती है, इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है।
 

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

प्रकृति की पीड़ा कौन सुनेगा

             जल, जंगल और जमीन, इन तीन तत्वों के बिना प्रकृति अधूरी है। विश्व में सबसे समृद्ध देश वही हुए हैं, जहाँ यह तीनों तत्व प्रचुर मात्रा में हों। हमारा देश जंगल, वन्य जीवों के लिए प्रसिद्ध है। सम्पूर्ण विश्व में बड़े ही विचित्र तथा आकर्षक वन्य जीव पाए जाते हैं। हमारे देश में भी वन्य जीवों की विभिन्न और विचित्र प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इन सभी वन्य जीवों के विषय में ज्ञान प्राप्त करना केवल कौतूहल की दृष्टि से ही आवश्यक नहीं है, वरन यह काफी मनोरंजक भी है। भूमंडल पर सृष्टि की रचना कैसे हुई, सृष्टि का विकास कैसे हुआ और उस रचना में मनुष्य का क्या स्थान है? प्राचीन युग के अनेक भीमकाय जीवों का लोप क्यों हो गया और उस दृष्टि से क्या अनेक वर्तमान वन्य जीवों के लोप होने की कोई आशंका है?मानव समाज और वन्य जीवों का पारस्परिक संबंध क्या है? यदि वन्य जीव भूमंडल पर न रहें, तो पर्यावरण पर तथा मनुष्य के आर्थिक विकास पर क्या प्रभाव पड़ेगा? तेजी से बढ़ती हुई आबादी की प्रतिक्रिया वन्य जीवों पर क्या हो सकती है आदि प्रश्न गहन चिंतन और अध्ययन के हैं।इसलिए भारत के वन व वन्य जीवों के बारे में थोड़ी जानकारी आवश्यक है, ताकि लोग भलीभाँति समझ सकें कि वन्य जीवों का महत्व क्या है और वे पर्यावरण चक्र में किस प्रकार मनुष्य का साथ देते हैं। साथ ही यह जानना भी आवश्यक है कि सृष्टि-रचना चक्र में पर्यावरण का क्या महत्व है। पहले पेड़ हुए या गतिशील प्राणी? फिर सृष्टि-रचना की क्रिया में हर प्राणी, वनस्पति का एक निर्धारित स्थान रहा है। इस सृष्टि-रचना में मनुष्य का आविर्भाव कब हुआ? प्रकृति के इस चक्र में विभिन्न जीव-जंतुओं में क्या कोई समानता है? वैज्ञानिक दृष्टि से उसको कैसे समझा जाए, जिससे हमें पता चले क‍ि आखिर किसी प्रजाति के लुप्त हो जाने से मानव समाज और पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि आखिर हम भी एक प्रजाति ही हैं। आज हमें सबसे ज्यादा जरूरत है पर्यावरण संकट के मुद्दे पर आम जनता को जागरूक करने की। पर्यावरण, वन्य जीव-जंतुओं और मानव समाज का सीधा रिश्ता आम आदमी की समझ के मुताबिक समझने के लिए इसे वैज्ञानिक दृष्टि से देखना भी आवश्यक है। जीव-जंतुओं व जंगल का विषय है तो बड़ा 'क्लिष्ट', पर है उतना ही रोचक। इसे समझने के लिए सबसे पहले खुद पर पड़ रहे पर्यावरण के प्रभाव को जानना महत्वपूर्ण है।दिनोदिन गम्भीर रूप लेती इस समस्या से निपटने के लिए आज आवश्यकता है एक ऐसे अभियान की, जिसमें हम सब स्वप्रेरणा से सक्रिय भागीदारी निभाएँ। इसमें हर कोई नेतृत्व करेगा, क्योंकि जिस पर्यावरण के लिए यह अभियान है उस पर सबका समान अधिकार है।तो आइए हम सब मिलकर इस अभियान में अपने आप को जोड़ें। इसके लिए आपको कहीं जाने या किसी रैली में भाग लेने की जरूरत नहीं, केवल अपने आस-पड़ोस के पर्यावरण का अपने घर जैसा ख्याल रखें जैसे कि - * घर के आसपास पौधारोपण करें। इससे आप गरमी, भूक्षरण, धूल इत्याद‍ि से बचाव तो कर ही सकते हैं, पक्षियों को बसेरा भी दे सकते हैं, फूल वाले पौधों से आप अनेक कीट-पतंगों को आश्रय व भोजन दे सकते हैं।
            शहरी पर्यावरण में रहने वाले पशु-पक्षियों जैसे गोरैया, कबूतर, कौवे, मोर, बंदर, गाय, कुत्ते आदि के प्रति सहानुभूति रखें व आवश्यकता पड़ने पर दाना-पानी या चारा उपलब्ध कराएँ। मगर यह ध्यान रहे क‍ि ऐसा उनसे सम्पर्क में आए बिना करना अच्छा रहेगा, क्योंकि अगर उन्हें मनुष्य की संगत की आदत पड गई तो आगे चलकर उनके लिए घातक हो सकती है।पर्यावरण पर बड़ी-बड़ी बातें करने से पहले हमें कुछ आदतें अपनाना होंगी व उनका पालन करना होगा, क्योंकि स्थितियाँ बदलने की सबसे अच्छी शुरुआत स्वयं से होती है।