Wildlife Photography, a group on Flickr.
स्रष्टि कंजर्वेशन एंड वेलफेयर सोसाइटी [पंजीकृत] वन एवं वन्यजीवों की सहायता में समर्पित Srshti Conservation and Welfare Society [Register] Dedicated to help and assistance of forest and wildlife
शनिवार, 3 सितंबर 2011
गुरुवार, 18 अगस्त 2011
शनिवार, 30 जुलाई 2011
सोमवार, 2 मई 2011
सुरमा में मनाया गया जश्ने आजादी दिवस
दुधवा/सूरमा-खीरी। आदिवासी जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी अधिनियम यानी वनाधिकार कानून का लाभ लेने वाले पलिया तहसील के ग्राम सूरमा तथा गोलबोझी देश के ऐसे पहले ग्राम हो गए हैं जिनको नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व क्षेत्र के जंगल में रहने के बाद भी इस कानून के तहत घर एवं खेती वाली जमीन का मालिकाना हक मिल गया है।
संघर्ष की चौथाई शताब्दी तक अधिकार की लड़ाई लड़ने के बाद मिली विजय पर सूरमा में जश्ने आजादी धूमधाम से मजदूर दिवस के अवसर पर मनाया गया। जिसमें भारी संख्या में लोगों ने गाजा-बाजा के साथ नाच-गाकर जमकर आजादी का जश्न मनाया।
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| सुरमा में मनाया गया विजय दिवस |
केन्द्र सरकार के बनाए गए आदिवासी जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी अधिनियम के तहत पलिया तहसील के आदिवासी जनजाति थारू क्षेत्र के ग्राम सूरमा एवं गोलबोझी के निवासियों को घर एवं कृषि जमीन का मालिकाना हक मिल गया है। विगत आठ मार्च को गांव पहुंचे डीएम समीर वर्मा ने वर्षो से वन विभाग की गुलामी में जीवन गुजारने वाले थारू परिवारों को अधिकार पत्र सौंपकर एक नए इतिहास की शुरूआत कर की।
इससे पूर्व सूरमा और गोलबोझी के थारू परिवार वन विभाग के रहमोकरम पर जीवन गुजारने के साथ ही उनके उत्पीड़न एवं शोषण का शिकार बनकर आजाद भारत में गुलामों जैसा जीवन गुजारने को विवश थे। गांवों में न सड़क, बिजली और न स्कूल बन सके यहां तक थारूजन पक्का मकान भी नहीं बना सकते थे।
वनाधिकार कानून के तहत मालिकाना हक मिल जाने के बाद अब गांवों में विकास को गति मिलेगी। दुधवा नेशनल पार्क के जंगल के बीचोंबीच रहने वाले सूरमा के निवासियों ने वन विभाग से हक पाने के लिए चौथाई शताब्दी यानी करीब 25 साल तक कोर्ट कचेहरी का संघर्ष किया इस लड़ाई को विजय मिली वनाधिकार कानून से। इसमें राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच के अशोक चौधरी, रोमा एवं
रजनीश आदि के साथ ही घटक संगठन आदिवासी थारू महिला किसान मंच एवं राज्य स्तरीय वनाधिकार समिति के सदस्य रामचंद्र राणा आदि का सक्रिय सहयोग रहा। परिणाम स्वरूप सूरमा देश का ऐसा पहला ग्राम बन गया है जिसे नेशनल पार्क एवं टाइगर रिजर्व के बीच में होते हुए भी वनाधिकार कानून का लाभ मिला है। वन विभाग की गुलामी से मिली आजादी का जश्न ग्राम सूरमा में एक मई को मजदूर दिवस पर धूमधाम से मनाया गया। मजदूर दिवस के अवसर पर ग्राम सूरमा में मनाए गए विजय दिवस पर हुई सभा में वक्ताओं ने कहा कि
प्रदेश सरकार वनाधिकार कानून को लागू कराने के लिए गंभीर है परन्तु प्रशासन एवं वन विभाग के अधिकारी इसमें अडं़गा डाल रहे हैं। थारू क्षेत्र के प्रमुख कस्बा गौरीफंटा एवं चंदनचौकी आदि गांवों में दी गई नोटिसें गैर कानूनी है और संसद का अपमान है।
जनसभा को संबोधित करते हुये राष्ट्रीय वनजन श्रमजीवी मंच के अध्यक्ष अशोक चौधरी ने कहा कि उप्र ही नहीं वरन् महाराष्ट्र में भी आदिवासियों को वनाधिकार का लाभ दिया जा रहा है यूपी की सरकार बधाई की पात्र है वह वनाधिकार को लागू करने के लिए प्रयासरत है परन्तु प्रशासन एवं वन विभाग इसमें अडं़गा डाल रहा है वनाधिकार कानून को पूरी तरह से लागू करने के लिए संघर्ष जारी रहेगा। सोनभद्र की शांता भट्टाचार्य, देहरादून के मन्नी लाल, रोमा, प्रदुमन आदि ने विजय दिवस क्यों मनाया जा रहा है इस पर विस्तार से प्रकाश डाला। संचालन करते हुए मंच वरिष्ठ कार्यकर्ता के रजनीश ने कहा कि सूरमा को मिला वनाधिकार ऐतिहासिक है जो एक नजीर बन गया है इससे नेशनल पार्को एवं टाइगर रिजर्व क्षेत्रों में रहने वाले हजारों गांवों के आजाद होने का नया रास्ता मिल गया है। उन्होंने कहा कि
गौरीफंटा एवं चंदनचौकी समेत अयं गांवों को दुधवा पार्क ने नोटिसें जारी की है जो गैर कानूनी है और संसद का अपमान है। इन गांवों के संबंध में तय करने का अधिकार केवल ग्राम स्तरीय वन समिति को है।
उन्होंने कहा कि प्रशासन की मनमानी जारी रही तो आंदोलन चलाया जाएगा। सभा की अध्यक्षता ग्राम की थारू महिला झुलसी देवी ने की। राज्यस्तरीय वनाधिकार समिति के सदस्य रामचंद्र राणा ने सभी के प्रति आभार जताया। ग्राम में शाम 5 बजे मजदूर दिवस के अवसर पर जश्न-ए-आजादी की विजय पताका फहराई गई। इस अवसर पर थारू क्षेत्र के सभी गांवों के साथ सोनभद्र, मिर्जापुर, पीलीभीत, सहारनपुर, दिल्ली, लखनऊ, मोहम्मदी आदि तमाम गांवों के हजारों लोग उपस्थित रहे।
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| वनाधिकार कानून से वच्चों के भविघ्य में छाएगा उजाला |
गुरुवार, 21 अप्रैल 2011
दुधवा के लिए सुहेली बनी अभिशाप
दुधवा नेशनल पार्क मध्य तथा किनारे प्रवाहित होने वाली सुहेली नदी कभी अपने समीपवर्ती
वन्यजीवों को पानी देकर उनकी प्राणदायिनी होती थी। लेकिन सिलटिंग और प्राकृतिक परिवर्तन के चलते अब उनके विनाश का कारण बनती जा रही है। इसके अतिरिक्त नदी से सटा ग्रामीमांचल भी इसमें बार-बार आने वाली बाढ़ की त्रासदी झेलकर बर्बादी की कगार पर पहुंच गया है।
उल्लेखनीय है कि नेपाल से निकली सुहेली नदी वर्षा में पानी के साथ मिट्टी- बालू साथ लाती है। इसका जमाव (सिलटिंग) होने के कारण नदी के गहराई कम हो गई इससे आसपास के निचले भूभागों में भी सिलटिंग होने से वे उंचे हो गए है। इसके कारण कभी समीपवर्ती नकउहा नाला का पानी निर्वाध रूप से नहीं निकल पा रहा है। परिणाम स्वरूप नदी ने नया चैनल पीपी नाला बना दिया है, साथ ही प्रेम पुलिया नाला से जो पानी सुहेली में जाता था उसकी भी वापसी होने लगी
है। इस तरह नकउहा पुल से सुहेली पुल तक पीडब्लूडी रोड के दोनों तरफ से सुहेली नदी का पानी नकउहा नाला में तेज गति से आ रहा है। इसके कारण पीपी नाला द्वारा किए जाने वाले कटान की चपेट में जहां जंगल आ रहा है वहीं दुधवा रोड के किनारों का कटान भी हो रहा है इससे कई स्थानों पर पीपी नाला के कटान का खतरा सड़क पर बढ़ता ही जा रहा है। लेकिन पीडब्लूडी द्वारा कटान की रोकथाम के प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। कटान का दायरा बढ़ता गया तो निकट भविष्य में दुधवा रोड का नामोनिशान खत्म हो जाएगा तब नेपाल सहित आदिवासी जाति थारू क्षेत्र के 45 गांवों समेत दुधवा का सम्पर्क कट सकता है। गौरतलब यह भी है कि सुहेली नदी में हुए इस प्राकृतिक परिवर्तन का दुष्प्रभाव समीपवर्ती ग्रामीणांचल पर भी पड़ने लगता है। थोड़ी वर्षा होते ही उफनाई सुहेली नदी का पानी आसपास के गांवों एवं खेतों में भर जाता है जिसमें सर्वाधिक नुकसान फसलों को को होता है। तथा ग्रामीण भी बार-बार आने वाली बाढ़ की त्रासदी झेलने को विवश हो जाते हैं।
सुहेली नदी अब वन्यजीवों की दुश्मन बन गई है। इससे होने वाली सिलटिंग से सैकड़ों एकड़ हरा भरा जंगल सूख गया है तथा निचले भागों के चारागाह सिमट गए है। इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव बारहसिंघों के जीवन चक्र पर पड़ने लगा है जबकि अन्य स्थानों की तलाश में गांवों की ओर आते हैं जहां उनका अवैध शिकार करने से ग्रामीण परहेज नहीं करते है। इससे वन्यजीवों की संख्या में लगातार गिरावट आने लगी है। यद्यापि शासन प्रशासन द्वारा सुहेली नदी की सफाई-खुदाई पर करोड़ों रूपया खर्च किया जा चुका है जो ठेकेदारों और अफसरों की बंदरबाट की भेंट चढ़ गया। जिससे नतीजा शून्य ही निकला है। परिणाम स्वरूप सुहेली नदी अब समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्र जंगल एवं वन्यजीवों के विनाश का कारण बनने लगी है। बावजूद इसके पार्क प्रशासन के जिम्मेदार अफसर मूक-बघिर बने सुहेली नदी क बिनाश देख रहें हैं।
सुहेली नदी अब वन्यजीवों की दुश्मन बन गई है। इससे होने वाली सिलटिंग से सैकड़ों एकड़ हरा भरा जंगल सूख गया है तथा निचले भागों के चारागाह सिमट गए है। इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव बारहसिंघों के जीवन चक्र पर पड़ने लगा है जबकि अन्य स्थानों की तलाश में गांवों की ओर आते हैं जहां उनका अवैध शिकार करने से ग्रामीण परहेज नहीं करते है। इससे वन्यजीवों की संख्या में लगातार गिरावट आने लगी है। यद्यापि शासन प्रशासन द्वारा सुहेली नदी की सफाई-खुदाई पर करोड़ों रूपया खर्च किया जा चुका है जो ठेकेदारों और अफसरों की बंदरबाट की भेंट चढ़ गया। जिससे नतीजा शून्य ही निकला है। परिणाम स्वरूप सुहेली नदी अब समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्र जंगल एवं वन्यजीवों के विनाश का कारण बनने लगी है। बावजूद इसके पार्क प्रशासन के जिम्मेदार अफसर मूक-बघिर बने सुहेली नदी क बिनाश देख रहें हैं।
| सुहेली नदी के दुष्प्रभाव से सूखने लगा है हरा-भरा जंगल |
सोमवार, 18 अप्रैल 2011
वनाधिकार क़ानून आदिवासी का बना हथियार
सूरमा हिन्दुस्तान का पहला ग्राम वन गया है जिसे नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व क्षेत्र के बीच में आबाद होने के बावजूद वनाधिकार कानून का लाभ दिया गया है
दुधवा नेशनल पार्क के मध्य आबाद ग्राम सूरमा में आयोजित किए गए शिविर में जिलाधिकारी समीर वर्मा ने केन्द सरकार के ऐतिहासिक अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 एवं नियम 2007 के तहत 289 थारू परिवारों को उनके घर, खेत और खलिहान के मालिकाना हक का प्रमाण पत्र दिया। श्री वर्मा ने कहा कि प्रयास करके एक साल के भीतर वनाधिकार कानून को लागू कराया गया है। श्री वर्मा ने सभी से वन एवं वन्यजीव संरक्षण व सुरक्षा में पूरा सहयोग दिए जाने की अपील की। उन्होंने वताया कि सूरमा ग्राम अम्वेडकर ग्राम विकास योजना में चयनित है शीघ्र ही विकास के कार्य शुरू कराए जाएगें। डीएम समीर वर्मा ने ग्राम सूरमा में 289 थारू परिवारों को 625,477 हेक्टैयर वन भूमि के मालिकाना हक के अधिकार पत्र दिए। इसमें आवास के लिए 32,637 हेक्टैयर एवं कुषि हेतु 592,84 हेक्टैयर जमीन के अधिकार पत्र अिए गए हैं। डीएम समीर वर्मा ने वताया कि दिए गए अधिकार पत्रों के अनुसार जमीन को राजस्व अभिलेखों में दर्ज कर दिया गया है। 23 साल की लम्वी लड़ाई लड़ने के बाद मिली सफलता के वाद सूरमावासियों में खुशी की लहर दौड़ गई है। गोलवोझी में वितरित किए कुल 58 अधिकार पत्र के तहत 47,842 हेक्टैयर जमीन परउनको मालिकाना हक दिया गया है। इसमें आवास के लिए 3,588 हेक्टेयर तथा कृषिकी 40,245 हेक्टेयर वन भूमि पर मालिकाना हक दिया गया है। डीएम समीर वर्मा ने कहा कि सामुदायिक अधिकारों के लिए शीघ्र ही दावा फार्म भरवाए जाएगें। उन्होंने थारूजनों से वन एवं वंयजीवों की सुरक्षा एवं संरक्षण के कार्यो में सक्रिय सहयोग दिए जाने की अपील की। अधिकार पत्र मिल जाने के बाद घने जंगल के बीच बेवशी व जीवन गुजारने वाले थारू परिवारों के लिए नए युग की शुरूआत का सूरज उदय हुआ है।
आदिवासी जनजाति थारूक्षेत्र में आबाद ग्राम सूरमा देश का पहला ग्राम बन गया जो नेशनल पार्क एवं टाइगर रिजर्व क्षेत्र में बसे होने के बाद भी उसे बनाधिकार कानून का लाभ मिला है। हालांकि थारूओं को यह सफलता एक लम्बी लड़ाई लड़ने के बाद मिली है। वर्षों से भारत-नेपाल सीमावर्ती जंगल के बीच आवाद थारू ग्राम सूरमा को 1978 में जब थारू क्षेत्र के 37 ग्रामों में से 35 ग्राम राजस्व में शामिल कर लिए गए तव उसे यह कहकर राजस्व ग्राम का दर्जा नहीं दिया गया कि यह दुधवा नेशनल पार्क की सीमा के भीतर है। इसी श्रेणी में गोलबोझी को भी शामिल कर लिया गया। सन् 1980 में सूरमा गाम के लोग अपना हक पाने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। 23 साल तक चली कानूनी दावपेंचों की लड़ाई में हाईकोर्ट ने सन् 2003 में सूरमावासियों के खिलाफ अपना फैसला सुनाया। इस पर दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन ने सूरमा को उजाड़ने के लिए तमाम असफल प्रयास किए। इस बीच सन् 2008में केन्द सरकार ने ऐतिहासिक अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 एवं नियम 2007 लागू कर दिया। इस ऐतिहासिक वनाधिकार कानून को लागू करने में दुधवा पार्क प्रशासन लगातार अड़गे डालता रहा। सूरमावासियों का उनका हक दिलाने के लिए राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच व उसके स्थानीय घटक संगठन थारू आदिवासी महिला किसान मंच ने सन् 2002में सघर्ष की राह पकड़ी और वनाधिकार पाने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया। इसमें सरकार द्वारा गठित वनाधिकार राज्यस्तरीय निगरानी समिति के सदस्य रामचन्द्र राना ने थारू क्षेत्र की समस्याओं एव वन विभाग द्वारा किए जाने वाले उत्पीड़न को प्रमुखता से शासन तक पहुंचाया जिसका परिणाम यह निकला कि शासन के निर्देश पर वनाधिकार कानून के तहत सूरमा एवं गोलबोझी के निवासियो के वनभूमि पर मालिकाना हक देने के लिए पिछले साल दावा फार्म भरे गए। जांच पड़ताल की प्रक्रिया के वाद आज आठ अप्रैल को सूरमावासियों को वनभूमि पर मालिकाना हक मिल जाने के बाद सूरमा वन विभाग की गुलामी से आजाद हो गया है। वनभूमि में रहने के कारण सूरमा एवं गोलबोझी ग्राम के निवासियों को सरकार द्वारा संचालित योजनाओं का न लाभ मिल रहा था और न ही गांव में सरकारी स्कूल खुल सके थे। यहां तक गांव के निवासी पक्का घर नहीं वना सकते थे। इसके कारण इन गावों के सैकड़ो परिवार आजाद भारत में गुलामी वाला नारकीय जीवन गुजारने को विवश थे। घर, खलिहान, खेत की जमीन पर मालिकाना हक मिल जाने के बाद आज से सूरमा व गोलवोझी में आजादी का नया सूरज उदय हो गया है। वनाधिकार कानून कानून के हथियार से मिली सफलता को लेकर पूरे थारू क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई है थारू इस जीत की खुशी में थारू क्षेत्र में दीवाली मनाई जा रही है।
क्या है वनाधिकार कानून-
अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 एवं 2007 के तहत वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी को काबिज भूमि पर खेती का अधिकार, सामुदायिक अधिकार चाहे किसी नाम से ज्ञात हो इसमें राजाओं एवं जमींदारों के दौरान प्रयुक्त अधिकार शामिल हैं, गौण वन उत्पाद, चारागाहों, जलाशयों, गृह और आवास तथा कोई ऐसा पारम्परिक अधिकार जिसका यथास्थिति, वन निवास करने वाली उन अनुसूचित जनजातियों या अयं परम्परागत वन निवासियों द्वारा रूढ़िगत रूप से उपयोग किया जा रहा हो। कानून में सबसे महत्वूपर्ण अधिकर यह है भी है कि जो अनुसूचित जनजातियों और अयं परम्परागत वन निवासियों के 13 दिसम्बर 2005 से पूर्व किसी भी प्रकार की वन भूमि से पुर्नवास के वैध हक प्राप्त किए बिना अवैध रूप से बेदखल या विस्थापित किया गया हो उसे वनाधिकार का लाभ देने का प्राविधान अधिनियम में दिया गया है। जिसका खुला उल्लंघन दुधवा नेशनल पार्क के अधिकारियों द्वारा किया जा रहा है।
क्या हैं केन्द्र और प्रदेश सरकार के शासनादेश
वनाधिकार कानून लागू किए जाने के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय भारत सरकार के पत्र फाइल संख्या 7-12/2010 दिनांक 21-06-2010 में अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 की धरा 02 (ख) के अंतर्गत राष्ट्रीयय उद्यानों व अभ्यारण्यों में निर्वासित अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासियों को उनके कव्जे की भूमि पर उनके अधिकारों को मान्यता देने एवं उनके अधिकारों को उन्हे सौपने का आदेश दिया गया है। इसी आदेश के क्रम में उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव (वन अनुभाग 2) के पत्र संख्या 273/14-2-2010 दिनांक 11-10-2010 के शासनादेश में कहा गया है कि राष्ट्रीय उद्यानों व अभ्यारण्यों में निर्वासित अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासियों को उनके कव्जे की भूमि पर उनके अधिकारों को मान्यता देने एवं उनके अधिकारों को उन्हे सौपने हेतु कार्यवाही की जानी है। पुनर्स्थापना के पूर्व राष्ट्रीय उद्यानों व अभ्यारण्यों में अधिकारों से सम्वंधित सभी औपचारिकताएं पूरी करने तक कोई बेदखली एवं पुनर्स्थापना अनुमन्य नहीं है। केन्द्र और प्रदेश की सरकार जहां वनाधिकार कानून को लागू करवाने में गंभीर है वहीं दुधवा के अधिकारी शासनादेशों का अनुपालन नहीं कर रहे हैं और वनाधिकार कानून को लागू करवाने में अड़ंगे डालकर थारूओं के साथ अन्य परम्परागत वन निवासियों को उजाड़ने की साजिश जरूर कर रहें हैं। इसके कारण पूरे थारू क्षेत्र के निवासियों में रोष फैल गया है।
दुधवा नेशनल पार्क के मध्य आबाद ग्राम सूरमा में आयोजित किए गए शिविर में जिलाधिकारी समीर वर्मा ने केन्द सरकार के ऐतिहासिक अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 एवं नियम 2007 के तहत 289 थारू परिवारों को उनके घर, खेत और खलिहान के मालिकाना हक का प्रमाण पत्र दिया। श्री वर्मा ने कहा कि प्रयास करके एक साल के भीतर वनाधिकार कानून को लागू कराया गया है। श्री वर्मा ने सभी से वन एवं वन्यजीव संरक्षण व सुरक्षा में पूरा सहयोग दिए जाने की अपील की। उन्होंने वताया कि सूरमा ग्राम अम्वेडकर ग्राम विकास योजना में चयनित है शीघ्र ही विकास के कार्य शुरू कराए जाएगें। डीएम समीर वर्मा ने ग्राम सूरमा में 289 थारू परिवारों को 625,477 हेक्टैयर वन भूमि के मालिकाना हक के अधिकार पत्र दिए। इसमें आवास के लिए 32,637 हेक्टैयर एवं कुषि हेतु 592,84 हेक्टैयर जमीन के अधिकार पत्र अिए गए हैं। डीएम समीर वर्मा ने वताया कि दिए गए अधिकार पत्रों के अनुसार जमीन को राजस्व अभिलेखों में दर्ज कर दिया गया है। 23 साल की लम्वी लड़ाई लड़ने के बाद मिली सफलता के वाद सूरमावासियों में खुशी की लहर दौड़ गई है। गोलवोझी में वितरित किए कुल 58 अधिकार पत्र के तहत 47,842 हेक्टैयर जमीन परउनको मालिकाना हक दिया गया है। इसमें आवास के लिए 3,588 हेक्टेयर तथा कृषिकी 40,245 हेक्टेयर वन भूमि पर मालिकाना हक दिया गया है। डीएम समीर वर्मा ने कहा कि सामुदायिक अधिकारों के लिए शीघ्र ही दावा फार्म भरवाए जाएगें। उन्होंने थारूजनों से वन एवं वंयजीवों की सुरक्षा एवं संरक्षण के कार्यो में सक्रिय सहयोग दिए जाने की अपील की। अधिकार पत्र मिल जाने के बाद घने जंगल के बीच बेवशी व जीवन गुजारने वाले थारू परिवारों के लिए नए युग की शुरूआत का सूरज उदय हुआ है।
आदिवासी जनजाति थारूक्षेत्र में आबाद ग्राम सूरमा देश का पहला ग्राम बन गया जो नेशनल पार्क एवं टाइगर रिजर्व क्षेत्र में बसे होने के बाद भी उसे बनाधिकार कानून का लाभ मिला है। हालांकि थारूओं को यह सफलता एक लम्बी लड़ाई लड़ने के बाद मिली है। वर्षों से भारत-नेपाल सीमावर्ती जंगल के बीच आवाद थारू ग्राम सूरमा को 1978 में जब थारू क्षेत्र के 37 ग्रामों में से 35 ग्राम राजस्व में शामिल कर लिए गए तव उसे यह कहकर राजस्व ग्राम का दर्जा नहीं दिया गया कि यह दुधवा नेशनल पार्क की सीमा के भीतर है। इसी श्रेणी में गोलबोझी को भी शामिल कर लिया गया। सन् 1980 में सूरमा गाम के लोग अपना हक पाने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। 23 साल तक चली कानूनी दावपेंचों की लड़ाई में हाईकोर्ट ने सन् 2003 में सूरमावासियों के खिलाफ अपना फैसला सुनाया। इस पर दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन ने सूरमा को उजाड़ने के लिए तमाम असफल प्रयास किए। इस बीच सन् 2008में केन्द सरकार ने ऐतिहासिक अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 एवं नियम 2007 लागू कर दिया। इस ऐतिहासिक वनाधिकार कानून को लागू करने में दुधवा पार्क प्रशासन लगातार अड़गे डालता रहा। सूरमावासियों का उनका हक दिलाने के लिए राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच व उसके स्थानीय घटक संगठन थारू आदिवासी महिला किसान मंच ने सन् 2002में सघर्ष की राह पकड़ी और वनाधिकार पाने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया। इसमें सरकार द्वारा गठित वनाधिकार राज्यस्तरीय निगरानी समिति के सदस्य रामचन्द्र राना ने थारू क्षेत्र की समस्याओं एव वन विभाग द्वारा किए जाने वाले उत्पीड़न को प्रमुखता से शासन तक पहुंचाया जिसका परिणाम यह निकला कि शासन के निर्देश पर वनाधिकार कानून के तहत सूरमा एवं गोलबोझी के निवासियो के वनभूमि पर मालिकाना हक देने के लिए पिछले साल दावा फार्म भरे गए। जांच पड़ताल की प्रक्रिया के वाद आज आठ अप्रैल को सूरमावासियों को वनभूमि पर मालिकाना हक मिल जाने के बाद सूरमा वन विभाग की गुलामी से आजाद हो गया है। वनभूमि में रहने के कारण सूरमा एवं गोलबोझी ग्राम के निवासियों को सरकार द्वारा संचालित योजनाओं का न लाभ मिल रहा था और न ही गांव में सरकारी स्कूल खुल सके थे। यहां तक गांव के निवासी पक्का घर नहीं वना सकते थे। इसके कारण इन गावों के सैकड़ो परिवार आजाद भारत में गुलामी वाला नारकीय जीवन गुजारने को विवश थे। घर, खलिहान, खेत की जमीन पर मालिकाना हक मिल जाने के बाद आज से सूरमा व गोलवोझी में आजादी का नया सूरज उदय हो गया है। वनाधिकार कानून कानून के हथियार से मिली सफलता को लेकर पूरे थारू क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई है थारू इस जीत की खुशी में थारू क्षेत्र में दीवाली मनाई जा रही है।
क्या है वनाधिकार कानून-
अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 एवं 2007 के तहत वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी को काबिज भूमि पर खेती का अधिकार, सामुदायिक अधिकार चाहे किसी नाम से ज्ञात हो इसमें राजाओं एवं जमींदारों के दौरान प्रयुक्त अधिकार शामिल हैं, गौण वन उत्पाद, चारागाहों, जलाशयों, गृह और आवास तथा कोई ऐसा पारम्परिक अधिकार जिसका यथास्थिति, वन निवास करने वाली उन अनुसूचित जनजातियों या अयं परम्परागत वन निवासियों द्वारा रूढ़िगत रूप से उपयोग किया जा रहा हो। कानून में सबसे महत्वूपर्ण अधिकर यह है भी है कि जो अनुसूचित जनजातियों और अयं परम्परागत वन निवासियों के 13 दिसम्बर 2005 से पूर्व किसी भी प्रकार की वन भूमि से पुर्नवास के वैध हक प्राप्त किए बिना अवैध रूप से बेदखल या विस्थापित किया गया हो उसे वनाधिकार का लाभ देने का प्राविधान अधिनियम में दिया गया है। जिसका खुला उल्लंघन दुधवा नेशनल पार्क के अधिकारियों द्वारा किया जा रहा है।
क्या हैं केन्द्र और प्रदेश सरकार के शासनादेश
वनाधिकार कानून लागू किए जाने के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय भारत सरकार के पत्र फाइल संख्या 7-12/2010 दिनांक 21-06-2010 में अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 की धरा 02 (ख) के अंतर्गत राष्ट्रीयय उद्यानों व अभ्यारण्यों में निर्वासित अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासियों को उनके कव्जे की भूमि पर उनके अधिकारों को मान्यता देने एवं उनके अधिकारों को उन्हे सौपने का आदेश दिया गया है। इसी आदेश के क्रम में उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव (वन अनुभाग 2) के पत्र संख्या 273/14-2-2010 दिनांक 11-10-2010 के शासनादेश में कहा गया है कि राष्ट्रीय उद्यानों व अभ्यारण्यों में निर्वासित अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासियों को उनके कव्जे की भूमि पर उनके अधिकारों को मान्यता देने एवं उनके अधिकारों को उन्हे सौपने हेतु कार्यवाही की जानी है। पुनर्स्थापना के पूर्व राष्ट्रीय उद्यानों व अभ्यारण्यों में अधिकारों से सम्वंधित सभी औपचारिकताएं पूरी करने तक कोई बेदखली एवं पुनर्स्थापना अनुमन्य नहीं है। केन्द्र और प्रदेश की सरकार जहां वनाधिकार कानून को लागू करवाने में गंभीर है वहीं दुधवा के अधिकारी शासनादेशों का अनुपालन नहीं कर रहे हैं और वनाधिकार कानून को लागू करवाने में अड़ंगे डालकर थारूओं के साथ अन्य परम्परागत वन निवासियों को उजाड़ने की साजिश जरूर कर रहें हैं। इसके कारण पूरे थारू क्षेत्र के निवासियों में रोष फैल गया है।
मंगलवार, 8 मार्च 2011
मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011
बुधवार, 9 फ़रवरी 2011
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